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मनमोहन सिंह: देश को संबोधन या चुनाव की तैयारी?

 बुधवार, 15 अगस्त, 2012 को 12:16 IST तक के समाचार

मनमोहन सिंह ने लोकपाल विधेयक को राज्य सभा में पारित करने के लिए सभी राजनीतिक पार्टियों का समर्थन मांगा

स्वतंत्रता दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने देश को संबोधित करते हुए उन मुद्दों पर लोगों का ध्यान आकर्षित किया जो सरकार के लिए बड़ी चुनौतियां बन गए हैं, लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि उन्होंने इन चुनौतियों का समाधान देने के बजाय विपक्षी दलों के सिर ठीकरा फोड़ दिया.

दरअसल मनमोहन सिंह ने अपने बयान में कहा कि विभिन्न मुद्दों पर राजनीतिक सर्वसम्मति न बन पाने की वजह से आर्थिक विकास की गति पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है.

उन्होंने चेतावनी दी कि अगर आर्थिक विकास की गति नहीं बढ़ी, निवेश को बढ़ावा नहीं दिया गया और सरकारी राजकोष का ठीक से प्रबंधन नहीं किया गया तो उसका राष्ट्रीय सुरक्षा पर भी बुरा असर पड़ेगा.

उनके इस बयान का विश्लेषण करते हुए वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश ने कहा कि प्रधानमंत्री ने ऐसा कह कर लोकतांत्रिक प्रणाली का एक गलत नज़रिया पेश किया है.

एक तीर, दो निशाने

"प्रधानमंत्री 2014 के चुनावों को ध्यान में रख कर ये दिखाने की कोशिश की है कि इस बार उनकी सरकार कुछ ऐसा करेगी जिससे कि उन्हें एक बार फिर सत्ता संभालने का मौका मिले. अपनी योजनाओं की उपलब्धियां तो उन्होंने गिनवा दी, लेकिन आज भी गांवों में शिक्षा और स्वास्थय जैसे विभागों का क्या हाल है वो हम सब बखूबी जानते हैं. ऐसे में किन उपलब्धियों की बात कर रहे हैं प्रधानमंत्री?"

उर्मिलेश, वरिष्ठ पत्रकार

उर्मिलेश ने कहा कि राजनीतिक समस्या को आर्थिक विकास से जोड़ना और फिर इन दोनों मुद्दों को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ना एक अपरिपक्व दृष्टिकोण है.

बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, “राजनीतिक पार्टियों के बीच मतभेद होना तो लोकतंत्र की खूबसूरती होती है. राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक सुरक्षा को जोड़ने का प्रधानमंत्री का नज़रिया गलत है. लोकतंत्र में असहमतियों के बावजूद चीज़ों को संभव बनाना भी एक गहन कला होती है, जो कि वर्तमान सरकार दिखाने में असमर्थ रही है.”

उनका कहना था कि समस्याओं के लिए दूसरी पार्टियों को ज़िम्मेदार ठहराना और यूपीए सरकार की उपलब्धियों को ही गिनवाना ये दर्शाता है कि प्रधानमंत्री एक तीर से दो निशाने साधने की कोशिश कर रहे थे.

उर्मिलेश का कहना था, “हालांकि प्रधानमंत्री के बयान में शालीनता और संजीदगी थी, लेकिन मुझे लगता है कि उन्होंने 2014 के चुनावों को ध्यान में रख कर ये दिखाने की कोशिश की है कि इस बार उनकी सरकार कुछ ऐसा करेगी जिससे कि उन्हें एक बार फिर सत्ता संभालने का मौका मिले. अपनी योजनाओं की उपलब्धियां तो उन्होंने गिनवा दी, लेकिन आज भी गांवों में शिक्षा और स्वास्थय जैसे विभागों का क्या हाल है वो हम सब बखूबी जानते हैं. ऐसे में किन उपलब्धियों की बात कर रहे हैं प्रधानमंत्री?”

जनता का आक्रोश

भ्रष्टाचार और महंगाई के मुद्दों पर पिछले एक साल में कई बार जनता सड़कों पर उतर चुकी है

प्रधानमंत्री ने अपने बयान में लोकपाल विधेयक के मसौदे को राज्य सभा में पारित करवाने के लिए सभी राजनीतिक पार्टियों का सहयोग मांगा.

भ्रष्टाचार के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि सरकारी विभागों में पारदर्शिता लाने और भ्रष्टाचार को खत्म करने की कोशिशें सरकार जारी रखेगी.

साथ ही महंगाई के मुद्दे पर उनका कहना था कि मानसून में हुई गड़बड़ी की वजह से महंगाई पर काबू पाना मुश्किल साबित हो रहा है.

जब उर्मिलेश से पूछा गया कि भ्रष्टाचार और महंगाई जैसी समस्याओं की वजह से सड़कों पर आ चुकी आक्रोषित जनता को क्या मनमोहन सिंह का बयान संतुष्ट कर पाया होगा, तो उनका कहना था कि प्रधानमंत्री ये भूल रहे हैं कि आम जनता का नज़रिया भाषणों से नहीं बल्कि ज़मीनी स्थिति से ज़्यादा प्रभावित होता है.

उन्होंने कहा, “भ्रष्टाचार और महंगाई जैसी बुनियादी समस्याओं का प्रधानमंत्री ने संक्षेप में ही ज़िक्र किया. लोग सरकार से बेहद निराश हैं. उन्हें जवाब चाहिए, उनकी रोज़मर्रा की समस्याओं का समाधान चाहिए. हमारे यहां भाषणों की अद्भुत परंपरा है. लेकिन लोग अब केवल भाषण से संतुष्ट नहीं होंगें, वे परिणाम देखना चाहते हैं.”

प्रधानमंत्री ने कहा है कि भारत के सामने जो कठिन समस्याएं हैं, उनका समाधान लोगों की सहभागिता से ही निकल सकता है. लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि अब समय लोगों के सहयोग का नहीं बल्कि सरकार की ओर से कड़े फैसलों का है.

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