अब 'ब्लू सिटी' बनेगा कोलकाता

 मंगलवार, 14 फ़रवरी, 2012 को 11:54 IST तक के समाचार
ब्लू सिटी

महानगर में रोड डिवाइडर से लेकर फ्लाईओवरों, पार्कों की चारदीवारियों और पेड़ों तक को सफेद और नीले रंगों से सजाया जा रहा है.

पिंक सिटी जयपुर की तर्ज पर पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता भी अब जल्दी ही ब्लू सिटी में बदल जाएगा.

बदलाव की लहर पर सवार होकर पिछले साल बंगाल की सत्ता संभालने वाली मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने चटख नीले रंग को इस महानगर की थीम बनाने का फैसला किया है.

उनके निर्देश पर महानगर में रोड डिवाइडर से लेकर फ्लाईओवरों, पार्कों की चारदीवारियों और पेड़ों तक को सफेद और नीले रंगों से सजाया जा रहा है.

यही नहीं, अब महानगर की पहचान रही परंपरागत पीले रंग की टैक्सियां भी जल्दी ही सफेद और नीले रंग में रंगी नजर आएंगी.

परिवहन विभाग ने राज्य की तमीम सरकारी बसों को भी परंपरागत लाल रंग की बजाय इसी रंग में रंगने का फैसला किया है.

'धन की बर्बादी'

विपक्ष ने सरकार की इस सौंद्रीयकरण योजना की खंचाई करते हुए इसे धन की बर्बादी करार दिया है. सरकार की इस योजना पर 80 करोड़ रुपए खर्च होंगे.

तृणमूल कांग्रेस के सांसदों ने तो सांसद विकास निधि के धन का इस्तेमाल भी कोलकाता को ब्लू सिटी में बदलने पर खर्च करने का फैसला किया है.

कोलकाता नगर निगम के पार्षदों को इसके लिए योजनाएं बनाने को कहा गया है.

ममता के पसंदीदा रंग में कोलकाता को रंगने के लिए पहले चरण में फ्लाईओवरों, फुटपाथ के किनारे लगी बाड़, पार्कों, लैंप पोस्टों और यहां तक कि सड़क के किनारे लगे पेड़ों को शामिल किया गया है.

महानगर में विक्टोरिया मेमोरियल के सामने मैदानी इलाके में लगे तमाम पेड़ और लैंप पोस्टों को रंगने का काम पूरा हो गया है.

नगर निगम के मेयर शोभन चटर्जी कहते हैं, ''जयपुर अगर पिंक सिटी बन सकता है तो कोलकाता ब्लू सिटी क्यों नहीं हो सकता ? यह रंग देखने में तो सुंदर है ही, आंखों के लिए भी अच्छा है.''

वह कहते हैं कि पार्कों, लैंप पोस्टों और सड़क किनारे लगी लोहे की बाड़ों को रंगने से उनको जंग लगने से बचाया जा सकता है. दिलचस्प बात यह है कि

सरकार ने अपनी इस सौंदर्यीकरण योजना के तहत उन पार्कों का रंग भी बदल दिया है जिनको दो महीने पहले ही हरे रंग में रंगा गया था.

कोलकाता नगर निगम में विपक्षी सीपीएम की नेता रूपा बागची इसे धन की बर्बादी करार देती हैं.

वह कहती हैं, ''महानगर के कई पार्कों की हालत दयनीय है. ऐसे में धन की इस बर्बादी से निगम को आर्थिक दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है.

नागरिक समस्याओं के समाधान और महानगर की टूटी-फूटी सड़कों की मरम्मत की बजाय रंग बदलने का यह फैसला बेमतलब है.''

पर्वारणविदों ने भी खासकर पेड़ों के तनों को 'आयल' पेंट से रंगने के फैसले पर नाराजगी जताई है.

रंग नहीं 'जहर'

पर्यावरणविद प्रणवेश सान्याल कहते हैं, ''सरकार पेड़ों पर जहर लगा रही है. इस रंग के चलते पेड़ सांस नहीं ले सकते.''

पहले पेड़ों के तनों पर चूना लगाया जाता था ताकि अंधेरे में कोई वाहन उनसे टकरा न जाए.

यही नहीं, सरकार ने इस योजना के तहत महानगर की टैक्सियों को भी पारंपरिक पीले से सफेद और नीले रंग में रंगने का फैसला किया है. लेकिन विभिन्न टैक्सी मालिक संगठनों ने इस पर आपत्ति जताई है.

"'जयपुर अगर पिंक सिटी बन सकता है तो कोलकाता ब्लू सिटी क्यों नहीं हो सकता ? यह रंग देखने में तो सुंदर है ही, आंखों के लिए भी अच्छा है. "

मेयर शोभन चटर्जी

परिवहन मंत्री मदन मित्र की दलील है कि टैक्सियों और बसों को एक ही रंग में रंगने पर कलर थीम में समानता आएगी और महानगर का सौंदर्य कई गुना बढ़ जाएगा. लेकिन बंगाल टैक्सी एसोसिएशन ने सरकार के इस फैसले का विरोध किया है. एसोसिएशन के सचिव विमल गुहा कहते हैं, ''टैक्सी का रंग बदलने में लगभग सात हजार रुपए खर्च होंगे. टैक्सी मालिक यह खर्च उठाने की स्थिति में नहीं हैं.''

उन्होंने सरकार से इसके लिए सब्सिडी देने की मांग की है. परिवहन मंत्री के साथ 18 फरवरी को यहां होने वाली बैठक में इन संगठनों ने अपनी आपत्तियां जता कर सरकार से सब्सिडी मांगने का फैसला किया है.

क्या कहते हैं आम लोग

जहां तक आम लोगों का सवाल है, उनकी प्रतिक्रिया मिलीजुली है. एक निजी दफ्तर में काम करने वाली सुरभि भटट्टाचार्य कहती हैं, ''नया रंग अच्छा ही लग रहा है. इससे शहर की सुंदरता निखर गई है.''

लेकिन स्कूल छात्र मनोतोष दास कहते हैं, ''सरकार यह रकम सड़कों और बसों की दशा सुधारने पर खर्च करती तो बेहतर होता.''

आम लोग या विरोधी चाहे कुछ भी कहें, सरकार महानगर को ब्लू सिटी में बदलने की अपनी योजना पर दिल खोल कर खर्च कर रही है.

दिलचस्प बात यह है कि कोलकाता नगर निगम ने ममता के इस पसंदीदा रंग यानी सफेद और नीले रंग से अपना मकान रंगवाने वाले तमाम मकान मालिकों को संपत्ति कर में भी छूट देने का फैसला किया है.

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