अखबार वही जो ममता दीदी पढ़ाए!

 गुरुवार, 29 मार्च, 2012 को 05:07 IST तक के समाचार
ममता बनर्जी

पश्चिम बंगाल में अखबार वही जो ममता बनर्जी की सरकार पढ़ाए. जी हां, राज्य में अब सरकार तय कर रही है कि सरकारी पुस्तकालयों में लोग कौन सा अखबार पढ़ेंगे और कौन सा नहीं.

पश्चिम बंगाल सरकार ने एक सर्कुलर जारी कर कहा है कि सरकारी या सरकार से सहायताप्राप्त पुस्तकालयों में कोलकाता से छपने वाले महज आठ अखबार ही खरीदे जाएंगे.

इनके इतर दूसरा अखबार खरीदने पर उसके पैसे नहीं दिए जाएँगे. इन अखबारों की सूची में बांग्ला के पांच, हिंदी का एक और उर्दू के दो अखबार हैं. यह तमाम अखबार वही हैं जो ममता सरकार के साथ खड़े रहे हैं.

इनमें से कइयों के मालिकों को ममता राज्यसभा भेज चुकी हैं. दिलचस्प बात यह है कि इन अखबारों में अंग्रेजी का कोई अखबार शामिल नहीं है. सरकार के इस फैसले की काफी आलोचना हो रही है.

"अब क्या यह भी सरकार ही तय करेगी कि लोग लाइब्रेरी में जाकर क्या पढ़ेंगे? यह निजी अधिकारों का हनन है. सरकार को हर मामले में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए."

साहित्यकार सुनील गांगुली

राज्य में लगभग ढाई हजार सरकारी या सरकारी सहायताप्राप्त पुस्तकालय हैं. इनमें अब पाठकों को महज वही आठ अखबार पढ़ने को मिलेंगे जिनकी सूची सरकार ने जारी की है.

इनमें बांग्ला का सबसे ज्यादा बिकने वाले दैनिक का नाम नहीं हैं. सरकारी अधिसूचना में कहा गया है, पाठकों के हित में सरकारी पैसे से ऐसा कोई अखबार नहीं खरीदा जाएगा जो प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर किसी राजनीतिक दल की सहायता से छपता हो. यानी इस सूची में शामिल अखबारों के अलावा बाकी तमाम अखबार सरकार की नजर में किसी न किसी राजनीतिक दल से सहायता हासिल करते हैं.

कोलकाता से हिंदी के आठ अखबार निकलते हैं. लेकिन सरकारी सूची में वही इकलौता अखबार शामिल है जिसके मालिक को ममता ने इसी सप्ताह तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर राज्यसभा में भेजा है.

वैसे, वाममोर्चा के शासनकाल में तमाम सरकारी पुस्तकालयों में बाकी अखबारों के अलावा माकपा का मुखपत्र गणशक्ति खरीदना अनिवार्य था. लेकिन उसके लिए कोई लिखित निर्देश जारी नहीं किया गया था. अब सरकार जिन अखबारों को साफ-सुथरा और निष्पक्ष मानती है उनमें से ज्यादातर को तृणमूल कांग्रेस का समर्थक माना जाता है.

सरकार की इस सूची में सबसे पहला नाम बांग्ला दैनिक संवाद प्रतिदिन का है. उसके संपादक और सहायक संपादक दोनों तृणमूल के टिकट पर राज्यसभा सांसद हैं. दूसरे अखबारों का भी ममता और तृणमूल कांग्रेस के प्रति लगाव जगजाहिर है.

सरकार की इस सूची का खुलासा होते ही इसकी चौतरफा आलोचना होने लगी है. विधानसभा में विपक्ष के नेता सूर्यकांत मिश्र और कांग्रेस विधायक असित मित्र ने विधानसभा में भी यह मुद्दा उठाया है.

मिश्र कहते हैं, ''सरकार लोकतांत्रिक व्यवस्था की नींव कमजोर करने प्रयास कर रही है.''

"वाममोर्चा के शासनकाल में माकपा का मुखपत्र खरीदने का कभी कोई लिखित आदेश जारी नहीं किया गया था. लेकिन अब हमारे सामने आंदोलन के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा है. पाठकों के सवालों से आखिर हम लोगों को ही जूझना पड़ेगा."

रंजीत सरकार, महासचिव पश्चिम बंगाल पुस्तकालय कर्मचारी समिति

कांग्रेस विधायक असित मित्र इस फैसले को लोकतांत्रिक व्यवस्था पर कुठाराघात करार देते हैं, वहीं ममता समर्थक चित्रकार शुभप्रसन्न कहते हैं, ''मुझे नहीं पता कि सरकार ने ऐसी सूची क्यों जारी की है. लेकिन आम पाठक के तौर पर मुझे यह ठीक नहीं लगता है. लोगों को हर तरह के विचार जानने का अधिकार है.''

जाने-माने साहित्यकार सुनील गांगुली सवाल करते हैं, ''अब क्या यह भी सरकार ही तय करेगी कि लोग लाइब्रेरी में जाकर क्या पढ़ेंगे? यह निजी अधिकारों का हनन है. सरकार को हर मामले में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए.''

साहित्यकार शीर्षेंदु मुखर्जी ने भी इस फैसले की आलोचना की है. वह कहते हैं, ''विभिन्न अखबारों में अलग-अलग विचारधारा की खबरों और लेखों को पढ़ कर ही आम लोगों के मन में अपनी राय बनती है. सरकार का यह फैसला अनुचित है.''

सरकार के ताजा निर्देश से पुस्तकालय के कर्मचारी भी सांसत में हैं. उनको आम पाठकों की नाराजगी का डर सताने लगा है.

पश्चिम बंगाल पुस्तकालय कर्मचारी समिति के महासचिव रंजीत सरकार कहते हैं, ''वाममोर्चा के शासनकाल में माकपा का मुखपत्र खरीदने का कभी कोई लिखित आदेश जारी नहीं किया गया था. लेकिन अब हमारे सामने आंदोलन के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा है. पाठकों के सवालों से आखिर हम लोगों को ही जूझना पड़ेगा.''

इस मुद्दे पर उभरे विवाद के बावजूद पुस्तकालय मंत्री अब्दुल करीम चौधरी ने अब तक मीडिया के सामने कोई टिप्पणी नहीं की है. सरकार अब इससे हुए नुकसान की भरपाई में जुट गई है.

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