सोशल मीडिया और अफवाहों का गर्म बाजार

 शनिवार, 18 अगस्त, 2012 को 20:01 IST तक के समाचार
सोशल मीडिया

सोशल मीडिया वेबसाइटों के जरिए कोई भी बात तेजी से फैल जाती है.

क्या सोशल मीडिया उन अफवाहों को बढ़ावा देने का जरिया बन रहा है जिनकी वजह से बंगलौर और दूसरे भारतीय शहरों में रह रहे पूर्वोत्तर के लोग बड़ी संख्या में पलायन कर रहे हैं.

जबाव है, हां. बडी संख्या में भेजे गए धमकी भरे एसएमएस संदेशों के जरिए चंद घंटो के भीतर बंगलौर शहर में हड़कंप मच गया और वहां रहने वाले पूर्वोत्तर इलाके के दसियों हजार लोगों में सुरक्षा को लेकर डर समा गया और हड़बड़ी में उन्होंने शहर छोड़ दिया.

ये सब इतना जल्दी हुआ कि केंद्र सरकार को भी कुछ समझ नहीं आया. उसने तुरत फुरत पंद्रह दिन के लिए बड़ी संख्या में एसएमएस संदेश भेजने पर रोक लगा दी ताकि अफवाहों को रोका जा सके.

अफवाहों को हवा देने का दूसरा जरिया बनी सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट फेसबुक और ट्विटर बनीं. भारत में पांच करोड़ लोग फेसबुक इस्तेमाल करते हैं जबकि दुनिया भर में फेसबुक यूजर्स की तादाद 95.5 करोड़ है.

सोशल मीडिया पर उठे सवाल

"लोगों का पलायन अफवाहों के बाद शुरू हुआ.. ट्वीटर और एसमएस के जरिए जो लोग ये नफरत और झूठ फैला रहे हैं, सभी सही सोच वाले भारतीय उन्हें अलग-थलग कर दें."

राजदीप सरदेसाई, जाने माने पत्रकार

मैंने सोशल मीडिया पर हड़बड़ी में चले कुछ संदेशों को देखा. एक व्यक्ति ने ट्वीट किया, “अब हमारे शहर से पूर्वोत्तर के लगभग सभी लोग चले गए हैं.” इसका मतलब है कि शहर में रहने पूर्वोत्तर के ढाई लाख लोगों का पयालन, जो स्पष्ट तौर पर सही नहीं है. हालांकि सरकार बुधवार शाम से 15 हजार मजदूरों के चले जाने की बात कह रही है.

कई अन्य ट्वीट संदेशों में पूर्वोत्तर के लोगों का जिक्र था जो खास कर कारोबारी लोग होते हैं. बंगलौर और उसके आसपास के इलाकों में रहने वाले इन लोगों को धमकी दी गई और पांच दिन के भीतर शहर छोड़ जाने को कहा गया था. वैसे इन धमकियों की सत्यता का कोई प्रमाण नहीं है.

और ज्यादातर ट्वीट्स भी इस बारे में खामोश हैं कि इन तथाकथित धमकियों का स्रोत क्या है. कई जाने माने पत्रकारों ने भी इस अपुष्ट जानकारी का जिक्र अपने ट्वीट संदेशों में किया.

सीएनएन आईबीएन चैनल के राजदीप सरदेसाई ने ट्वीट किया, “लोगों का पलायन अफवाहों के बाद शुरू हुआ.. ट्वीटर और एसमएस के जरिए जो लोग ये नफरत और झूठ फैला रहे हैं, सभी सही सोच वाले भारतीय उन्हें अलग-थलग कर दें.”

पूर्वोत्तर के लोगों का पलायन

अफवाहें फैलती ही लोगों के शहर छोड़ने का सिलसिला शुरू हो गया.

एनडीटीवी की बरखा दत्त भी खूब ट्विटर इस्तेमाल करती हैं. उन्होंने लिखा कि ये वेबसाइट “जहर, कट्टरपंथ और नफरत फैलाने का माध्यम बन गई है.” उन्होंने यहां तक कहा कि जो लोग सोशल मीडिया पर हिंसा को हवा दे रहे हैं, उन्हें भी पकड़ा जाना चाहिए और सजा दी जानी चाहिए.

सोशल मीडिया से आए इस तूफान की गूंज संसद में भी सुनाई दी. क्षेत्रीय पार्टी के एक सांसद ने तो कुछ दिनों के लिए सोशल मीडिया वेबसाइटों को बंद करने की मांग कर डाली ताकि अफवाहों को रोका जा सके.

राजनेताओं को नसीहत

जैसा कि कभी किसी ने लिखा था अफवाहें जन संचार का सबसे पुराना तरीका है. पुराने जमाने में वो मुंह से कहीं बातों से फैलती थीं और इसीलिए उनकी रफ्तार सुस्त थी. अब इसके लिए मोबाइल फोन और सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटों का इस्तेमाल होता है तो अफवाहें जंगल में आग की तरह फैलती हैं. और सरकार भी ये समझने में पूरी तरह लाचार दिख रही है कि इस समस्या से कैसे निपटा जाए.

सरकार की ओर से कुछ दिनों पहले उस वक्त सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटों पर नकेल कसने की लचर कोशिश की गई थी जब उन पर ‘आपत्तिजनक सामग्री’ होने का मुद्दा उठा था. इन वेबसाइटों ने कहा कि प्रकाशित होने से पहले किसी सामग्री की जांच पड़ताल करना संभव नहीं है.

सरकार की इस तरह की कोशिशों पर इंटरनेट इस्तेमाल करने वाले उबल पड़े. उन्होंने इसे वेबसाइटों को सेंसर करने का प्रयास बताया. (कौन तय करेगा कि क्या आपत्तिजनक है और क्या नहीं.) जल्द ही सरकार ने अपने कदम पीछे खींचते हुए कहा कि वेबसाइटों की सेंसरशिप का उसका कोई इरादा नहीं है.

पूर्वोत्तर के लोगों का पलायन

बड़ी मात्रा में भेजे गए धमकी भरे एसएमएस संदेशों से ये समस्या शुरू हुई.

वैसे बहुत कम भारतीय राजनेता ही सोशल मीडिया इस्तेमाल कर रहे हैं. इनमें भी उच्च वर्गीय अंग्रेजी दां लोग ही ज्यादा हैं. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का ट्विटर अकाउंट है, जिसे उनका कार्यालय चलाता है. एक लाख 60 लोग उन्हें फॉलो करते हैं. लेकिन उनके ट्वीट्स में ज्यादातर सरकारी नीतियों का ही जिक्र होता है.

सोशल मीडिया पुराने जमाने के कॉफी हाउस की तरह है जहां लोग आते हैं, बतियाते हैं और एक दूसरे से बातें साझा करते हैं. भारतीय राजनेताओं को भी अब लोगों से जुड़ने के इस अनौपचारिक और तेज माध्यम को लेकर अपनी आनाकानी छोड़ देनी चाहिए. अगर उनका लोगों से इस तरह का संपर्क होता तो बंगलौर से पलायन जैसी स्थिति को कहीं जल्दी सुलझाया जा सकता था.

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