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सोशल मीडिया पर नियम क्यों?

 सोमवार, 20 अगस्त, 2012 को 18:37 IST तक के समाचार

सोशल मीडिया पर नियमों की पाबंदी उचित नहीं होगी

भारत सरकार के कुछ सहयोगी दलों के नेताओं का कहना है कि सोशल मीडिया यानी फेसबुक और ट्विटर जैसी साइटों को भी नियमन के दायरे में रखा जाना चाहिए लेकिन नियमन के मायने क्या हैं?

सरकारें हमेशा से सूचना छुपाने के लिए जानी जाती हैं या जानकारी दबाने के लिए. पारंपरिक मीडिया से वैसे ही लोगों का विश्वास उठता जा रहा है और लोग तेज़ी से वैकल्पिक मीडिया की तरफ बढ़ते जा रहे हैं.

क्लिक करें वन दुग्गल कहते हैं कि सोशल मीडिया का नियमन हो

शायद यही कारण है कि फेसबुक और ट्विटर जैसे साइटों से प्रतिदिन लाखों लोग जुडते जा रहे हैं जहां वो अपने मन की बात कह सकें. अपने इलाक़ों की जानकारी दे सकें और खबरें शेयर कर सकें.

फेसबुक पर इस समय भारत से करोड़ों लोग हैं और भारत फेसबुक का इस्तेमाल करने वालों में तीसरे नंबर पर है. ट्विटर में भी भारतीय लोगों की संख्या खासी बड़ी है.

मीडिया से शिकायत

अगर कुछ ही दिन पहले की बात करें तो कोयला घोटाले पर आई कैग रिपोर्ट पारंपरिक मीडिया में एक दिन के बाद गायब सी हो गई. अब कम से कम सोशल मीडिया है जहां लोग इसके बारे में लगातार लिख रहे हैं.

ईद के दिन दोपहर में बॉयकॉट एमएसएम ट्रेंड कर रहा है जिसका आशय है कि बड़े मीडिया हाउसों का बहिष्कार किया जाए क्योंकि वो सही खबरें रिपोर्ट नहीं करते.

सोशल मीडिया और इंटरनेट का नियमन चीन जैसे देशों में होता है लेकिन भारत जैसे देश में जहां अलग अलग विचार हमेशा से एक साथ रहते रहे हैं और जहां बहस की अपनी परंपरा है सोशल मीडिया को नियम के तहत लाना उचित नहीं होगा.

हां सरकार को अगर कुछ करना है तो उन्हें लोगों को और अधिक जानकारी देनी होगी या जागरुक बनाना होगा ताकि वो अफवाहों के फेर में पड़कर गलत जानकारियां न फैलाएं.

मैं एक उदाहरण दूंगा, उत्तर पूर्व के मामले पर जहां सोशल मीडिया के जरिए कई जानकारियां अफवाह बनीं और कई आपत्तिजनक तस्वीरें शेयर की गईं. ये ग़लत था लेकिन एक और बात साथ में कहूंगा कि दिल्ली पुलिस के आयुक्त ने ट्विटर पर ट्विट किया कि अगर किसी को दिक्कत हो तो वो सीधे संपर्क करें.

कब ऐसा होता है कि कोई पुलिस कमिश्नर लोगों से सीधे संपर्क करे. सरकार को नियम बनाने से कोई रोक नहीं सकता लेकिन क़ानून के नाम पर पूरे सोशल मीडिया पर नियम लगा देना तो सही नहीं होगा.

रोक कारगर नहीं

पाबंदियां लगाकर सरकारें न तो कभी गलत कार्यों को रोक सकी है और न रोक सकेंगी. कम से कम सोशल मीडिया पर मुक्त बहस के ज़रिए कई असामाजिक तत्वों पर रोक लगाने में सफलता तो मिल ही सकती है.

सोशल मीडिया एक ऐसा सशक्त हथियार है जो कई स्तर पर असल लोकतंत्र लेकर आया है. सूदूर गांवों की खबरें अब दुनिया भर के लोगों तक पहुंच सकती है सिर्फ और सिर्फ सोशल मीडिया के ज़रिए.

और हां जो नियमन की बात करते हैं उन्हें पता होना चाहिए अगर कोई व्यक्ति सोशल मीडिया पर कोई गलत हरकत करता है तो हमेशा ही उसे पकड़ पाना आसान होता है. चाहे कंप्यूटर का आईपी एड्रेस हो या फिर मोबाइल का सिम.

सोशल मीडिया जैसी लोकतांत्रिक व्यवस्था पर नियमों की बाड़ लगाना अभिव्यक्ति की आजा़दी पर हमला होगा क्योंकि सरकारें अगर नियम बनाएंगी तो फिर उनके नियम उनके फायदे के लिए होंगे लोगों के फायदे के लिए नहीं.

हां, ये ज़रुर है कि लोगों को सोशल मीडिया की बुराईयों अच्छाइयों के प्रति सजग करने की ज़रुरत है और सरकार को ये काम करना चाहिए और इसके बहुत सारे रास्ते हैं.

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