फिर शुरू हुई राहुल गाँधी की पाठशाला !

 गुरुवार, 5 अप्रैल, 2012 को 13:52 IST तक के समाचार
राहुल गाँधी

चुनावों में मिली हार के तुरंत बाद राहुल गाँधी ने इसकी ज़िम्मेदारी ली थी.

उत्तर प्रदेश चुनाव में मिली करारी हार के लगभग एक महीने बाद कांग्रेस नेता राहुल गाँधी ने हार की वजहों पर काम करने के प्रयास शुरू कर दिए हैं.

इसी दिशा में कदम उठाते हुए राहुल गाँधी और उनके ख़ास सिपहसालारों ने दिल्ली में कुछ चुनिंदा कांग्रेसियों को 'ब्रेन स्टॉर्मिंग' या आत्मचिंतन करने के लिए तलब किया है.

सूत्रों के मुताबिक़ यह बैठक गुरुवार शाम को शुरू हो सकती है और इसमें इस बात पर जोर रहने की उम्मीद है कि उत्तर प्रदेश में आखिर इतनी करारी पटखनी मिली कैसे.

उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में सुल्तानपुर क्षेत्र से एक कांग्रेसी उम्मीदवार ने बीबीसी को बताया, "कुछ दिन पहले पार्टी हाईकमान की ओर से उन सभी 28 उम्मीदवारों के पास न्यौता पहुंचा जिन्हें इन चुनावों में जीत हासिल हुई थी. साथ ही उन सभी उम्मीदवारों के पास भी दिल्ली पहुँचने के आदेश आए हैं जिन्हें 20 ,000 से ज्यादा मत मिले हैं."

इस बात की भी खबर है कि राहुल गाँधी के आदेश पर उन सभी 22 कांग्रेसी सांसदों को भी इस चिंतन बैठक में बुलाया गया है जिन्होंने 2009 में हुए लोकसभा चुनाव में जीत हासिल की थी.

साथ ही उस आम चुनाव में कांग्रेस की तरफ से लड़ कर एक लाख से अधिक वोट पाने वालों को भी इस बैठक का हिस्सा बनाया जाएगा.

ठीकरा किस पर?

ऐसी भी खबरें हैं कि इस अहम चिंतन बैठक में उत्तर प्रदेश चुनाव के प्रभारी दिग्विजय सिंह किसी कारणवश नहीं शामिल हो सकेंगे.

बताया जा रहा है कि वह इन दिनों विदेश में हैं. लेकिन इस बात में कोई दो राय नहीं है कि इस चिंतन बैठक में एक दूसरे के सिर उत्तर प्रदेश में मिली करारी हार का ठीकरा ज़रूर फोड़ा जा सकता है.

कांग्रेसी सूत्रों कि मानी जाए तो प्रदेश में कुछ बड़े नेताओं को चुनाव की अलग-अलग ज़िम्मेदारी सौंपी गई थी.

अशोक तंवर और पीएल पुनिया को जहाँ प्रदेश में 85 सुरक्षित सीटों का ज़िम्मा सौंपा गया था वहीं सलमान खुर्शीद, राज बब्बर और सलीम शेरवानी को मुस्लिम बहुल इलाकों में प्रत्याशियों को छांटने की ज़िम्मेदारी मिली थी.

केन्द्रीय मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा को पिछड़े वर्ग की कमान सौंपी गई थी जबकि प्रमोद तिवारी जैसे पुराने नेताओं को ब्राह्मण बहुल इलाकों पर ध्यान केन्द्रित करने के आदेश मिले थे.

अब देखने वाली बात यही रहेगी कि कांग्रेस का आला कमान इन नेताओं में से किस पर हार का ज्यादा ठीकरा फोड़ते हैं और किस पर कम गाज गिरती है.

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