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कई बार देखा अपने आशियानों को जलते हुए

 गुरुवार, 19 जनवरी, 2012 को 10:58 IST तक के समाचार
आदिवासी

खम्मम के अलावा आंध्र प्रदेश के दूसरे इलाकों में भी छत्तीसगढ़ से भाग कर आए आदिवासी बस रहे हैं

देश के अन्य प्रांतों के रहने वाले लोगों की तरह छत्तीसगढ़ के आदिवासियों को भी अपनी संस्कृति पर बड़ा गर्व है.

यहां के आदिवासियों के लोक गीतों में जंगलों और पहाड़ों के अलावा यहां बहने वाली नदियों, खास तौर पर इन्द्रावती और गोदावरी नदियों का भी वर्णन है.

सुरक्षा बलों और नक्सलियों के बीच चल रही हिंसा की वजह से अब इस संभाग से आदिवासी इन्द्रावती और गोदावरी को पार कर सुरक्षित आशियाने की तलाश में आन्ध्र प्रदेश के जंगलों में बसते जा रहे हैं.

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इनकी तादात कितनी है, ये किसी को नहीं पता, क्योंकि इससे जुड़ा कोई आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है.

ये भी कहा जा रहा है कि खम्मम के अलावा आंध्र प्रदेश के दूसरे इलाकों में भी छत्तीसगढ़ से भाग कर आए आदिवासी बस रहे हैं.

आंध्र प्रदेश के भद्राचलम और खम्मम के कई इलाकों में छोटे छोटे समूह बनाकर शरणार्थियों के ये दल पिछले कुछ सालों से रह रहे हैं.

न पहचान, न पैसा

"वहां हर दिन ऐसे ही भागते रहना है. कभी सलवा जुडूम के लोगों से, तो कभी माओवादियों से. मुझे लगा कि अब मैं भेज्जी में जी नहीं सकूंगा. इसलिए यहां आ गया. सलवा जुडूम वाले आकर मारपीट करते थे. हमारे घर भी जला दिए. इसलिए हम वहां से भागने को मजबूर हो गए"

लच्चू, आदिवासी

अपने और अपने परिवारजनों के लिए एक सुरक्षित ज़िन्दगी का सपना संजोए, इन शरणार्थियों की ज़िंदगी आंध्र प्रदेश में कुछ बेहतर नहीं है.

बस सिर्फ इतनी सांत्वना है कि इन्हें यहां जान का ख़तरा नहीं है.

मगर इनके पास जीने के लिए और कुछ भी नहीं है. न पैसे हैं और न ही पहचान.

आंध्र प्रदेश की सरकार तो इन्हें अनुसूचित जनजाति तक नहीं मानती है. यही कारण है कि इनके लिए कोई सामजिक सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो पाई है.

भद्राचलम और खम्मम के स्थानीय लोग भी छत्तीसगढ़ से आए इन शरणार्थियों को पसंद नहीं करते.

ऐसे आरोप हैं कि कुछ जगहों पर तो स्थानीय लोग अपने नालों से इन्हें पानी भी नहीं भरने देते हैं.

भद्राचलम के बालीमेला के इलाके में छत्तीसगढ़ से भाग कर आए आदिवासियों की एक बस्ती में जब मैं पहुंचा, तो पाया कि यहां अलग ही माजरा था.

मुझे देखते ही बस्ती के बाशिंदे सहम से गए. प्रथम दृष्टया उन्हें लगा कि मैं कोई पुलिस वाला हूं. मगर उनके बीच में कुछ सालों से काम कर रहे संगठन एग्रीकल्चरल एंड सोशल डेवलपमेंट सोसायटी यानी एएसडीएस के कार्यकर्ता भी मेरे साथ थे.

बस फिर धीरे-धीरे वे खुलते गए और फिर उन्होंने एक-एक कर अपनी दास्तान बयां करनी शुरू कर दी.

‘बस भागते रहते हैं’

छत्तीसगढ़ से आए आदिवासियों को आंध्र प्रदेश पुलिस के हाथों प्रताड़ना भी झेलनी पड़ती है

मुश्किल ये थी कि वे हिंदी नहीं जानते. सिर्फ गोंडी और तेलगू भाषा बोलते हैं. एएसडीएस के वेंकटेश की मदद से मैं उनसे बात कर पाया.

बालीमेला की बस्ती सिर्फ़ दो सालों पहले ही बसी है. यहां से कुछ ही मीटर की दूरी पर पुलिस का एक कैंप है जहां से पुलिसवाले उनकी बस्ती में आकर ये सुनिश्चित करते हैं कि यहां कोई नया चेहरा तो नहीं रह रहा है.

इन बस्तीवालों पर माओवादी समर्थक होने का शक़ हमेशा रहता है क्योंकि ये छत्तीसगढ़ के जंगली इलाक़ों से आए हैं, जहां माओवादियों और सुरक्षा बलों में संघर्ष चल रहा है.

इस बस्ती के एक नौजवान लच्चू ने बताया कि वे छत्तीसगढ़ के संवेदनशील भेज्जी इलाके से आये है.

वे कहते हैं:"वहां हर दिन ऐसे ही भागते रहना है. कभी सलवा जुडूम के लोगों से, तो कभी माओवादियों से. मुझे लगा कि अब मैं भेज्जी में जी नहीं सकूंगा. इसलिए यहां आ गया. सलवा जुडूम वाले आकर मारपीट करते थे. हमारे घर भी जला दिए. इसलिए हम वहां से भागने को मजबूर हो गए."

मैंने लच्चू से पूछा कि क्या उसे अपने घर वापस जाने का मन नहीं करता तो उन्होंने कहा:" वापस नहीं जाऊँगा. फिर वही सब होगा मेरे साथ. वो कहते हैं कि तुम माओवादी हो. मैं यहीं ठीक हूँ."

बस्ती में भेज्जी के ही एक दूसरे गांव से आए एक बुज़ुर्ग ने बताया कि उनके गांव में 25 घर जला दिए गए. इसलिए वे अपने परिवारवालों को लेकर जंगल के रास्ते सीमा पार कर आंध्र प्रदेश पहुँच गए.

दहशत

"इनकी ज़िन्दगी तो बहुत बुरी है. ये अपनी ही धरती पर शरणार्थी बन्ने को मजबूर हो गए हैं. आंध्र प्रदेश की सरकार को लगता था कि यह उनपर बोझ हैं. इस लिए कई घटनाएं हुईं जहाँ आंध्र प्रदेश के वन विभाग के अमले नें इनके घरों को जला दिया. मगर अब अदालत के हस्तक्षेप के बाद आगज़नी के मामले बंद हुए हैं"

वेंकटेश, एएसडीएस के कार्यकर्ता

बालीमेला से लगभग 70 किलोमीटर दूर मैं जंगल में बसी एक दूसरी बस्ती में पहुंचा. चुक्कलापाडू में मेरी मुलाक़ात छत्तीसगढ़ से आए कई परिवारों से हुई.

इस बस्ती में दुर्गा ने बताया कि कोंटा तहसील के कई परिवार ऐसे हैं जिनके घरों को जला दिया गया.

इनमे कलमू वाडामा, पोडियम पोज्जा, मडकम नंदा और उनके साथ बहुत सारे आदिवासी इसलिए आए क्योंकि उनके घरों को जला दिया गया और वहां के रहने वाले चार लोगों को भी मार दिया गया.

इसी दहशत में यह सभी परिवार रातो रात वहां से भाग निकले. दुर्गा ने बताया कि इनके जानवर खा जाने के अलावा सलवा जुडूम के लोगों ने कथित रूप से कुछ महिलाओं के साथ बालात्कार भी किया.

सुकमा के जग्वारा के जगदीश अपनी पढाई अधूरी छोड़ कर ही वहां से भाग निकले. उनका भी कहना था कि उनके गाँव को भी जला दिया गया.

छत्तीसगढ़ से पलायन कर आन्ध्र पहुंचे आदिवासियों के बीच काम कर रही संस्था एएसडीएस के वेंकटेश का कहना है कि पहले सरकार के पास इन शरणार्थियों के कोई आंकड़े ही नहीं थे. मगर अब आंध्र प्रदेश की सरकार इनके अस्तित्व को स्वीकार कर रही है.

उन्होंने कहा, "इनकी ज़िन्दगी तो बहुत बुरी है. ये अपनी ही धरती पर शरणार्थी बन्ने को मजबूर हो गए हैं. आंध्र प्रदेश की सरकार को लगता था कि यह उनपर बोझ हैं. इस लिए कई घटनाएं हुईं जहाँ आंध्र प्रदेश के वन विभाग के अमले नें इनके घरों को जला दिया. मगर अब अदालत के हस्तक्षेप के बाद आगज़नी के मामले बंद हुए हैं."

पीछा करती बदक़िस्मती

आदिवासियों का कहना है कि वे अब वापस अपने गांव नहीं जाना चाहते

पुलिस और माओवादियों से भागते-भागते ये आदिवासी मीलों दूर खम्मम के इलाके में शरण लिए हुए हैं.

मगर बदकिस्मती यहां भी इनका पीछा नहीं छोड़ रही है. यहां भी इन्हें शक़ की निगाहों से ही देखा जाता है.

हाल ही में चेरला के इलाके में माओवादियों ने निर्माण कार्य में लगे कुछ उपकरणों को जलाया था. उसके बाद आंध्र प्रदेश की पुलिस ने छत्तीसगढ़ से आए आदिवासियों की बस्ती पर ही दबिश बनानी शुरू कर दी.

पुलिस को लगता है कि छत्तीसगढ़ से आए सभी आदिवासी नक्सली समर्थक हैं जबकि वेंकटेश का कहना है कि ऐसे भी लोग हैं जो नक्सलियों के कहुफ़ की वजह से अपने गावों को छोड़कर यहां चले आए हैं.

आंध्र प्रदेश के इन इलाकों में रहने वाले छत्तीसगढ़ के आदिवासियों की इस जमात ने कई बार अपने आशियाने को जलते देखा.

कभी छत्तीसगढ़ में सलवा जुडूम के लोगों के हाथों तो कभी आंध्र में वन विभाग के लोगों के हाथों.

उन्हें बस अफ़सोस इस बात का है कि छत्तीसगढ़ की सरकार ने कभी इनकी घर-वापसी के लिए कोई पहल नहीं की है.

इस जमात को सिर्फ सुरक्षा चाहिए. अपनी और अपनी औलादों की. मगर किसी ने आज तक इनकी तरफ़ मदद का हाथ नहीं बढ़ाया है.

इनके दिलों में भी है कि कब वह पल आएगा जब वे अपने घर वापस जाकर जंगलों और पहाड़ों की खुली हवाओं में सांस ले सकेंगे और इन्द्रावती और गोदावरी के किनारे जमा होकर अपने लोक गीत गा सकेंगे.

इस श्रृंखला की अगली कड़ी में आंध्र प्रदेश की सरकार के अधिकारियों से बात कर उनका पक्ष जानने की कोशिश करूंगा.

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