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पहचान पत्र योजना 'आधार' के दो साल

 सोमवार, 13 फ़रवरी, 2012 को 16:26 IST तक के समाचार
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इस योजना को लेकर विवाद भी पैदा हुआ है

जहांगीरपुरी दिल्ली की सबसे बड़ी झुग्गी झोपड़ियों की बस्ती है जहां ज्यादातर कूड़ा उठाने वाले और दिहाड़ी वाले मजदूर रहते हैं. उनमें से कई लोग एक कमरे के दफ्तर के बाहर कतार में खड़े हैं.

एक-एक कर वे अंदर जाते हैं जहां दो युवक उनका ब्यौरा एक कंप्यूटर में डालते हैं, उनकी तस्वीर और उंगलियों के निशान लेते हैं और उनकी आँखों को स्कैन करते हैं.

पूरे देश में तमाम केंद्रों पर इस तरह की प्रक्रिया चल रही है.

पिछले दो सालों से भारत सरकार दुनिया की सबसे बड़ी और सबसे अधिक प्रगतिशील परियोजना में डाटा इकट्ठा कर रही है. इस योजना के तहत देश की लगभग सवा अरब जनसंख्या को विशिष्ट पहचान नंबर या आधार (यूआईडी) कार्ड दिए जाने हैं.

जहांगीरपुरी केंद्र की देख-रेख करने वाले रविंदर कुमार का कहना है, ''जब से हमने ये केंद्र शुरू किया है यहां पर हर रोज सैकड़ों लोग आ रहे हैं.''

कतार में एक दिहाड़ी मजदूर कमला भी खड़ी हैं. उन्हीं की तरह के बहुत से गरीब लोगों को इस परियोजना से सबसे अधिक फायदा होने की उम्मीद है.

इन लोगों के पास कोई पहचान पत्र नहीं है जिसकी वजह से इन्हें सस्ते खाद्य-पदार्थ, टेलीफोन और बैंक खाते नहीं मिल पाते.

उनका कहना है, ''पहचान पत्र के बिना कोई भी काम करना बड़ा मुश्किल है. हमें सस्ते तेल या खाद्य पदार्थ लेने के लिए अक्सर रिश्वत देनी पड़ती है. ''

उन्होंने कहा, ''मुझे उम्मीद है कि पहचान पत्र से हालात सुधरेंगे. हम सस्ता खाना खरीद पाएंगे और मैं अपने बच्चों को पढ़ा पाउंगी.''

उद्देश्य

साल 2010 में इसकी शुरुआत से अब तक लगभग 20 करोड़ पहचान पत्र बनाए जा चुके हैं. उद्देश्य यह है कि साल 2014 तक आधी जनसंख्या के पहचान पत्र बनाए जाएं.

"हम एक दिन में औसतन 10 लाख लोगों के पहचान पत्र बना रहे हैं. पूरे देश में हमारे 20,000 से अधिक केंद्र हैं जहां पर यह काम हो रहा है."

नंदन नीलकनी

भारत की बड़ी कंपनी इंफोसिस के पूर्व प्रमुख नंदन नीलेकणी इस योजना के प्रमुख हैं. उनका कहना है, ''हम एक दिन में औसतन 10 लाख लोगों के पहचान पत्र बना रहे हैं. पूरे देश में हमारे 20,000 से अधिक केंद्र हैं जहाँ पर यह काम हो रहा है.''

उन्होंने कहा, ''हमें यकीन है कि हमने एक प्रणाली को स्थापित कर लिया है और अब सवाल केवल इसे फैलाने का है ताकि इसे हर गली और नुक्कड़ तक पहुंचाया जाए.''

अहमियत

देश के सबसे गरीब राज्यों में से एक झारखंड में इस पहचान पत्र की अहमियत का अंदाजा लगता है.

गांव के लोग स्थानीय परिषद के दफ्तर में पगार लेने ले लिए खड़े हैं. लेकिन इस बार उनका वेतन उनकी उंगलियों के निशान जांचने के बाद उनके पहचान पत्र के नंबर देख कर दिया जा रहा है.

यूआईडी मुख्यालय में बतौर सहायक महानिदेशक कार्यरत राजेश बंसल ने कहा, ''एक अनुमान के मुताबिक सरकार कल्याण के कार्यक्रमों पर हर साल 60 अरब डॉलर खर्च करती है.''

इसमें से बहुत सारा पैसा उन लोगों तक नहीं पहुंच पाता जिनके लिए यह होता है. इसमें से कुछ लाल फीताशाही की भेंट चढ़ जाता है और कुछ दलालों या भ्रष्टाचार के हाथ पढ़ जाता है.

बंसल का कहना है,''इससे हमारी प्रणाली में पारदर्शिता बढ़ेगी क्योंकि इससे पैसा केवल उसे मिलेगा जो इसके हकदार हैं. इससे सारी प्रणाली की देखरेख करना भी आसान है.''

लेकिन इस योजना को लेकर विवाद भी पैदा हुआ है. इस पर हो रहे खर्च, डाटा के गलत इस्तेमाल और देश की सुरक्षा को लेकर खतरे पर चिंता जताई गई है.

फिलहाल सरकार सहमत हो गई है कि इन खतरों से बचने के उपाए ढूंढे जाएं और आधार परियोजना रफ्तार पकड़ रही है.

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