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मेनन ने चुकाई काम करने के जज्बे की कीमत !

 गुरुवार, 26 अप्रैल, 2012 को 06:40 IST तक के समाचार

सरकार मेनॉन की रिहाई के लिए पूरी कोशिश कर रही है

छत्तीसगढ़ में नक्सलियों द्वारा अगवा किए गए कलेक्टर एलेक्स पॉल मेनन ने नवनिर्मित सुकमा जिले के पहले जिलाधिकारी के रूप में कार्यभार संभाला था.

जोश से भरपूर भारतीय प्रशानिक सेवा के 2006 बैच के अधिकारी मेनन भी शायद इलाके के पिछले कलेक्टरों की तरह लोगों का दिल जीतना चाहते थे.

नक्सली हिंसा या यूं कहा जाए कि सरकार और माओवादियों के बीच चल रहे संघर्ष के मद्देनजर सुकमा भारत का सबसे संवेदनशील इलाका माना जाता है.

अब तक की सबसे बड़ी नक्सली वारदातें भी इसी इलाके में हुई हैं. इनमे अप्रैल, 2010 में चिन्तलनार के इलाके में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के 75 जवानों की मौत भी शामिल है.

सुकमा, दंतेवाड़ा जिले का अनुमंडल था और बस्तर के नारायणपुर में स्थित अबूझमाड़ की तरह विकास के हिसाब से सबसे पिछड़ा इलाका मना जाता है. दुर्गम होने की वजह से इस इलाके का बड़ा हिस्सा दुनिया से कटा हुआ है. आज भी कई इलाके ऐसे हैं जहां ना तो सड़क है ना और कोई साधन.

बदहाल इलाका

शासन का आरोप है कि माओवादी इस इलाके में विकास होने नहीं देते. सडकें बनने नहीं देते. सुकमा को कोंटा से जोड़ने वाला राष्ट्रीय राजमार्ग आज भी बदहाल है क्योंकि इसका निर्माण नहीं हो पा रहा है.

विकास की धारा से अछूते दूरदराज के इलाके नक्सली हिंसा से खास तौर से प्रभावित हैं

सरकार कहती है कि कई बार माओवादियों ने सड़क के निर्माण में लगे वाहनों और उपक्रमों को नुकसान पहुंचाया है. सुकमा में स्थित चिन्तलनार, ताड़मेटला, चिंतागुफा और जगरगुंडा का इलाका ऐसा है जो बाकी की दुनिया से कटा है.

चिन्तलनार से जगरगुंडा की दूरी 25 किलोमीटर है लेकिन वहां तक जाने के लिए सड़क नहीं है. यही वजह है कि जगरगुंडा में स्थित सुरक्षा बल के कैंप के लिए रसद पहुंचाने का काम छह महीनों में एक बार होता है.

कई बार कैंप के लोगों के लिए राशन की सामग्री हेलीकॉप्टर से पहुंचाई जाती है. कभी कभी ट्रकों से भी रसद पहुंचाई जाती है मगर यह कवायद एक जंग की तैयारी जैसी होती है क्योंकि इस पूरी प्रक्रिया में कई दिन लगते हैं और इसमें हजारों जवानों को लगाया जाता है.

सबके अपने अपने तर्क

सुकमा की सीमा ओडिशा और आंध्र प्रदेश के जंगलों से लगी हुई है. इस नए जिले का पश्चिमी इलाका माओवादियों की राजधानी के रूप में जाना जाता रहा है. बताया जाता है कि सुकमा के कलेक्टर एलेक्स पॉल मेनन को भी अगवा करने के बाद माओवादियों ने इसी इलाके में रखा है.

इस इलाके का विकास क्यों नहीं हो पाया? इस पर परस्पर विरोधी तर्क है. शासन के लोग कहते हैं कि नक्सलियों के दहशत की वजह से सरकारी अमला इन इलाकों में घुस नहीं पाता. वे कहते हैं कि नक्सली इस इलाके में किसी को आने भी नहीं देते हैं.

इस जिले के एक बड़े इलाके पर माओवादियों का कब्जा है जहां उनकी समान्तर व्यवस्था चलती है जिसे वह 'जनताना सरकार' के नाम से बुलाते हैं.

मगर सामाजिक और राजनितिक कार्यकर्ताओं का तर्क है कि माओवादियों के होने का बहाना बनाकर सरकारी अमला इन इलाकों में कुछ भी नहीं करता.

अलबत्ता यहां नक्सल विरोधी अभियान के नाम पर लोगों पर - खास तौर पर यहां के आदिवासियों पर जुल्म ढाए जाते हैं. इसका उदहारण ताड़ मेटला में पिछले साल कथित रूप से सुरक्षा बलों द्वारा आदिवासियों की झोपड़ियों जलाने का मामला है जिसकी जांच सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर सीबीआई कर रही है.

जीता लोगों का दिल!

इस इलाके में तैनात रहे अधिकारियों पर लोगों की अनदेखी और विकास योजनाओं में घपलों के अगर आरोप लगे तो यह बात भी सच है कि पिछले दो सालों में यह कुछ ऐसे अधिकारी भी आए जिनके काम करने के तरीके ने यहां के लोगों पर एक गहरी छाप छोड़ी है.

आर प्रसन्ना ने अपनी कार्यशैली से स्थानीय लोगों का दिल जीता

बीजापुर और दंतेवाड़ा में कलेक्टर रहे आर प्रसन्ना का जब इन जिलों से तबादला हुआ तो आम लोगों ने इसका सड़कों पर उतरकर विरोध किया.

2004 बैच के अधिकारी प्रसन्ना इसलिए लोकप्रिय हो गए क्योंकि वो पैदल और बिना अंगरक्षकों के दंतेवाड़ा और बीजापुर के दूर दराज वाले और दुर्गम इलाकों में जाने लगे और लोगों तक राहत पहुंचाने का काम करते है.

जब ताड़मेटला में सुरक्षा बलों के आदिवासियों की झोपड़ियाँ जलाने का मामला सामने आया तो प्रसन्ना और बस्तर संभाग के आयुक्त के श्रीनिवासुलु ने वहां के लोगों तक राहत सामग्री पहुंचाने की कोशिश की. मगर उन पर दोरनापाल के पास विशेष पुलिस अधिकारियों और सलवा जुडूम के नेताओं ने हमला कर दिया.

संभाग के आयुक्त और कलेक्टर की गाड़ियों को क्षतिग्रस्त किया गया. लेकिन इसके बावजूद भी ये अधिकारी राहत लेकर उन इलाकों तक पहुंचे जहां उनसे पहले कोई अधिकारी नहीं पहुंच पाया था.

इस घटना को लेकर पुलिस और जिला प्रशासन के बीच विवाद के कारण दंतेवाड़ा के सीनियर एसपी एसआरपी कल्लूरी और कलेक्टर आर प्रसन्ना का तबादला कर दिया गया. प्रसन्ना का तबादला लोगों के लिए बड़ा झटका था. लेकिन 2005 बैच के अधिकारी ओम प्रकाश चौधरी ने उनकी जगह ले ली.

चौधरी ने भी जल्द अपनी कार्यशैली से एक अलग मुकाम बना लिया. उन्होंने जहां शिक्षा पर जोर देते हुए दंतेवाड़ा में 'एजुकेशन सिटी' का निर्माण शुरू किया, वहीं उन्होंने पलायन को रोकने के लिए बेरोजगारों का 'गुज़र-बसर महाविद्यालय' भी खोला जिसमे दाखिला लेने के लिए कोई योग्यता की जरूरत नहीं है.

अधिकारियों में दहशत

इसी दौरान इस साल जनवरी महीने में दंतेवाड़ा से काट कर सुकमा को नया जिला बनाया गया जिसके पहले कलेक्टर मेनन बने.

ओपी चौधरी ने स्थानीय लोगों की शिक्षा के लिए कई कदम उठाए

चूँकि पिछले दो बर्षों से इस इलाके में भारतीय प्रशासनिक सेवा के युवा अधिकारियों की कार्यशैली ने लोगों के दिलों में जगह बना ली. मेनन ने भी इस नई परंपरा को आगे बढ़ाते हुए दूर दराज के इलाकों में पहुंचना शुरू कर दिया.

नए जिले के पहले कलेक्टर के रूप में पदभार संभालने के बाद होने वाली बैठकों में मेनन ने कई बार ऐसे अधिकारियों और शासकीय कर्मचारियों को आड़े हाथ लिया, जो सुदूर इलाकों में माओवादी के होने का बहाना बनाकर नहीं जाया करते थे.

मेनन के अपहरण की घटना नें भारतीय प्रशासनिक सेवा के नए अधिकारियों के बीच एक दहशत का माहौल पैदा कर दिया है.

अब जो अधिकारी काम भी करना चाहते हैं, उनको निर्देश दिए गए हैं कि वह सुदूर अंचलों में ना जाएं. और अगर जाना भी पड़े तो सुरक्षा के पुख्ता इंतजामों के साथ.

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