भारतीय संसद पर हमले की दसवीं बरसी

 मंगलवार, 13 दिसंबर, 2011 को 10:08 IST तक के समाचार

वर्ष 2001 में भारत की संसद पर हुए हमले के 10 साल पूरे हो गए हैं. दस साल पहले 13 दिसंबर के दिन कुछ हथियारबंद लोगों ने संसद पर हमला कर दिया था. इस हमले में 14 लोग मारे गए थे.

हमले में दोषी पाए गए अफ़ज़ल गुरु को फाँसी की सज़ा सुनाई जा चुकी है लेकिन ये मुद्दा काफ़ी विवादित रहा है.

इस मौके पर मृतकों की याद में संसद भवन परिसर में विशेष सभा रखी गई. इसमें प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, स्पीकर मीरा कुमार, भाजपा नेता लाल कृष्ण आडवाणी और वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी समेत कई नेता मौजूद थे.

13 दिसंबर 2001 को आम दिनों की तरह उस दिन भी संसद की कार्यवाही चल रही थी. दोनों सदन गोलीबारी से कुछ देर पहले ही स्थगित हुए थे.

इसी बीच सुबह ग्यारह बजकर पच्चीस मिनट पर एके-47 बंदूकों और हैंड ग्रेनेड से लैस पाँच अज्ञात चरमपंथियों ने हमला बोल दिया.

इसके बाद संसद भवन के मुख्य गेट पर सुरक्षा बलों और अज्ञात हमलावरों के बीच जमकर गोलीबारी हुई. इस गोलीबारी में कुल 14 लोग मारे गए थे जिनमें पाँच हमलावर और दिल्ली पुलिस के जवान भी शामिल थे.

इस दौरान कई बड़े नेता और सांसद संसद भवन के परिसर में ही थे और सभी सुरक्षित थे. उस समय एनडीए सरकार सत्ता में थी और अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे.

इस हमले के बाद भारत और पाकिस्तान के रिश्ते काफ़ी ख़राब हो गए थे और दोनों देश युद्ध के क़रीब आ गए थे.

किसे हुई सज़ा ?

किसको हुई सज़ा, कौन हुआ बरी

दिल्ली विश्वविद्यालय के अध्यापक सैयद अब्दुल रहमान गीलानी- बरी

अफ़ज़ल गुरु की पत्नी अफ़्शाँ गुरू-बरी

शौक़त हुसैन गुरु को दस साल की सज़ा, 2010 में ख़त्म

अफ़ज़ल गुरु- फाँसी की सज़ा बरकरार

हमले के सिलसिले में चले मुक़दमे में 2002 में दिल्ली की विशेष अदालत ने तीन लोगों को मौत की सज़ा सुनाई थी. उन्हें हमले की साज़िश में शामिल होने और हमलावरों की मदद करने का दोषी पाया गया था.

ये लोग थे मोहम्मद अफ़ज़ल और शौक़त हुसैन उर्फ़ गुरू और दिल्ली विश्वविद्यालय के अध्यापक सैयद अब्दुल रहमान गीलानी. गुरू की पत्नी नवजोत संधू उर्फ़ अफ़्शाँ गुरू को भी अदालत ने दोषी करार दिया था. अफ़्शाँ को पांच साल कैद की सज़ा सुनाई गई थी.

पुलिस का कहना था कि मोहम्मद अफ़ज़ल और शौक़त हुसैन जैश-ए-मोहम्मद से जुड़े रहे हैं.

लेकिन 2003 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने अब्दुल रहमान गीलानी और अफ़्शाँ गुरू को मामले से बरी कर दिया था जबकि मोहम्मद अफ़ज़ल और शौक़त हुसैन उर्फ़ गुरू की मौत की सज़ा बहाल रखी थी.

बाद में शौक़त हुसैन गुरु को दस साल की सज़ा सुनाई गई जो 2010 में ख़त्म हो गई.

अफ़ज़ल गुरु को फाँसी देने के लिए 20 अक्तूबर 2006 का दिन तय किया गया था. लेकिन अफ़ज़ल गुरु ने राष्ट्रपति के पास क्षमादान याचिका भेजी थी.

ये याचिका गृह मंत्रालय को बढ़ा दी गई लेकिन पाँच साल तक लंबित रही.

2011 में पाँच साल बाद गृह मंत्रालय ने राष्ट्रपति को अनुशंसा दी कि अफ़ज़ल गुरु की अपील ठुकरा दी जाए. उसके बाद से ही इस मामले को लेकर राजनीतिक सरगर्मी तेज़ रही है.

जम्मू कश्मीर विधान सभा में अफ़ज़ल गुरु की मौत की सज़ा माफ़ करने संबंधी प्रस्ताव पेश करने को लेकर काफ़ी हंगामा हुआ है.

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