समंदर किनारे पत्थरों पर सुकून ढूँढ़ते इश्क़ज़ादे

 मंगलवार, 7 अगस्त, 2012 को 08:06 IST तक के समाचार

मुबंई में प्यार के लिए जगह मिलना काफी मुश्किल भरा काम है. वहां हर दिन लाखों जवांदिल जोड़ियां अपने मां-बाप की नजरों से दूर समुद्र के किनारे पहुंच जाते हैं. भारत में आज भी शादी से पहले प्यार मोहब्बत को बुरा माना जाता है.

समुद्र के किनारे घूमकर मूंगफली बेचनेवाले शंकर बताते हैं, “जब आप समुद्र के किनारे आते हैं तो चारो तरफ सिर्फ प्यार ही प्यार दिखता है. वे सिर्फ चुबंन लेते हैं, लेकिन चुंबन लेते हुए दंपत्तियों को देखना सुखदायी लगता है.”

समुद्र के किनारे चक्कर लगाने वाला शंकर वहां युगलों पर नज़र रखने के लिए नहीं घूमता-फिरता है बल्कि वह अपना काम करता है, लेकिन उन्हें आलिंगन करते हुए दंपत्ति दिख ही जाते हैं.

समुद्र के किनारे लहरों से दूर चट्टानों के उपर बैठे युवा दंपत्ति यहां-वहां हर जगह दिख जाते हैं.

युवा दंपत्ति एक दूसरे से चुंबक की तरह लिपटे रहते हैं. प्रेमिका का सर प्रेमी के कंधे पर होता है जबकि प्रेमी प्रेमिका की कमर पर बांहें डालकर लिपटे रहते हैं.

स्वर्ग से बढ़कर...

"हम दोनों के लिए यह दुनिया की सबसे तन्हा जगह है, जहां हम दोनों एक दूसरे में खो जा सकते हैं."

आशिमा और मयूर

प्रेमी जोड़ों में से कुछ तो बहुत दूर समुद्र को निहारते रहते हैं लेकिन जो लोग एक दूसरे से आलिंगनबद्ध रहते हैं, एक दूसरे को चुंबन लेते रहते हैं, उन्हीं से शंकर का सबसे अधिक साबका पड़ता है.

बांद्रा के नजदीक पुराने पुर्तगाली किले के बगल की वह जगह युवा प्रेमी-प्रेमिकाओं के लिए स्वर्ग से बढ़कर है.

हालांकि दूसरों के लिए वह बस एक जगह है.

प्रति वर्ग फीट के हिसाब से मुबंई पर जनसंख्या का दवाब सबसे अधिक है. वहां प्रति वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में 20,000 लोग रहते हैं. वहां लोगों की इतनी भीड़ है कि आत्मीय संबध बनाने के लिए घर नहीं है. वैसे अब ‘डेटिंग’ भारत में काफी लोग कर रहे हैं, फिर भी, अभी तक यह पूरी तरह स्वीकार नहीं हो पाया है.

अभी भी हमारे देश में यह परंपरा रही है कि आपके बाल-बच्चे का ना कोई ब्यॉय फ्रेंड है और ना ही कोई गर्ल फ्रेंड है. यह मां-बाप का दायित्व है कि वो अपनी संतान को उपयुक्त दुल्हा-दुल्हन से मिलवाए. समय काफी तेजी से बदल रहा है लेकिन उतना नहीं जितना कि हमारे प्रेमी युगल चाहते हैं.

बीस वर्ष के आस-पास के आशिमा और मयूर नामक प्रेमी युगल बताते हैं, “हम दोनों के लिए यह दुनिया की सबसे तंहा जगह है, जहां हम दोनों एक दूसरे में खो जा सकते हैं.” इस युगल को यहां तक पहुंचने में एक घंटा का समय लगता है.

फिल्मों में प्यार की पूजा लेकिन हक़ीक़त कुछ और ही

जब वहां प्यार के लिए जगह ही न हो तो कहां जाए- समुद्र का किनार

वे बताते हैं, “हम आपस में एक-दूसरे से मिलते हैं इसके बारे में हमारे मां-बाप को हवा तक नहीं लगेगा.”

इस जोड़ी के लिए सबसे मार्के की बात यह है कि वे दोनों पड़ोसी हैं लेकिन उन्हें अपने घर या उसके इर्द-गिर्द एक-दूसरे से मिलने की इजाजत नहीं है.

मयूर का कहना है कि अगर उनके मां-बाप हमें देख लें तो पता नहीं कैसा व्यवहार करेगें. मयूर जब यह बता रहे हैं उस वक्त वह अपनी प्रेयसी का हाथ थामे हुए है शायद यह बताने के लिए कि हमें कोई अलग नहीं कर सकता.

हर दिन मिलना संभव नहीं, लेकिन हफ्ता में एक दिन तो मिलते ही हैं युगल

प्रेमिका आशिमा कहती हैं कि हम जब यहां आते हैं तो आपस में बातें करते हैं और एक दूसरे का हाथ थामते हैं. वो बताती है, “हालांकि कुछ दंपत्ति एक-दूसरे का चुंबन भी लेते हैं लेकिन हम यह बिल्कुल नहीं करते.” आशिमा को पता है कि मैं उनकी कही बातों को नोट कर रहा हूं.

यहां जो भी प्रेमी युगल मौजूद हैं वो इस बात से इंकार करते हैं कि वो कभी चुंबन भी लेते हैं, हो सकता है कि वो जरूर चुंबन लेते हों. हमारा ऐसा देश है जहां फिल्मों में भी चुबंन के दृश्य को अभी थोड़े दिन पहले ही स्वीकार किया गया है.

मुबंईया फिल्मों में भले ही प्रेम की पूजा होती हो लेकिन वास्तविक जिंदगी में इससे माता-पिता सिर्फ घृणा करते हैं.

इक्कीस वर्षीय कृति के चेहरे पर मुस्कान खिल जाती है जब उनका प्रेमी आशीष बताते हैं कि वैसे तो वह बताना नहीं चाहता है लेकिन हकीकत यह है कि हम भी “कभी-कभी एक दूसरे का चुंबन ले लेते हैं.” आशीष यह भी बताते हैं कि उनके मां-बाप तीन साल के हमारे रिश्ते के बारे में जानते हैं. हालांकि आशीष का कहना है कि कृति के मां-बाप को इस रिश्ते के बारे में पता नहीं है.

'हम बच्चे नहीं हैं..'

"हम कोई बच्चे नहीं हैं, हमारे मां-बाप को एकदम परेशानी नहीं होगी. हम एक दूसरे का चुबंन भी लेते हैं और हाथ भी पकड़ते हैं. और अगर ऐसा करते हैं तो उसमें क्या बुराई है, यह क्यों नहीं करें ?”"

सचिन

वे दोनों एक ही मुहल्ले में रहते हैं और उन्हें भी यहां तक पहुंचने में घंटा भर का समय लगता है. वे यहां हर छुट्टी में जरूर मिलने आते हैं.

वैसे यहां बैठना उतना रोमांटिक नहीं है जितना कि वह पहली नजर में लगता है.

जहां दंपत्ति बैठे रहते हैं वहां कूड़ा-कचड़ा फैला हुआ है, बदबूदार औऱ खाने का सामान बिखड़े पड़े हैं.

वहां की हवा में बदबू भी है लेकिन जिन किसी भी युगल से मेरी मुलाकात हुई उनमें से किसी का भी इस पर जरा भी ध्यान नहीं था.

प्रेमी युगल के मां-बाप को अपनी संतान के प्रेम की जानकारी नहीं होती

यहां आने वाले प्रमी युगलों में अधिकतर जोड़े यह बताने से हिचकते रहे कि वो यहां क्यों आए हैं. लेकिन कुछ जोड़े वैसे भी थे जो खूब डींग हांक रहे थे. उनमें से एक सचिन ने कहा, “हम कोई बच्चे नहीं हैं, हमारे मां-बाप को एकदम परेशानी नहीं होगी. हम एक दूसरे का चुबंन भी लेते हैं और हाथ भी पकड़ते हैं. और अगर ऐसा करते हैं तो उसमें क्या बुराई है, यह क्यों नहीं करें ?”

सचिन अपनी प्रेमिका के साथ हर हफ्ते दो घंटे के लिए यहां आते हैं. सचिन की प्रेमिका मधु बताती है, “मुझे पता था कि जब इनके साथ मामला जुड़ेगा तो जिंदगीभर का होगा.” वह यह वाक्य कहकर अपने ब्यॉय फ्रेंड की ओर गर्व से देखती है फिर मेरी ओर मुस्कुराते हुए नजर डालती है.

'ज़माना बदल गया है'

"मुझे यह अच्छा नहीं लगता कि युवक-युवतियां यहां आकर एक-दूसरे का चुंबन ले. जो वे लोग कर रहे हैं वो ठीक नहीं है क्योंकि बहुत से परिवार वाले लोग यहां आना चाहते हैं.”"

नव विवाहित दीप

वैसे तो वे दोनों आधुनिक पेशा में हैं, खुले विचार के लगते हैं, लेकिन जब वो मुझसे बात करते हैं तो वहां मौजूद लोगों से मुझे दूर ले जाते हैं और अपने को रंगीन छाता में छिपा लेते हैं.

लेकिन ऐसा लगता है कि यह जगह भी अलग तरह की स्वतंत्रता है. उन्हें लगता है कि यह वो जगह है जहां वे वो सारा कुछ कर सकते हैं जिसे करने की इजाजत उनके माता-पिता घर में नहीं देगें.

वहां मौजूद अश्विन और रीतिका कहते हैं, “कह लीजिए कि बस हम बहुत ही अच्छे दोस्त हैं.”

जब मैंने उनसे बातचीत शुरू की तो दोनों एक-दूसरे का हाथ थामे हुए थे और शारीरिक रूप से वैसा बिल्कुल ही नहीं लग रहा था कि सिर्फ ‘बेस्ट फ्रेंड’ हैं.

वो सफाई देते हुए बताते हैं, “हां, यह बिल्कुल सही बात है कि प्रेमी-प्रेमिका यहां आते हैं लेकिन हम तो यहां सिर्फ बेहतर आवो-हवा के लिए आते हैं.”

आधे घंटे के बाद जब मेरी नजर एक बार फिर उनपर पड़ी तो उस बक्त दोनों आलिंगनबद्द थे और मुझे देखते हीं वैसे एक दूसरे से अलग हो गए जैसे सामने उनके मां-बाप अवतरित हो गए हैं.

जो भी हो, ये जगह तो प्रेमी-प्रेमिका के लिए स्वर्ग से बढ़कर है.

वैसे वहां कुछ सुरक्षाकर्मी भी मौजूद हैं, लेकिन जिन शहरों में प्रेम दर्शाने पर प्रतिबंध लगा हो और लोगों को प्रेम दर्शाने पर जुर्माना लगा दिया जाता हो, पुलिस वहां ऐसे व्यवहार करती है जैसे कि उसने कुछ देखा ही नहीं है.

निंदा

वहां मौजूद एक पुलिस अधिकारी का कहना है, “आप चुबंन में लिप्त जोड़ी को जाकर मना तो नहीं कर सकते हैं ना, जमाना बदल गया है.”

दीप-शीखा को आलिंगन बिल्कुल पसंद नहीं

भले ही जमाना बदल गया हो लेकिन निंदा तो होनी ही है.

जैसे कि दीप और शिखा का उदाहरण ले लीजिए, उन दोनों की शादी छह महीने पहले हुई है और वे दोनों भी दृश्य का मजा लेने के लिए यहां आए हुए हैं.

दीप कहते हैं, “मुझे यह अच्छा नहीं लगता कि युवक-युवतियां यहां आकर एक-दूसरे का चुंबन ले. जो वे लोग कर रहे हैं वो ठीक नहीं है क्योंकि बहुत से परिवार वाले लोग यहां आना चाहते हैं.”

कुछ लोग कह सकते हैं कि दीप मजा किरकिरा करने वाला आदमी है जिसे असली प्रेम से परेशानी है, लेकिन क्या कर सकते हैं, भारत में लोग प्रेम को इसी निगाह से देखते हैं.

सिनेमा के पर्दों पर असली प्रेम की विजय होती है. लेकिन मुबंई शहर में, जहां फिल्में बनती हैं वहां युवक- युवतियों को प्रेम के लिए जगह बनाना एक बड़ी चुनौती है.

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