जब शादी के बावजूद संभोग बलात्कार माना जाएगा...

 रविवार, 29 जुलाई, 2012 को 14:13 IST तक के समाचार

पीठ का कहना है कि लड़की की उम्र और संभोग की सहमति मामले में कोई अपवाद नहीं हो सकता है

दिल्ली हाईकोर्ट ने आदेश दिया है कि 15 वर्ष से कम उम्र की लड़की के साथ विवाह के बाद जब संभोग होता है तो उसे बलात्कार ही माना जाएगा.

हाईकोर्ट ने कहा है कि संभोग के लिए भले ही लड़की की रजामंदी हो, तब भी इसे बलात्कार ही माना जाएगा और ऐसे मामलों में पुरुष को उसके धार्मिक अधिकारों के तहत संरक्षण हासिल नहीं है.

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश एके सीकरी की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ का कहना था, ''15 वर्ष से कम उम्र की पत्नी के साथ संभोग आईपीसी की धारा 375 के तहत एक अपराध है. इस कानून के विषय में कोई अपवाद नहीं हो सकता है और इसे सख्ती से लागू किया जाना चाहिए.''

'रजामंदी का औचित्य नहीं'

"ऐसे मामलों में रजामंदी का कोई औचित्य नहीं है. ऐसी उम्र में रजामंदी को मंजूर करना मुश्किल है. इससे भी कोई फर्क नहीं पड़ता कि लड़की का विवाह हुआ है या नहीं. सम्बद्ध पक्षों के निजी कानून भी यहां मायने नहीं रखते हैं"

दिल्ली हाईकोर्ट

न्यायाधीशों ने कहा, ''ऐसे मामलों में रजामंदी का कोई औचित्य नहीं है. ऐसी उम्र में रजामंदी को मंजूर करना मुश्किल है. इससे भी कोई फर्क नहीं पड़ता कि लड़की का विवाह हुआ है या नहीं. सम्बद्ध पक्षों के निजी कानून भी यहां मायने नहीं रखते हैं.''

पीठ ने ये व्यवस्था लड़की के विवाह और संभोग के लिए रजामंदी की सही उम्र संबंधी भारतीय दंड संहिता, हिंदू विवाह अधिनियम और बाल-विवाह रोकथाम अधिनियम के विभिन्न प्रावधानों पर उठे कई सवालों का जबाव देते हुए दी है.

अपहरण या बलात्कार का मामला

पीठ के समक्ष ये कानूनी सवाल खास तौर पर उठाया गया था कि 'क्या किसी व्यक्ति के खिलाफ आईपीसी की धारा 363 या धारा 376 के तहत दर्ज मामला, नाबालिग लड़की के इस बयान के आधार पर खारिज किया जा सकता है कि उसने विवाह खुद किया था.'

कोर्ट ने ये भी कहा है कि ऐसे मामलों में लड़की की उम्र यदि 16 वर्ष से ज्यादा है और उसने विवाह के बाद संभोग के लिए रजामंदी दी है तो संबंधित व्यक्ति के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी को कानून के मुताबिक खारिज किया सकता है.

कोर्ट ने कहा, ''लड़की की आयु 16 वर्ष से ज्यादा है और वो यदि बयान देती है कि वो रजामंद थी और बयान किसी दबाव में या प्रभाव में नहीं दिया गया है तो इस बयान को स्वीकार किया जा सकता है और अदालत अपने अधिकार-क्षेत्र में रहते हुए आईपीसी की धारा 363 (अपहरण) या धारा 376 (बलात्कार) के मामले को खारिज कर सकती है.''

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