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कैसे आएगा रेलवे पटरी पर?

 मंगलवार, 13 मार्च, 2012 को 06:44 IST तक के समाचार

इस बार के रेल बजट में यात्री किराया बढ़ाने की आशंका जताई जा रही है

रेलमंत्री दिनेश त्रिवेदी 14 मार्च को जब रेल बजट पेश करेंगे, तब करेंगे, उससे पहले ही बजट के बारे में मीडिया की अटकलों ने इसमें रुचि पैदा कर दी है. खुद रेलमंत्री ने कुछ अटकलें जाहिर की हैं.

मसलन, उन्होंने यात्री किराया बढ़ाने का संकेत दिया है जो उनकी बॉस और पूर्व रेलमंत्री ममता बनर्जी के रुख के विपरीत है. ममता ने कहा था कि किसी भी सूरत में मुसाफिरों पर किराए का बोझ नहीं डाला जाएगा.

वैसे बीते लगभग एक दशक से यात्री किराया नहीं बढ़ा है. जबकि ऊर्जा की बढ़ती मांग और बढ़े हुए वेतन-भत्तों की वजह से रेलवे के परिचालन की लागत तेजी से बढ़ी है.

आमतौर पर होता ये है कि रेलवे का दो तिहाई राजस्व माल ढुलाई और इससे जुड़ी दूसरी सेवाओं से आता है. वहीं एक तिहाई राजस्व यात्री किराए और संबंधित सेवाओं से मिलता है.

ये जो एक तिहाई राजस्व होता है, उससे रेलवे परिचालन की लागत की लगभग 65-70 प्रतिशत भरपाई होती है. रेलवे परिचालन की 130-135 प्रतिशत लागत माल ढुलाई और इससे जुड़ी सेवाओं से वसूल होती है.

विशेषज्ञों की राय की उपेक्षा

जानकार कहते हैं कि रेलवे की कमाई का मोटा हिस्सा उसकी माल ढुलाई सेवाओं से आता है

एक अनुमान के मुताबिक, रेलवे की संबंधित सेवाओं में वर्ष 2010-11 के दौरान 19,000 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है. हालांकि सालाना हिसाब कुछ अधिशेष कमाई के साथ बंद हुआ कि इस नुकसान की माल ढुलाई और संबंधित सेवाओं से कुछ हद तक भरपाई हो गई. लेकिन माल ढुलाई सेवाओं पर जरूरत से ज्यादा भार पड़ने से रेलवे पर दबाव बढ़ा.

विशेषज्ञों की कई समितियों ने सिफारिश की थी कि रेलवे की माल ढुलाई सेवा और यात्री सेवा, दोनों लगभग आत्मनिर्भर होनी चाहिए, 1980 के दशक में परांजपे समिति ने भी यही बात कही थी.

एक दशक बाद नानजुंडप्पा समिति ने कहा कि दोनों सेवाओं के राजस्व में परस्पर सहयोग अनिवार्य हो जाए तो ये सामान्य राजस्व पर भुगतान किए जाने वाले लाभांश के लगभग एक तिहाई तक सीमित किया जाना चाहिए.

लेकिन आम आदमी के पारिवारिक बजट को बचाने के चक्कर में इनमें से किसी सिफारिश को नहीं माना गया.

रेल बजट में खास क्या होगा

आगामी बजट में कोई एकदम नया और अनूठा विचार सामने आएगा, इसकी उम्मीद न के बराबर है. माल-भाड़े में 20 से 30 प्रतिशत तक बढोतरी होने की घोषणा पहले ही की जा चुकी है.

इस बार के रेल बजट में माल ढुलाई भाड़ा बढना तय माना जा रहा है

उम्मीद जताई गई है कि इससे सालाना दस हजार करोड़ रूपए की आमदनी होगी. हो सकता है कि इस कदम की वजह से रेलवे से माल ढुलाई कुछ कम हो जाए. निवेश के लिए संसाधनों की जरूरत होगी जिनकी पूर्ति बढ़े हुए बजट की मदद से की जाएगी.

इसके लिए भारतीय रेलवे वित्त निगम, रेल विकास निगम, ढुलाई योजनाएं और पब्लिक-प्राइवेट योजनाओं से सहयोग मिलेगा. वैसे अभी ये देखना बाकी है कि कौन सा विजन मूर्त रूप लेता है- विजन-2020, सैम पित्रोडा का विजन या कोई तीसरा विजन.

जस्टिस खन्ना समिति ने विशेष योजनाओं को लागू करके रेलवे परिचालन में सुरक्षा बढ़ाने की वर्ष 1998 में अनुशंसा की थी. उन्होंने इसके लिए 17000 करोड़ रुपए का एक विशेष कोष बनाने की भी बात कही थी. इसके बाद बिना किसी विशेष उपाए के सुरक्षा जरूरतों को पूरा करना था.

अब मीडिया में आ रही खबरों में काकोडकर और सैम पित्रोडा समिति की रिपोर्टों के हवाले से संकेत दिए जा रहे हैं कि इसकी भरपाई यात्री किराया बढ़ाकर की जाएगी.

रेलमंत्री लालू प्रसाद का जमाना

रेलमंत्री लालू प्रसाद के जमाने में रेल मंत्रालय टेक्नोक्रेट्स के हवाले था. मंत्रालय से लालू प्रसाद की रवानगी के बाद भारतीय रेलवे की समृद्धि कम होती गई.

विशेषज्ञों का कहना है कि लालू प्रसाद के रेल बजट भारतीय रेलवे के लिए मुनाफा का सौदा साबित हुए

उनके कार्यकाल में नौ हजार करोड़ रूपए से ज्यादा के निवेश योग्य संसाधन जुटाए गए और टिकाऊ तरीके से खर्च भी किए गए. इसमें भी कोई संदेह नहीं है कि देश के उस समय के बढिया आर्थिक हालात ने भी इसमें योगदान दिया.

लेकिन लालू प्रसाद के बाद बने रेलमंत्री इस जिम्मेदारी से नहीं बच सकते कि रेलवे का कोष कम हुआ, जरूरी भुगतान में विलंब हुआ और तमाम ऐसी बातें हुईं जो नहीं होनी चाहिए थी.

भारतीय रेलवे की आर्थिक हालत खस्ता होने के तीन प्रमुख कारण हैं. पहला ये कि निवेश के लिए जिन परियोजनाओं का चयन किया गया, उनकी कभी ठीक से कल्पना ही नहीं की गई थी. दूसरी वजह ये रही कि रेल मंत्रालय ने रेलवे की गतिविधियों के खर्च की परवाह नहीं की.

आमदनी अठन्नी, खर्चा रुपैया

तीसरा कारण ये था कि उसने यात्री किराया और ढुलाई भाड़ा तय करते वक्त सेवाओं की लागत पर ध्यान नहीं दिया. रेलवे परिचालन की जरूरतों और आर्थिक व्यावहारिकताओं के बावजूद भी कई परियोजनाओं को विशुद्ध रूप से राजनीतिक विचार-विमर्श के माध्यम से पूरा किया जा सकता था.

मुंबई की लोकल ट्रेन का नजारा

इस तरह की परियोजनाएं लंबित आबंटित परियोजनाओं की शक्ल में ठंडे बस्ते में पड़ी हैं. इनकी लागत भी बढ़ते-बढ़ते अब एक लाख करोड़ रूपए हो गई है और इन्हें पूरा करने के लिए लगभग 40 वर्ष का समय चाहिए.

भारतीय रेलवे के पास खर्चों पर नियंत्रण के उपाए तो हैं लेकिन लागत तय करने का कोई वैज्ञानिक तंत्र नहीं है. लागत तय करने की प्रणाली भी प्रतिस्पर्धा कम करने के लिए अस्तित्व में आई.

यदि सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए तो लागत का हिसाब उत्पाद या सेवा का सही मूल्य तय करने में मदद कर सकता है जो न बहुत अधिक होगा और न ही इतना कम कि कोई फायदा ही न हो और घाटा ही घाटा हो.

रेलवे पर विशेषज्ञों की कई समितियों ने इस ओर ध्यान देने की जरूरत पर बल दिया है लेकिन ऐसा लगता है कि भारतीय रेलवे में सटीक लागत प्रणाली शुरू करने की राह में कई अड़चने हैं.

अव्यावहारिक योजनाएं

भारतीय रेलवे को ऐसी परियोजनाओं को मंजूरी नहीं देना चाहिए तो व्यावहारिकता की कसौटी पर कसी नहीं जा सकती. पचास करोड़ रूपए से ज्यादा की परियोजनाओं पर अलग से विचार किया जाना चाहिए और अन्य मंत्रालयों के सचिवों से भी इन पर चर्चा होनी चाहिए.

लेकिन जैसा कि राकेश मोहन विशेषज्ञ समूह ने पाया कि इसके बाद 15 वर्ष के अवधि में अधिकतम उतार-चढ़ाव आ चुका है. एक अध्ययन से पता चलता है कि लागत के हिसाब लंबित 70 प्रतिशत से ज्यादा परियोजनाएं व्यावहारिक ही नहीं हैं.

दुनिया का कोई भी वाणिज्यिक संगठन इस किस्म के गैर-उत्पादक निवेश को जारी नहीं रख सकता है. अपनी मौजूदा खस्ताहाल वित्तीय दशा से बाहर निकलने के लिए भारत रेलवे को एक वाणिज्यिक संगठन की तरह काम करना होगा और अपने मुनाफे के दो फीसद तक ही कार्पोरेट-सोशल रिस्पोंसेबिलिटी निभानी चाहिए.

भारतीय रेलवे की जो मौजूदा अपरिभाषित भूमिका है, उसे परिभाषित किया जाना चाहिए ताकि वो वाणिज्यिक संगठनों की तरह एक तय वित्तीय लक्ष्य के साथ काम कर सके.

निवेश, कर्ज से छुटकारा पाने, सही मूल्य निर्धारण, खरीदारी आदि पहलुओं पर भारतीय रेलवे के लिए एक राष्ट्रीय नीति बनानी चाहिए जिसे बाकायदा मंजूरी दी जानी चाहिए ताकि ये सब बातें मंत्रियों या नौकरशाहों की सनक और कल्पना के भरोसे नहीं रहें.

वर्ष 1994 में कैपिटल रीस्ट्रक्चरिंग कमेटी यही सब सुझाव और सिफारिशें दी थीं जिसे तब भारतीय रेलवे के चार्टर की संज्ञा दी गई थी. इस कमेटी की रिपोर्ट पर धूल जमी हुई है जिसे झाड़ने और उसके मुताबिक काम करने की जरूरत है.

(लेखक रेलवे के पूर्व वित्त आयुक्त और भारत सरकार के पदेन सचिव रहे हैं.)

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