'हिंदुत्व के घृणित रुप' की वापसी का खतरा

 गुरुवार, 1 मार्च, 2012 को 05:14 IST तक के समाचार

अयोध्या के कारसेवकपुरम में अभी भी मंदिर निर्माण की कोशिशें चल रही हैं.

अयोध्या और गोधरा राजनीतिक हिंदुत्व के दो बड़े प्रतीक के रुप में उभरे हैं लेकिन लोग मानते हैं कि अभी भी राजनीतिक हिंदुत्व के घृणित रुप की वापसी का खतरा बरकरार है.

राजनीतिक हिंदुत्व के इतिहास में ये दोनों महत्वपूर्ण माने जाते हैं. जहां अयोध्या ने एक राजनीतिक दल को सत्ता में पहुंचाया वहीं गोधरा ने इसे सत्ता से बेदखल करने में एक बड़ी भूमिका निभाई.

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तो क्या इन दोनों घटनाओं को राजनीतिक हिंदुत्व के उत्थान और पतन के प्रतीकों के रुप में देखा जा सकता है. पत्रकार मधुकर उपाध्याय कहते हैं, ‘‘ ये दोनों प्रतीक हैं और महत्वपूर्ण बात ये है कि इन दोनों घटनाओं से पहले ही इन्हें प्रतीक बनाने की शुरुआत हुई थी.’’

राजनीतिक नफा-नुकसान

अयोध्या में बाबरी मस्ज़िद गिराए जाने का राजनीतिक फायदा हुआ लेकिन क्या गोधरा का भी फ़ायदा हुआ.

मधुकर कहते हैं, ‘‘ अयोध्या का फायदा तो राजनीतिक था केंद्र में सरकार बनने का. गोधरा की घटना ने भी राजनीति को परिभाषित किया कि आपको चीज़ों को वैसे ही देखना होगा जैसा हम चाहते हैं.’’

अयोध्या या गोधरा में ऐसी परिभाषा खोजने पर तो नहीं मिलती है लेकिन दिखाई ज़रुर देती है. अयोध्या में बाबरी की घटना होने से पहले रामजन्मभूमि की बात ज़रुर होती थी लेकिन ये सबसे बड़ा आकर्षण नहीं था लेकिन अब अयोध्या का सबसे बड़ा आकर्षण तिरपाल के नीचे रामलला की मूर्ति है.

मधुकर उपाध्याय, पत्रकार

"हिंदुत्व राजनीतिक ही होता है. इन्हें एक मैग्नीफाइंग ग्लास चाहिए जिसके जरिए वो सारी बातों को एक जगह फोकस कर सकें. जहां फोकस होगा वो जलेगा. अयोध्या और गोधरा अंतिम नहीं है. ऐसा फिर हो सकता है लेकिन स्वरुप क्या होगा ये साफ नहीं है"

ये कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि अयोध्या ने हिंदुत्व की राजनीति करने वालों को फायदा पहुंचाया लेकिन क्या गोधरा का नुकसान नहीं हुआ.

जेएनयू के छात्र यशवंत कहते हैं, ‘‘ बाबरी कांड के साथ लोगों ने खुद को जोड़ा. कांग्रेस और बीजेपी ने भी एक कोज़ीनेस दिखाई लेकिन गोधरा के साथ ऐसा नहीं हुआ.’’

एक अन्य छात्र अमृत कहते हैं कि गोधरा की घटना महत्वपूर्ण है क्योंकि यह एक आंतरिक सफाई की प्रक्रिया भी थी जिसने हिंदुत्व की सीमाएं दिखाई और ये सोचने पर मज़बूर किया कि हम चाहते क्या हैं.

छात्रों और लोगों की राय अलग अलग है हिंदुत्व की राजनीति पर. लेकिन ये मुद्दा जटिल है जहां मिथ निर्माण और राष्ट्र निर्माण को एक कर दिया गया है.

हिंदुत्ववादी दलों का प्रभाव

जहां अयोध्या में आज भी कारसेवकपुरम में मंदिर के लिए शिलाओं का निर्माण जारी है वहीं गुजरात या गोधरा में मुसलमानों के साथ भेदभाव भी चरम पर है. हालांकि देखने वाली बात ये भी है कि जहां भारत में हिंदुत्ववादी दलों का प्रभाव घट रहा है वहीं गुज़रात में यह प्रभाव बढ़ रहा है.

गुजरात के समाजशास्त्री अच्युत याग्निक कहते हैं कि इसमें भी मध्यम वर्ग की भूमिक बड़ी है.

वो कहते हैं, ‘‘ गुजरात में औद्योगीकरण और शहरीकरण तेज़ी से हुआ जिसने मध्य वर्ग को शक्तिशाली बनाया लेकिन साथ ही इसे पहचान का संकट भी होने लगा. जाति की दीवारें मिटीं तो संप्रदायों ने इनके मानस पर कब्ज़ा किया जिसका परिणाम हम देखते हैं कि गुजरात का मध्य वर्ग हिंदुत्व का समर्थक है. यहां मुसलमानों को घृणा के भाव से देखा जाता है. लेकिन पूरे भारत में ऐसा संभव नहीं हो सकता है.’’

यानि कि जहां औद्योगीकरण होगा, विकास होगा वहां पहचान का संकट बढ़ेगा और हिंदुत्व या इस तरह की ताकतों को भी बढ़ावा मिलेगा. जेएनयू के छात्र कहते हैं हिंदुत्व को ही पुर्नपरिभाषित करने की ज़रुरत है.

जेएनयू के कुछ छात्र मानते हैं कि हिंदुत्व की फिर से परिभाषा होनी चाहिए

यशवंत कहते हैं, ‘‘ यशवंत कहते हैं कि गोधरा के बाद विकल्प नहीं मिला है वरना परिभाषा बदलने की कोशिश हो रही है.’’ अमृत कहते हैं कि हिंदुत्व की सीमाएं पता चलीं लेकिन और परिभाषाएं तो संभव है हीं.

हिंदुत्व की परिभाषा

कई छात्र हिंदुत्व की अच्छी परिभाषा की भी बात करते हैं.

इसका अर्थ ये हुआ कि फिर परिभाषाएं गढ़ी जाएंगी फिर मिथ निर्माण होगा. मधुकर चेतावनी के लहज़े में कहते हैं कि ऐसा होगा लेकिन इसके स्वरुप का ढांचा अभी तैयार नहीं हुआ है.

वो कहते हैं, ‘‘ हिंदुत्व राजनीतिक ही होता है. इन्हें एक मैग्नीफाइंग ग्लास चाहिए जिसके जरिए वो सारी बातों को एक जगह फोकस कर सकें. जहां फोकस होगा वो जलेगा. अयोध्या और गोधरा अंतिम नहीं है. ऐसा फिर हो सकता है लेकिन स्वरुप क्या होगा ये साफ नहीं है.’’

तो फिर तैयार रहना होगा सभी को चाहे वो हिंदुत्व के विरोधी हों या समर्थक हिंदुत्व की एक और राजनीतिक लहर के लिए जो न जाने इसे उत्थान की ओर ले जाएगी या पतन की ओर.

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