
मायावती के लिए ये चुनाव एक बड़ी चुनौती है.
यह पहला अवसर होगा जब मायावती मुख्यमंत्री रहते हुए विधान सभा चुनाव का सामना करेंगी. अकेले पूर्ण बहुमत से पांच साल सरकार चलाने के बाद अब उनके पास मतदाताओं के सामने वादे पूरे न कर पाने का कोई बहाना नहीं है कि समय कम मिला या फिर ये कि गठबंधन की सरकार है.
लेकिन पांच वर्षों में लगातार स्मारकों में 'फ़िज़ूलख़र्ची' और भ्रष्टाचार के लिए चर्चा में रहने के कारण मायावती की ऎसी कोई बड़ी उपलब्धि नही है जो लोगों के दिमाग़ में सहज रूप से आती हो , जैसे कि पड़ोसी राज्य बिहार में नीतीश कुमार के लिए है.
विशेषकर वह उच्च-मध्यमवर्गीय मतदाता मायावती से निराश है, जिसने मुलायम राज से छुटकारा पाने के लिए मायावती को विकल्प के रूप में चुना था.
इसी वर्ग के समर्थन से बसपा को वोट 25 फ़ीसदी से बढ़कर 30 फ़ीसदी हो गया और उसने बहुमत पा लिया. जबकि समाजवादी पार्टी का वोट 25 फ़ीसदी से आधा फ़ीसदी बढ़ा फिर भी उनकी सीटें घटकर 100 से कम रह गई.
मगर इस उच्च–मध्यमवर्गीय मतदाता समूह के लिए इस बार वैसा सहज विकल्प उपलब्ध नही है, क्योंकि जिस तरह मायावती ने आगे बढ़कर इस वर्ग को सत्ता में हिस्सेदारी और सुशासन का भरोसा दिलाया था, वैसी कोई पहल समाजवादी पार्टी ने अभी तक नही दिखाई.
यह वर्ग परम्परागत रूप से कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी को वोट देता रहा है. इस बार यह किधर रुख़ करेगा अभी स्पष्ट नही है.
मुस्लिम मतदाता
2007 से तुलना करें तो अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय अब पहले की तरह मुलायम के साथ नही है. कई बड़े मुस्लिम नेता सपा का साथ छोड़ चुके हैं लेकिन मुस्लिम समुदाय बसपा से भी संतुष्ट नही है.
पिछड़े मुसलमानों को आरक्षण का लाभ देकर कांग्रेस ने सपा और बसपा दोनों का गणित गड़बड़ा दिया है.
जहाँ तक चुनावी तैयारियों का सवाल है बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी ने लगभग सभी प्रत्याशी घोषित कर दिए हैं, जबकि कांग्रेस ने तीन चौथाई से ज़्यादा.
उम्मीदवारों के चयन में भारतीय जनता पार्टी सबसे पीछे है.
कांग्रेस ने राष्ट्रीय लोक दल से तालमेल कर लिया है, जबकि जहाँ तक मुद्दों की बात है एक लंबे अरसे बाद उत्तर प्रदेश में अयोध्या का राम मंदिर बनाम बाबरी मस्जिद विवाद मुख्य मुद्दा नही है. बाक़ी तीनों दल अकेले दम पर चुनाव लड़ेंगे.

राहुल गांधी पिछले कुछ वर्षों के यूपी में कांग्रेस की खोई ज़मीन को तलाशने की कोशिश कर रहें हैं.
इस चुनाव में सबसे बड़ा मुद्दा माया सरकार का पांच साल का कामकाज है. मगर लोगों को मुलायम राज का कष्ट भी याद है.
इसमें चौतरफ़ा भ्रष्टाचार और सरकारी विभागों से उगाही, स्मारकों पर फ़िज़ूलख़र्ची, ज़मीनों का अंधाधुंध अधिग्रहण, सत्ता का केंद्रीकरण और लोकतांत्रिक अधिकारों में कटौती प्रमुख है.
नेताओं के लिहाज़ से देखें तो यह चुनाव मायावती के नेतृत्व के लिए तो कड़ी परीक्षा हैं ही,राहुल गांधी के लिए उससे भी ज़्यादा.
उम्र के लिहाज़ से यह मुलायम सिंह यादव के लिए आख़िरी बार मुख्यमंत्री बनने अथवा अपने बेटे को राजनीतिक रूप से स्थापित करने का मौक़ा है.
आम तौर पर लोग मान रहें हैं कि बहुजन समाज पार्टी की सीटें घटेंगी, जबकि बाक़ी तीनों दलों समाजवादी पार्टी, कांग्रेस, भाजपा और राष्ट्रीय लोक दल की सीटें बढेंगी.
भारतीय जनता पार्टी चिल्ला चिल्लकर कर कह रही है कि वह चौथी बार मायावती के साथ गठबंधन सरकार नही बनाएगी. दूसरी तरफ़ कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने चुनाव बाद गठबंधन का विकल्प खुला रखा है.


















