बिना पहचान भंवर में फंसी रही तुन्नी की जिंदगी

 बुधवार, 30 मई, 2012 को 05:03 IST तक के समाचार
तुन्नी राय

तुन्नी राय को अपने जीवन में लगातार मुश्किलों का सामना करना पड़ा है.

मेरा नाम तुन्नी राय है और मेरा जन्म 1947 में हुआ, उसी साल भारत को आजादी मिली थी.

अपनी लगभग पूरी जिंदगी मैंने बिना पहचान के गुजार दी. जब बीबीसी की टीम मई में मुझसे बात करने आई तो मुझे पता चला कि मेरा मतदाता पहचान पत्र भेजा गया है जो गांव में दो महीने से मेरे घर पर पड़ा है.

मेरा संबंध पटना जिले के भिखुआ गांव से है. मेरे तीन बेटे और दो बेटियां हैं.

मैं कभी स्कूल नहीं गया और मैं अनपढ़ हूं.

बिना पहचान पत्र के जिंदगी बहुत मुश्किल रही और इसके चलते बहुत सी परेशनियां और झमेले झेलने पड़े.

कोई प्रमाणपत्र नहीं

बहुत साल पहले की बात है. मेरे एक पोते को गांव में कुत्ते ने काट लिया.

मैं उसे रैबिज से बचाने वाला इंजेक्शन लगवाने पटना मेडिकल कॉलेज और अस्तपताल में ले गया. लेकिन जब मैं अस्पताल में पहुंचा तो डॉक्टर ने मुझसे पहचान पत्र मांगा.

मेरे पास पहचान पत्र नहीं था तो डॉक्टर ने मेरे पोते को इंजेक्शन लगाने से इनकार कर दिया. मैं अपने भाग्य को कोसता हुआ वापस चला गया.

इसके बाद फिर एक बार मुझे पहचान पत्र या पहचान दस्तावेज न होने की वजह से मुसीबत का सामना करना पड़ा.

मेरे खेत से बिजली की लाइन गुजरती है. अक्टूबर 2009 में बिजली के तार चुराने के लिए कुछ चोर एक खंबे पर चढ़ गए. उनमें से एक की करंट लगने से मौत हो गई और वो खेत में आ गिरा.

अगले दिन गांव में पुलिस आई और लाश को पोस्ट मॉर्टम के लिए भेजे बिना इस मामले में मेरा और मेरे परिवार का नाम अभियुक्तों के तौर पर दर्ज कर लिया गया.

पहचान पत्र में उलझी जिंदगी

लाख कोशिशों और भागदौड़ के बाजवूद मैं अपनी बेगुनाही साबित नहीं कर पाया क्योंकि मैं जहां भी जाता था, वहां मुझसे पहचान पत्र मांगा जाता था.

आखिरकार मैंने और मेरे परिवार ने अदालत के सामने आत्मसमर्पण कर दिया और हमें जेल भेज दिया गया.

छह महीने बाद मुझे जमानत मिली और मैं जेल से बाहर आया. लेकिन मैं वापस अपने गांव जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाया.

मेरा सब कुछ खो गया था. मैंने अपनी जमीन को गिरवी रख कर कर्ज लिया ताकि अपने परिवार का खर्च उठा सकूं.

मैं पटना आया और सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी करने लगा. सौभाग्य से मेरा एक रिश्तेदार उसी सिक्योरिटी एजेंसी में काम करता था इसलिए उन्होंने मुझसे कोई पहचान पत्र नहीं मांगा.

कभी मैं किसान हुआ करता था. अब एक अदना से सिक्योरिटी गार्ड हूं.

बेशुमार चुनौतियां

मैं हर दिन 16 घंटे की नौकरी करके महीने में पांच हजार रुपये कमाता हूं. मेरी ज्यादातर कमाई बीमार बेटे के इलाज और मुकदमा लड़ने पर खर्च हो जाती है.

पहचान पत्र न होने की वजह मैं बैंक खाता नहीं खुलवा पाया हूं. गांव में बिजली का कनेक्शन भी नहीं ले पाया. मेरे पास मोबाइल फोन भी नहीं है क्योंकि वे भी कनेक्शन के लिए पूरे कागज मांगते हैं.

कागजात न होने की वजह से मैं अपनी पुश्तैनी जमीन को अपने नाम पर स्थानांतरित भी नहीं करा सकता हूं.

पहचान पत्र न होने की वजह से मैं रोज किसी न किसी परेशानी का सामना करता हूं और अब तो मुझे इसकी आदत हो गई है.

हाल में मुझे मतदाता पहचान पत्र मिला, लेकिन इस उम्र में भला इससे क्या होगा? इससे मुझे क्या फायदा होगा? इस मतदाता पहचान पत्र के जरिए मैं किसी को वोट भी दूं तो उससे मुझे क्या मिलेगा?

और ये विशिष्ठ पहचान संख्या क्या है, जिसकी आप बात कर रहे हो?

(पटना, बिहार में तुन्नी राय से अमरनाथ तिवारी की बातचीत पर आधारित)

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