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उत्तराखंड में किसकी बनेगी सरकार?

 रविवार, 29 जनवरी, 2012 को 18:38 IST तक के समाचार
उत्तराखंड

पहाड़ी राज्य उत्तराखंड में ख़राब मौसम का असर मतदान पर पड़ सकता है.

ख़राब मौसम, मौजूदा सरकार का विरोध, भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप और बाग़ी उम्मीदवार उत्तराखंड में भारतीय जनता पार्टी और 70 सीटों वाली विधान सभा में पूर्ण बहुमत के बीच आ रहे हैं.

वैसे पिछले दो वर्षों से भाजपा प्रदेश में अपनी छवि सुधारने के भरपूर प्रयास करती रही है.

इसके तहत जनवरी 2009 में पद से हटाए गए भुवन चंद्र खंडूरी को सितंबर 2011 में दोबारा मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंप दी गई थी.

जब खंडूरी की कुर्सी गई थी तब प्रदेश में भाजपा के भीतर घमासान मची हुई थी. बहराल उनके पहले कार्यकाल के दो साल बाद हुए कथित भ्रष्टाचार के चलते ही आगामी चुनाव भाजपा के लिए महंगे साबित हो सकते हैं.

विकास में ढील

रमेश पोखरियाल के दो साल के कार्यकाल में न सिर्फ़ भ्रष्टाचार के आरोप लगे बल्कि एक आम धारणा ये भी रही कि पार्टी की आला कमान ने इस सब की अनदेखी भी की.

ग़ौरतलब है कि मुख्यमंत्री पद से हटाए जाने के पंद्रह दिन बाद ही रमेश पोखरियाल को भाजपा का उपाध्यक्ष बना दिया गया और 2012 के विधान सभा चुनावों में उनको टिकट भी दिया गया.

अपने कार्यकाल में रमेश पोखरियाल निशंक उत्तराखंड के लिए कोई भी दूरगामी विकास कार्य करने में नाकाम रहे थे.

राज्य में सभी विकास कार्य ठप पड़ गए और यहाँ तक कि प्रदेश में सड़कों के निर्माण जैसी मूलभूत चीज़ें बद से बदतर होती चलीं गईं.

घूस लेने के मामले बढ़ने के साथ साथ व्यापक भ्रष्टाचार ने ख़ासा नुकसान भी किया.

चुनाव की तैयारी

जब भारतीय जनता पार्टी ने दो आतंरिक सर्वेक्षण करवाए तब जाकर उसे इस बात का आभास हुआ कि पार्टी चुनाव में पराजय की ओर अग्रसर है.

भारतीय जनता पार्टी

भारतीय जनता पार्टी के समक्ष बाग़ी उम्मीदवार बड़ी चुनौती हैं.

अपने चार महीने के कार्यकाल में भुवन चंद्र खंडूरी ने कई ऐसे प्रयास किए जिससे भ्रष्टाचार की छवि से निजात मिल सके.

इनमे से एक रहा लोकायुक्त क़ानून पर मुहर लगाना और आम लोगों की समस्याओं से निपटने के लिए एक विशेष सरकारी विभाग का गठन.

हालांकि इस बात का पूरा अनुमान लगाना अभी ज़रा मुश्किल है कि खंडूरी के इन भ्रष्टाचार विरोधी क़दमों का पार्टी को चुनाव में कितना फ़ायदा होने वाला है.

भारतीय जनता पार्टी के समक्ष एक और बड़ी चुनौती है बाग़ी उम्मीदवारों के रूप में.

पार्टी ने अपनी छवि सुधारने वाली मुहिम में एक-तिहाई मौजूदा विधायकों को इस बार टिकट नहीं दिया और माना जा रहा है कि रमेश 'निशंक' अपने साथ हुए कथित गलत व्यवहार का बदला इन विधायकों को उकसा कर ले रहे हैं.

मौसम की मार

उत्तराखंड विधान सभा चुनावों में जिस बात का शायद बड़ा फर्क पड़े वो है बर्फ़बारी!

चुनाव आयोग तो कम से कम इस ख़राब मौसम के बावजूद अपने तय कार्यक्रम के हिसाब से ही आगे बढ़ा है.

ग़ौर करने वाली बात ये भी है कि राज्य के ऊंचाई वाले हिस्सों में भारी बर्फ़बारी का असर भाजपा पर ज़्यादा और कांग्रेस पर कम पड़ेगा.

कुमाऊँ और गढ़वाल की ऊंची पहाड़ियों वाले इलाके में भाजपा के पास ख़ासा समर्थन रहता है जबकि कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी का पलड़ा राज्य के मैदानी क्षेत्रों में भारी रहा है.

माना यही जा रहा है कि ख़राब मौसम के चलते कम से कम 24 सीटों पर असर पड़ सकता है.

परिसीमन

दूसरे राज्यों की तरह उत्तराखंड में भी चुनाव क्षेत्रों के परिसीमन का व्यापक असर पड़ने की उम्मीद है और ये मुद्दा शायद आगामी विधान सभा का प्रारूप बदल कर रख दे.

नारायण दत्त तिवारी

कांग्रेस के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी भी चुनाव प्रचार कर चुके हैं.

इन चुनावों के पहले तक राज्य की 70 विधान सभा सीटों में से 42 पहाड़ी क्षेत्र के अंतर्गत आतीं थीं.

लेकिन परिसीमन के बाद इन सीटों की संख्या घट कर 36 रह गई है.

वजह है जनसँख्या का और ख़ासतौर से युवा वर्ग का दूसरे राज्यों में नौकरी की तलाश में जा कर बसना.

जबकि राज्य के मैदानी इलाकों में पड़ोसी राज्यों से आकर बसने वालों की संख्या में भी बढ़ोत्तरी हुई है.

कांग्रेस की सामने चुनौती

हालांकि भाजपा के आतंरिक हालातों का ये मतलब निकाल लेना भी ग़लत होगा कि कांग्रेस के लिए इन चुनावों में डगर बहुत आसान है.

कांग्रेस के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती है पिछले पांच वर्षों में दरकिनार की गई सकारात्मक राजनीति.

अन्य बातें जो कांग्रेस के खिलाफ़ जा सकती है वो है प्रदेश में भ्रष्टाचार के खिलाफ़ आवाज़ उठा पाने की नाक़ामी और आतंरिक कलह.

शायद सबसे बड़ा मुद्दा यही साबित हो कि मतदान के एक दिन पहले तक कांग्रेस मतदाताओं को ये बता पाने में असफल रही है कि जीत की सूरत में पार्टी मुख्यमंत्री किसे बनाएगी.

केंद्र सरकार में विराजमान कांग्रेस गठबंधन के खिलाफ़ चली भ्रष्टाचार-विरोधी आंधी भी आगामी उत्तराखंड चुनावों में अपनी छाप छोड़ सकती है.

आख़िर में इस बात का ज़िक्र बेहद आव्यशक है कि प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी का सितारा बिलकुल भी बुलंद नहीं है. 2007 के विधान सभा चुनावों में पार्टी ने आठ सीटों पर कब्ज़ा किया था लेकिन आगामी चुनावों में उसका प्रदर्शन शायद ऐसा न हो सके.

इस बीच उत्तराखंड क्रांति दल में फूट पड़ चुकी है, उत्तराखंड रक्षा मोर्चा पूर्व सैनिकों के वोटों को जुटाने की मुहिम में है जबकि 40 अन्य पार्टियाँ भी मैदान में उतर चुकी हैं.

इस तरह के हालात में ऐसा संभव है कि नतीजों के आने पर शायद किसी भी पार्टी को पूर्ण बहुमत न मिल सके.

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