बिहार: मुखिया की हत्या राजनीतिक थी?

 गुरुवार, 2 अगस्त, 2012 को 08:43 IST तक के समाचार

अपनी जातीय सेना के जिन रणवीरों को ब्रह्मेश्वर मुखिया ने अपने समाज की रक्षा के लिए बंदूकें थमाई थीं, उन्हीं में से एक की बन्दूक ख़ुद उन पर ही चल गई. इसलिए अब लोग जानना चाहते हैं कि मुखिया का वह रणवीर समाज अपने बीच के ऐसे अपराधियों की ताक़त पर ज़िंदा है या फिर शर्मिंदा है.

रणवीर सेना के संस्थापक ब्रह्मेश्वर नाथ सिंह की हत्या गत एक जून को आरा में कर दी गई. उनके जुनूनी समर्थकों ने आरा से लेकर पटना तक आगजनी और तोड़फोड़ के साथ भारी उपद्रव मचाया. आरा में अम्बेडकर छात्रावास के ग्यारह कमरे जला दिये गये.

पीड़ित छात्रों ने कहा कि पुलिस-प्रशासन ने उस हिंसक भीड़ को अनियंत्रित छोड़ दिया था.

हॉस्टल में आग

वहाँ के दलित छात्रों ने आपबीती सुनाई,'' हमला करने वाले कह रहे थे कि भागो, नहीं तो आग लगाएंगे और मर्डर भी कर देंगे."

" हमला करने वाले कह रहे थे कि भागो, नहीं तो आग लगाएंगे और मर्डर भी कर देंगे. छात्रावास के कई कमरों में घुसकर मोबाइल फोन, लैपटॉप, घड़ी, अटैची और कई अन्य चीज़ें लूट लीं और कमरे में जो बाक़ी बचा, उसे जला दिया. कई साइकिलों और मोटर साइकिलों को भी आग के हवाले कर दिया. मारपीट में कुछ लड़कों के सिर फट गये.''"

अंबेडकर छात्रावास के छात्रगण

उनके अनुसार, "छात्रावास के कई कमरों में घुसकर मोबाइल फोन, लैपटॉप, घड़ी, अटैची और कई अन्य चीज़ें लूट लीं और कमरे में जो बाक़ी बचा, उसे जला दिया. कई साइकिलों और मोटर साइकिलों को भी आग के हवाले कर दिया. मारपीट में कुछ लड़कों के सिर फट गये.''

जिस रणवीर सेना ने चार वर्षों तक जनसंहारों का सिलसिला चलाया, उसके सूत्रधार की हत्या से अचानक हिंसा-प्रतिहिंसा भड़कने का खौफ़ स्वाभाविक था.

लेकिन ऐसा नहीं हुआ. खुद मुखिया के परिजनों ने इसमें अपने स्वजातीय (भूमिहार) अपराधी तत्वों के हाथ होने का बयान दे दिया.

इस हत्याकांड में लिप्त होने का पहला शक भाकपा- माले पर गया था. वजह थी की रणवीर सेना के कट्टर विरोधी 'माले' के लोग ज़मानत पर जेल से मुखिया की रिहाई और बथानी टोला जनसंहार के अभियुक्तों को बरी किए जाने का विरोध कर रहे थे.

अपराधी गिरोह शामिल

यह शक पुलिस की शुरुआती जांच और गिरफ़्तार व्यक्तियों से पूछताछ शुरू होते ही मिट गया. अब तक की तफ्तीश में मिले सबूतों से ज़ाहिर हुआ है कि जबरन वसूली का धंधा चलाने वाले स्थानीय अपराधी गिरोह ने ये हत्या की.

पुलिस की इस तफ्तीश को सही दिशा में मानते हुए भी मुखिया के परिजन आरोप लगा रहे हैं कि शक के दायरे में आए आपराधिक छवि वाले नेताओं को बचाने की कोशिश हो रही है.

राज्य सरकार ने इस हत्याकांड की जांच सीबीआई से कराने की सिफारिश तो कर दी, लेकिन दो महीना बीत जाने के बावजूद सीबीआई ने जांच शुरू नहीं की है.

इस बीच ब्रह्मेश्वर मुखिया की पत्नी कलावती देवी से जब मैं आरा में मिला तो उन्होंने कुछ स्पष्ट संकेत दिये, ''बिना दुश्मनी के, थोड़े कोई जान मार देगा!...उस व्यक्ति को उन्होंने ही नेता बनाया था और मैं उस समय मना कर रही थी. बल्कि उनको आगाह भी किया था कि जो दुश्मन या अपराधी स्वभाव का होता है, वह कभी किसी का हित चाहने वाला मित्र नहीं बन सकता. इस पर हँसते हुए उन्होंने कहा था कि वो ऐसा दगा नहीं करेगा.''

उनके बड़े बेटे की पत्नी पास ही खड़ी थीं. कहने लगीं, ''ऐसा है कि मेरे ससुर जी विक्रम या तरारी क्षेत्र से इलेक्शन लड़ने का मन बना रहे थे, इस ख़बर से उन लोगों को लगा होगा कि चुनाव में मुखिया जी के सामने वो टिक नहीं पाएंगे, बात यही है."

'हत्या राजनीतिक'

ब्रह्मेश्वर मुखिया के छोटे पुत्र इंदु भूषण ने इसे राजनीतिक हत्या बताया, ''हमारे भतीजा ने इसी बात की तरफ़ संकेत वाला बयान कोर्ट में दिया है और समाज के कई लोग ऐसा बयान देने को तैयार हैं. अब तक जो बातें छनकर आई हैं, उनसे ज़ाहिर है कि यह एक राजनीतिक हत्या है.''

"बिना दुश्मनी के, थोड़े कोई जान मार देगा!...पाण्डेय को उन्होंने ही नेता बनाया था और मैं उस समय मना कर रही थी. बल्कि उनको आगाह भी किया था कि जो दुश्मन या अपराधी स्वभाव का होता है, वह कभी किसी का हित चाहने वाला मित्र नहीं बन सकता. इस पर हँसते हुए उन्होंने कहा था कि वो ऐसा दगा नहीं करेगा.'"

बरमेश्वर मुखिया की पत्नी कलावती देवी

पुलिस के मुताबिक़ इस हत्याकांड में शामिल समझे जाने वाले गिरोह की गतिविधियों पर मुखिया को सख्त आपत्ति थी और इस कारण उनके बीच अंदरूनी अनबन शुरू हो गई थी.

इस बीच मुखिया के पुत्र इंदु भूषण सिंह ने अपने पिता द्वारा गठित अखिल भारतीय राष्ट्रवादी किसान संगठन की कमान सम्हाल ली है.

साथ ही, उन्होंने अपने भूमिहार समाज से भरपूर सहानुभूति और समर्थन पाकर चुनावी राजनीति में उतरने की तैयारी शुरू कर दी है.

जाहिर है कि भारतीय जनता पार्टी इंदु भूषण को अपने साथ लेकर इसका राजनीतिक लाभ लेना चाहेगी. लेकिन ये तभी संभव होगा, जब जनता दल यूनाइटेड (जदयू) से भाजपा अलग हो जाएगी.

ऐसा इसलिए लग रहा है क्योंकि मुखिया की हत्या से नाराज़ भूमिहार समाज जदयू के विरुद्ध अपना रोष खुलकर ज़ाहिर कर रहा है.

वहीं दूसरी तरफ़ ब्रह्मेश्वर मुखिया से जुड़े जनसंहारों के मद्देनज़र भाकपा-माले को भी ग़रीब खेतिहर मज़दूरों के बीच अपनी पुरानी ताक़त बहाल करने का नया मौक़ा मिला है.

न्याय रैली

आरा में पिछले दिनों हुए न्याय रैली में लाल झंडे वालों की उमड़ती भीड़ यही संकेत दे रही थी. मुखिया हत्याकांड के बाद उपद्रवी तत्वों के हिंसक तेवर ने माले समर्थकों की एकजुटता बढा दी है.

मुखिया के पुत्र इंदु भूषण इस प्रयास में हैं कि छोटे-बड़े भूधारी किसान और भूमिहीन खेत मज़दूर के बीच दोस्ताना तालमेल वाला कोई फ़ॉर्मूला निकल आए.

इसलिए उन्होंने 'मनरेगा' जैसे सरकारी योगदान के साथ न्यूनतम मज़दूरी तीन सौ रूपए करने और किसानों को अपने उत्पाद का समर्थन मूल्य ख़ुद तय करने की छूट देने जैसी मांग उछाल दी है.

एक खास बातचीत में उन्होंने बीबीसी से कहा, ''हम लोग खेत मजदूरों को भूमिहीन किसान कहते हैं और उन्हें खेती का शेयरर मानते हैं. इसलिए कृषि उत्पादन की कीमत बढ़ेगी तो स्वतः उनका श्रम आधारित शेयर भी बढ़ जायेगा.''

मतलब, मजदूरी संबंधी विवाद का मुद्दा कुंद पड़ जाए, ऐसी कोशिश हो रही है. जबकि 'मनरेगा' में व्याप्त भ्रष्टाचार और रोज़ी-रोटी के सीमित अवसर का मारा हुआ खेत मज़दूर भुखमरी जैसी स्थिति से गुज़र रहा है.

(इस श्रृखला की अंतिम कड़ी में जातीय हिंसा के अतीत से जुड़े वर्तमान का ज़िक्र )

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