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अगर मैं हारी, तो तुम ज़िम्मेदार: मायावती

 शुक्रवार, 17 फ़रवरी, 2012 को 17:11 IST तक के समाचार
मायावती की रैली

वो अपने समर्पित मतदाताओं दलितों से सीधे बात कर रही थी. मैंने राहुल गांधी और मुलायम सिंह यादव की भी रैली देखी थी, लेकिन कांग्रेस और समाजवादी पार्टी की उन दो बड़ी रैलियों से उलट मुख्यमंत्री मायावती ने तैयार किए गए भाषण को पढ़ा.

बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष कुशलतापूर्वक अपनी स्क्रिप्ट से बँधी रहीं. उन्होंने क़रीब 45 मिनट तक भाषण दिया. उनकी आवाज़ न तो बहुत बुलंद थी और न ही कमज़ोर.

मायावती ने अपने समर्थकों से कहा कि वे उनके साथ मजबूती से टिके रहे. दिल्ली से 320 किलोमीटर दूर इटावा में इस रैली के दौरान लंबी शुरुआत के बाद मायावाती मुद्दे पर आईं.

तीन बार उन्होंने कहा- आपकी लापरवाही और नासमझी की वजह से समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी सत्ता में आ सकती हैं.

और फिर क्या होगा? समाजवादी पार्टी का मतलब है 'जंगल राज' की वापसी. कांग्रेस का मतलब पलायन और ग़रीबी. अगर भाजपा सत्ता में आई तो इसका मतलब ये हुआ कि सांप्रदायिक और सामंतवादी शक्तियाँ सत्ता में आ जाएँगी.

सुरक्षा

मायावती की रैली में बड़ी संख्या में महिलाएँ भी आईं. भीड़ को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, "अंधेरा ढलने के बाद आपकी माँ और बहनें सुरक्षित नहीं होंगी. आपको इस पर ध्यान देना होगा."

"समाजवादी पार्टी का मतलब है 'जंगल राज' की वापसी. कांग्रेस का मतलब पलायन और ग़रीबी और अगर भाजपा सत्ता में आई तो इसका मतलब ये हुआ कि सांप्रदायिक और सामंतवादी शक्तियाँ सत्ता में आ जाएँगी"

मायावती

रैली में दलित समुदाय की असुरक्षा की बात भी उठनी ही थी और इसे उठाया भी गया. मायावती ने ये भी कहा कि अगर मतदाता उन्हें जिताते हैं, तो दलित महिलाएँ सुरक्षित रहेंगी.

पैंतालिस मिनट तक चले भाषण में मायावती ने अपने को ऐसे नेता के रूप में प्रदर्शित किया, जो अपने मतदाताओं से बात करने के लिए मीडिया की भी उपेक्षा करना चाहती हैं.

मुझे ऐसा लगा कि मायावती साउंड बाइट पत्रकारिता में विश्वास नहीं करती. वे अपने समर्थकों के सामने ही अपनी बात रखना चाहती हैं और इसका मतलब अगर ये है कि उन्हें तैयार किए गए भाषण से बोलना पड़ता है, तो ऐसा होता रहे.

इटावा का नुमाइश मैदान पूरी तरह भरा हुआ था. मायावती अपना भाषण ख़त्म करने को थी, लेकिन लोगों का आना जारी थी. कई लोग अपनी मोटरसाइकिल से आए थे, तो अन्य ट्रैक्टर और ट्रेलर पर.

नाराज़गी

"पिछले तीन दिनों में मैंने राज्य के कई इलाक़ों का दौरा किया है. बार-बार लोगों ने बिजली की कमी की शिकायत की है. गुरुवार की शाम कन्नौज से कानपुर की यात्रा के दौरान मैंने सिर्फ़ इन्वर्टर के बल्ब और मोमबत्ती की मद्धम रोशनी देखी है. बिजली नहीं थी"

मायावती

मैदान काफ़ी बड़ा था और भीड़ काफ़ी थी, इसलिए मैं 'बहनजी' को नहीं देख सकता था. लेकिन उनकी आवाज़ स्पष्ट रूप से सुनी जा सकती थी. मुलायम सिंह की रैली से अलग मायावती की रैली में साउंड सिस्टम भरोसेमंद था और नाकाम नहीं हुआ.

कांग्रेस पार्टी के प्रति उनका ग़ुस्सा स्पष्ट था. उन्होंने समाजवादी पार्टी से ज़्यादा कांग्रेस पर हल्ला बोला. हालाँकि इस विधानसभा चुनाव में सपा को बसपा का मुख्य प्रतिद्वंद्वी माना जा रहा है.

लेकिन अपने संबोधन में मायावती ने कांग्रेस के मुख्य प्रचारक राहुल गांधी का कोई जिक्र नहीं किया.

उन्होंने कहा कि कांग्रेस के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने उत्तर प्रदेश को कुछ नहीं दिया है. मायावती ने ये भी स्पष्ट किया कि पाँच वर्षों में जो भी उन्होंने किया है, वो कांग्रेस और उसके रवैए के बावजूद किया है.

इसके बाद वे शायद राज्य के लोगों की सबसे गंभीर समस्या के मुद्दे पर आईं- बिजली की कमी.

शिकायत

मायावती

मायावती को अपने भविष्य की चिंता भी है

मायावती ने कहा, "पिछले तीन दिनों में मैंने राज्य के कई इलाक़ों का दौरा किया है. बार-बार लोगों ने बिजली की कमी की शिकायत की है. गुरुवार की शाम कन्नौज से कानपुर की यात्रा के दौरान मैंने सिर्फ़ इन्वर्टर के बल्ब और मोमबत्ती की मद्धम रोशनी देखी है. बिजली नहीं थी."

उन्होंने ये स्वीकार किया कि बिजली की कमी समस्या है. लेकिन उन्होंने ये भी दावा किया कि अगले कुछ वर्षों में इस समस्या का समाधान किया जा सकता है बशर्ते केंद्र सरकार इसमें दखल न दे.

मायावती ने भ्रष्टाचार के मुद्दे पर भी अपने विरोधियों को नहीं बख्शा. उन्होंने कहा- पिछले 31 महीनों से कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार दूसरी बार सत्ता में है और इस दौरान 62 बड़े घोटाले हुए हैं. भाजपा के नेतृत्व में कर्नाटक में खनन घोटाले हुए हैं और समाजवादी पार्टी के खाते में भी पहले के कई भ्रष्टाचार के मामले हैं.

मायावती शायद ये बताना चाह रही थी कि उन लोगों को पहचानिए, जो उनके ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हैं.

स्पष्ट रूप से मायावती को इस बात की चिंता है कि उनका भविष्य क्या हो सकता है? लेकिन राहुल गांघी और मुलायम सिंह यादव की तरह उन्हें भी छह मार्च तक इंतज़ार करना होगा.

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