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सोशल मीडिया -क्या नियमन उचित?

 सोमवार, 20 अगस्त, 2012 को 19:08 IST तक के समाचार

प्रतिबंध उचित या नहीं

असम में दो समुदाय के बीच झड़पों की घटनाओं की गूंज सोशल मीडिया पर भी दिखाई दी जो आगे चलकर मुंबई में एक प्रदर्शन के दौरान भी दिखीं.

बाद में इंटरनेट और अन्य सोशल मीडिया साइटों पर आपत्तिजनक तस्वीरें आईं जिसके बाद बंगलौर में पूर्वोत्तर के लोगों को धमकी भरे एसएमएस आए और हज़ारों की संख्या में पूर्वोत्तर के लोगों ने बंगलौर और कई अन्य शहरों से पलायन किया.

इस मुद्दे पर सरकार के एक घटक दल का कहना था कि ऐसा सोशल मीडिया के कारण हुआ है और सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए. इसमें खास तौर पर फेसबुक और ट्विटर का ज़िक्र भी किया गया.

क्लिक करें जाने माने साइबर एक्सपर्ट पवन दुग्गल सरकार की राय से इत्तेफाक रखते हैं औऱ कहते हैं कि सोशल मीडिया पर नियमन की ज़रुरत है और इस संबंध में क़ानून बनने चाहिए.

वो कहते हैं कि भारत को भी चीन जैसी कार्यनीति अपनानी चाहिए और सोशल मीडिया को भारतीय क़ानूनों के अंतर्गत लाना चाहिए.

क्लिक करें हालांकि इसका दूसरा पक्ष भी है. सोशल मीडिया ने भारत में कई लोगों को ये विकल्प दिया है कि वो अपनी खबर दुनिया के अन्य लोगों तक पहुंचा सके.

कई ऐसे मौके आए हैं जब सोशल मीडिया के कारण कई खबरें मुख्य धारा की मीडिया को कवर करनी पड़ी हैं.

इतना ही नही सोशल मीडिया ने अधिकारियों को मजबूर किया है कि वो जनता से सीधा संवाद करें.

सोशल मीडिया को आने वाले दिनों में भारतीय क़ानूनों के अंदर लाया जाएगा या नहीं ये देखने वाली बात होगी लेकिन फिलहाल सोशल मीडिया का मुद्दा राजनेताओं के दिमाग में ज़रुर बैठ गया लगता है.

चीन जैसे नियम हों

बैंगलोर की घटना के बाद मांग उठ रही है कि सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटों को नियंत्रित किया जाए

"सोशल मीडिया वेबसाइटों से मिल रही चुनौतियों से निपटने के लिए भारत तैयार नहीं है.

भारत की पुलिस और सरकार के लिए साइबर सिक्योरिटी अभी तक प्राथमिकता का विषय नहीं है इसलिए साइबर सिक्योरिटी पर ना तो ध्यान दिया जाता है, ना ही इसे लेकर कोई राष्ट्रीय नीति है.

भारत के पास बजट तो है लेकिन इसे कैसे खर्च किया जाए इसका अधिकारियों को पता नहीं है. भारत साइबर खतरों से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार नहीं हैं.

पूर्वोत्तर राज्यों को लेकर जो अफ़वाह उड़ी उसने साबित कर दिया है कि जब आक्रमण हुआ तो भारत की साइबर सुरक्षा के लिए ज़िम्मेदार लोग सो रहे थे.

हम सोशल मीडिया पर नियंत्रण की बात नहीं कर रहे हैं. हम इन वेबसाइटों से कह रहे हैं कि अगर आपके नेटवर्क पर कोई ऐसी जानकारी आती है जो भारत की सुरक्षा, प्रभुता और अखंडता के विरुद्ध है या फिर उसे नकारात्मक तौर पर प्रभावित करती है तो आप या तो उसे हटा दें या फिर उसे बेकार कर दें.

ऐसा करना इन वेबसाइटों का कानूनी दायित्व है.

अगर आप वर्ष 2000 के टेक्नॉलजी कानून पर नजर डालें तो पता चलेगा कि ये कानून इन वेवसाइटों पर कानूनी जिम्मेदारी डालते है कि वो अपनी सही सोच का इस्तेमाल करें.

समस्या ये है कि भारत सरकार इन कानूनों को प्रभावशाली तौर पर कार्यान्वित नहीं करती, इसलिए हर व्यक्ति धौंस जमाकर चला जाता है.

हर वेबसाइट कहती है कि हम भारत के बाहर हैं, हम आपके कानून के अंतर्गत बाध्य नहीं हैं, लिहाजा आपको जो करना है आप कीजिए, हमें जो ठीक लगेगा, हम वो करेंगे.

चीन से सहमत

मुझे लगता है कि ये तरीका बिल्कुल गलत है. कुछ हद तक मैं चीन की कार्यनीति से सहमत हूँ.

चीन ने इन कंपनियों को स्पष्ट बोल रखा है कि अगर आपको चीन में आना है तो आपको स्थानीय कानूनों का अनुसरण करना पड़ेगा.

भारत को भी यही करना होगा. जब तक भारत ऐसा कड़ा रवैया इख्तियार नहीं करेगा और सोशल मीडिया के खिलाफ़ कार्रवाई नहीं करेगा, तब तक इस परिस्थिति में बदलाव नहीं आएगा.

ट्विटर और फेसबुक के लिए भारत एक महत्वपूर्ण बाज़ार है. वो कभी भी नहीं चाहेंगे कि ये बाजार कभी ख़त्म हो या फिर लुप्त हो जाए. लिहाजा जो भारत ने ब्लैकबेरी के साथ किया है अगर उसे इन वेबसाइटों के साथ भी किया जाए तो भारतीय प्रभुता और अखंडता सुरक्षित रह पाएगी.

पहले तो सरकार की ओर से कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई, उसके बाद उसने सरकार और इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडरों को हिदायत दी.

सरकार को बोलने के अलावा कार्रवाई करनी चाहिए थी. जब तक सरकार कानूनी प्रावधानों को कड़ा नहीं करेगी, लोग उनका लगातार उल्लंघन करते रहेंगे.

स्वतंत्र भारत के इतिहास में ये पहला साइबर अटैक है.

यह 26/11 के मुंबई हमले से एकदम अलग है. यहाँ किसी व्यक्ति या कुछ व्यक्तियों ने बिना कोई गोली चलाए, बिना कुछ किए भारत के एक भाग में दहशत फैलाने की कोशिश की और दहशत फैली भी.

अगर आप फोरेंसिक विश्लेषणों पर निगाह डालें, तो गतिविधियाँ 13 जुलाई को ही शुरू हो गई थीं. इसका असर हमारे स्वतंत्रता दिवस के आसपास नजर आया. भड़काउ जानकारियाँ तो सोशल मीडिया वेबसाइटों पर पहले से थीं.

ये सरकार की नाकामी है, ये एजेंसियों की नाकामी है. ये सोशल मीडिया वेबसाइटों की भी नाकामी है. सरकार को सोशल मीडिया वेबसाइटों के खिलाफ कार्रवाई करनी पड़ेगी.

सरकार ने कई वेबसाइटों के खिलाफ कार्रवाई की है

मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि सरकार इन वेबसाइटों को बंद करें, लेकिन सरकार को इन्हें जरूर विवश करना चाहिए कि अगर इन्हें भारत में रहना है तो उन्हें भारतीय कानूनों का पालन करना पड़ेगा.

अफ़वाह के मामले में अगर ये वेबसाइटें जल्दी कार्रवाई करतीं तो बहुत नुकसान होने से बच जाता.

भारत में एक साइबर आर्मी के गठन की आवश्यकता है. अगला युद्ध जब भी होगा वो साइबर स्पेस में होगा.

उपभोक्ताओं को भी खुद को जागरुक होना होगा. लोगों को समझना होगा कि उनके हाथ में जो मोबाइल है जिसके ज़रिए वो सोशल मी़डिया वेबसाइट पर जाते हैं, वो एक बम है और इसे भारत के खिलाफ इस्तेमाल किया जा सकता है.

ये दायित्व हर व्यक्ति की है कि उसे अगर कोई गलत जानकारी दिखती है तो वो खुद कदम उठाए.

वो उस वेबसाइट को कदम उठाने के लिए लिखें, या फिर किसी नजदीक के थाने को सूचित करें. वो कंप्यूटर नेटवर्क रिस्पांस टीम को भी लिख सकते हैं. अगर आपके साथी किसी गलत हरकत में शामिल हैं तो उन्हें रोकें."

(साइबर एक्सपर्ट पवन दुग्गल के साथ बीबीसी संवाददाता विनीत खरे से बातचीत पर आधारित)



नियमन गलत है

भारत सरकार के कुछ सहयोगी दलों के नेताओं का कहना है कि सोशल मीडिया यानी फेसबुक और ट्विटर जैसी साइटों को भी नियमन के दायरे में रखा जाना चाहिए लेकिन नियमन के मायने क्या हैं?

सरकारें हमेशा से सूचना छुपाने के लिए जानी जाती हैं या जानकारी दबाने के लिए. पारंपरिक मीडिया से वैसे ही लोगों का विश्वास उठता जा रहा है और लोग तेज़ी से वैकल्पिक मीडिया की तरफ बढ़ते जा रहे हैं.

शायद यही कारण है कि फेसबुक और ट्विटर जैसे साइटों से प्रतिदिन लाखों लोग जुडते जा रहे हैं जहां वो अपने मन की बात कह सकें. अपने इलाक़ों की जानकारी दे सकें और खबरें शेयर कर सकें.

फेसबुक पर इस समय भारत से करोड़ों लोग हैं और भारत फेसबुक का इस्तेमाल करने वालों में तीसरे नंबर पर है. ट्विटर में भी भारतीय लोगों की संख्या खासी बड़ी है.

मीडिया से शिकायत

अगर कुछ ही दिन पहले की बात करें तो कोयला घोटाले पर आई कैग रिपोर्ट पारंपरिक मीडिया में एक दिन के बाद गायब सी हो गई. अब कम से कम सोशल मीडिया है जहां लोग इसके बारे में लगातार लिख रहे हैं.

ईद के दिन दोपहर में बॉयकॉट एमएसएम ट्रेंड कर रहा है जिसका आशय है कि बड़े मीडिया हाउसों का बहिष्कार किया जाए क्योंकि वो सही खबरें रिपोर्ट नहीं करते.

सोशल मीडिया और इंटरनेट का नियमन चीन जैसे देशों में होता है लेकिन भारत जैसे देश में जहां अलग अलग विचार हमेशा से एक साथ रहते रहे हैं और जहां बहस की अपनी परंपरा है सोशल मीडिया को नियम के तहत लाना उचित नहीं होगा.

हां सरकार को अगर कुछ करना है तो उन्हें लोगों को और अधिक जानकारी देनी होगी या जागरुक बनाना होगा ताकि वो अफवाहों के फेर में पड़कर गलत जानकारियां न फैलाएं.

मैं एक उदाहरण दूंगा, उत्तर पूर्व के मामले पर जहां सोशल मीडिया के जरिए कई जानकारियां अफवाह बनीं और कई आपत्तिजनक तस्वीरें शेयर की गईं. ये ग़लत था लेकिन एक और बात साथ में कहूंगा कि दिल्ली पुलिस के आयुक्त ने ट्विटर पर ट्विट किया कि अगर किसी को दिक्कत हो तो वो सीधे संपर्क करें.

कब ऐसा होता है कि कोई पुलिस कमिश्नर लोगों से सीधे संपर्क करे. सरकार को नियम बनाने से कोई रोक नहीं सकता लेकिन क़ानून के नाम पर पूरे सोशल मीडिया पर नियम लगा देना तो सही नहीं होगा.

रोक कारगर नहीं

पाबंदियां लगाकर सरकारें न तो कभी गलत कार्यों को रोक सकी है और न रोक सकेंगी. कम से कम सोशल मीडिया पर मुक्त बहस के ज़रिए कई असामाजिक तत्वों पर रोक लगाने में सफलता तो मिल ही सकती है.

सोशल मीडिया एक ऐसा सशक्त हथियार है जो कई स्तर पर असल लोकतंत्र लेकर आया है. सूदूर गांवों की खबरें अब दुनिया भर के लोगों तक पहुंच सकती है सिर्फ और सिर्फ सोशल मीडिया के ज़रिए.

और हां जो नियमन की बात करते हैं उन्हें पता होना चाहिए अगर कोई व्यक्ति सोशल मीडिया पर कोई गलत हरकत करता है तो हमेशा ही उसे पकड़ पाना आसान होता है. चाहे कंप्यूटर का आईपी एड्रेस हो या फिर मोबाइल का सिम.

सोशल मीडिया जैसी लोकतांत्रिक व्यवस्था पर नियमों की बाड़ लगाना अभिव्यक्ति की आजा़दी पर हमला होगा क्योंकि सरकारें अगर नियम बनाएंगी तो फिर उनके नियम उनके फायदे के लिए होंगे लोगों के फायदे के लिए नहीं.

हां, ये ज़रुर है कि लोगों को सोशल मीडिया की बुराईयों अच्छाइयों के प्रति सजग करने की ज़रुरत है और सरकार को ये काम करना चाहिए और इसके बहुत सारे रास्ते हैं.

(बीबीसी संवाददाता सुशील झा की राय)

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