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'स्तन' के बगैर जिंदगी

 बुधवार, 28 मार्च, 2012 को 16:32 IST तक के समाचार

(भारत में कैंसर को लेकर मेडिकल पत्रिका लेंसेट की अहम रिपोर्ट जारी होने वाली है. मल्लिका माथुर स्तन कैंसर से पीड़ित रह चुकी हैं. कैंसर के कारण उनका स्तन हटाना पड़ा है. इस लेख में वे कैंसर के खिलाफ अपनी शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक लड़ाई की कहानी बयां कर रही हैं. मल्लिका माथुर की कहानी उनकी जुबानी)

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मैं दिल्ली के पास नोएडा में अपने पति और बेटी के साथ रहती हूँ और सरकारी कर्मचारी हूँ. ये 2007 की बात होगी. मुझे शरीर में कुछ तकलीफ रहती थी. लेकिन जैसे घर में महिलाओं का रुख़ रहता है कि डॉक्टर को दिखाएँ या नहीं, मैं भी इसी तरह टालती रही. स्तन में लंप जैसा महसूस होता था.

कई जगह टेस्ट करवाने के बाद पता चला कि मुझे ब्रेस्ट कैंसर है. जब मुझे ये बात बताई गई तो मैंने अपने आप को पूरी तरह संतुलित रखा और संभाला हुआ था. लेकिन मेरे परिवार के लोग हिल गए जैसा कि कैंसर शब्द सुनकर होता है. हाहाकार जैसी स्थिति बन गई.

मैं वैसे तो बहुत संतुलित थी लेकिन खुद पर गुस्सा जरूर आया क्योंकि मेरा माँ, मौसी और परिवार की अन्य महिलाओं को कैंसर हो चुका था. इसलिए मुझे पहले ही सतर्क रहना चाहिए था.

एक अच्छी बात ये रही कि डॉक्टर ने सर्जरी से पहले हर पहलू को बहुत ही धैर्य और सलीके से समझाया. मेरे पास विकल्प था कि या तो केवल ट्यूमर को निकाल दिया जाए या फिर स्तन ही हटा दिया जाए. मैने स्तन हटवाने का निर्णय लिया. क्योंकि ऐसा न करने पर ट्यूमर फिर से लौट सकता था.

लोगों के मन में कई सवाल आते हैं कि मुझे कैसा महसूस होता होगा. ईमानदारी से कहूँ तो मुझे स्तन हटाने के बाद कुछ अटपटा नहीं लगा कि मैं कैसी दिखूँगी, सुंदर लगूँगी या नहीं. मेरा तर्क यही था कि ब्रेस्ट कैंसर के कारण तबीयत और खराब हो जाए या जान चली जाए उससे अच्छा तो ये होगा कि मैं स्तन हटवा दूँ. शरीर की विकलांगता ठीक है लेकिन जीवन ज्यादा जरूरी है. मेरी बेटी उस समय 10वीं में थी. मुझे उसके लिए मजबूत बनना था.

इस पूरे दौर में मेरा परिवार और खासकर मेरे पति ने मुझे पूरा पूरा समर्थन दिया जो ऐसे हालात में बहुत जरूरी होता है. मेरे पति को मालूम था कि मैं अपने पिता के बहुत करीब हूँ. इसलिए वे मेरे पिता को मेरे पास ले लाए. मैं और पिताजी घंटों बातें करते- ऐसी बातें जो कभी नहीं कर पाए थे.

कैंसर से जंग

स्तन कैंसर

"ब्रेस्ट कैंसर के कारण स्तन निकाले जाने के बाद लोगों के मन में कई सवाल आते हैं कि मुझे कैसा महसूस होता होगा. ईमानदारी से कहूँ तो मुझे स्तन हटाने के बाद कुछ अटपटा नहीं लगा कि मैं कैसी दिखूँगी, सुंदर लगूँगी या नहीं. मेरा तर्क यही था कि ब्रेस्ट कैंसर के कारण तबीयत और खराब हो जाए या जान चली जाए उससे अच्छा तो ये होगा कि मैं स्तन हटवा दूँ. शरीर की विकलांगता ठीक है लेकिन जीवन ज्यादा जरूरी है. मैं सुंदरता को इस नजर से नहीं देखती"

मल्लिका ठाकुर

मेरे पति ने इंटरनेट पर काफी अध्ययन किया और उन बातों पर अमल किया. उन्होंने पढ़ा कि कैंसर के दौरान जो लोग मिलने आते हैं उससे संक्रमण होने का बहुत खतरा रहता है. इसलिए मेरे पति ने मेरे सब दोस्तों को कहा कि वो जब चाहें मुझसे फोन पर बात कर सकते हैं पर कोशिश करें कि कम से कम मिलने न आएँ.

अपने कुकिंग के हुनर को भी उन्होंने मेरे लिए इस्तेमाल किया. मुझे सर आँखों पर बिठाया. मैने भी इस दौरान हिम्मत नहीं हारी. घर पर पार्टी भी करती थी. ये सब छोटी-छोटी बातें लग सकती हैं लेकिन इन सबसे मेरी सेहत और भावनात्मक स्थिति पर बहुत अच्छा असर पड़ा.

मेरी बेटी उस समय 10वीं में थी. शुरुआत में अपनी माँ को इस तरह देखकर वो काफी परेशान रहती थी क्योंकि डॉक्टर किमोथैरेपी वगैरह के दौरान उसे मुझसे मिलने भी नहीं देते थे. लेकिन समय के साथ उसने सीख लिया कि इस स्थिति से वो कैसे निपटे. लड़की होने के नाते उसके लिए भी ब्रेस्ट कैंसर के बारे में जानना जरूरी था क्योंकि ये बीमारी किसी को भी हो सकती है.

समाज में कैंसर को लेकर जागरुकता की जरूरत है और साथ ही समाज को संवेदनशील होना पड़ेगा. आज भी जब दफतर जाती हूँ तो कई लोग यही पूछते रहते हैं- क्या मैं ठीक हूँ, बिल्कुल ठीक हूँ? वो ये नहीं सोचते कि कहीं वो सामने वाले के जख्मों को फिर से कुरेद तो नहीं रहे. उस व्यक्ति को बार-बार याद दिलाने की जरूरत नहीं है.

वैसे मैं हमेशा पॉजिटिव ही रहती हूँ. कैंसर से जूझ रहे दूसरे लोगों का भी हौसला बढ़ाती हूँ. हिम्मत, अच्छे उपचार और समर्थन के सहारे मैने ब्रेस्ट कैंसर से जंग लड़ी है. लेकिन एक बात जरूर कहना चाहूँगी. औरत घर की धुरी होती है, वो सबका ध्यान रखती है, लेकिन इस भागम भाग में वो खुद को भूल जाती है.

अगर मैने शुरु में ही खुद पर ध्यान दिया होता तो स्तन हटाने की नौबत शायद नहीं आती. औरत को याद रखना चाहिए कि सबका ध्यान रखने में अपना ध्यान रखना भी शामिल है. आखिर जान है तो जहान है. और हाँ कभी ये न सोचे कि कैंसर है तो मौत निश्चित है. इससे लड़ने की ज़रूरत है...इसके आगे भी एक खूबसूरत जिंदगी है जैसी मैं जी रही हूँ.

( मल्लिका माथुर का ये लेख बीबीसी संवाददाता वंदना से बातचीत पर आधारित है)

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