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तेज़ी से भागते हुए शहर पर एक नज़र...

 बुधवार, 7 दिसंबर, 2011 को 11:16 IST तक के समाचार
  •  Shahjehanabad
    ब्रितानियों के राज से पहले दिल्ली शहर का नाम ‘शाहजहांनाबाद’ था, क्योंकि उसे मुग़ल शासक शाहजहां ने आबाद किया था. लेकिन ब्रितानियों ने शाहजहांनाबाद को पुरानी दिल्ली का नाम दिया और ‘नई दिल्ली’ बसाने के लिए रायसीना पहाड़ी को चुना.
  • ब्रितानी शासकों ने जब दिल्ली को अपनी प्रशासनिक राजधानी बनाया और उसे आबाद करने की योजना बनाई, तो उनका मक़सद आम लोगों की नहीं बल्कि सरकारी कर्मचारियों और शासकों की आवासीय ज़रूरतों को पूरा करना था. (तस्वीर में - मैटकॉफ़ हाउस)
  • 1911 में जब ब्रितानियों ने नई दिल्ली को बसाना शुरू किया, तो राजधानी की जनसंख्या मात्र ढाई लाख के आस-पास थी.
  • लेकिन साल 1947 में आज़ादी के बाद दिल्ली में शरणार्थियों का हुजूम सा लग गया और रातों-रात शहर की आबादी लगभग दोगुनी हो गई.
  • सरकारी नियंत्रण न होने की वजह से जिस शरणार्थी को जहां कहीं भी जितनी जगह मिली, उसने वहीं अपना घर बना लिया. अनियमित निर्माण का ये दौर 1955 तक चला, जब सरकार ने घोषणा की कि दिल्ली को एक योजना के तहत बसाया जाएगा.
  • आज़ादी से लेकर अब तक दिल्ली में दूसरे राज्यों से लोगों का लगातार बढ़ता प्रवासन इस शहर के लिए सबसे बड़ी चुनौती रहा है.
  • जहां 1947 में दिल्ली आए शरणार्थियों की बसावट के लिए कुछ 36 कॉलोनियां बनाई गईं, लेकिन उसके बाद दिल्ली आने वाले प्रवासियों के लिए कोई ख़ास प्रबंध नहीं किए गए.
  • कई मास्टर प्लान आए और गए, लेकिन दिल्ली की तेज़ी से बढ़ती ज़रूरतों, शहरीकरण और क्षेत्रफल को समझने में नाकामयाब साबित हुए. योजनाकारों का मानना है कि सभी मास्टर प्लानों में दूरदर्शिता का अभाव रहा है.
  • तेज़ी से समृद्ध होते इस शहर में हर साल करीब पांच लाख लोग एक नई ज़िंदगी की शुरुआत करने आते हैं. नतीजा ये कि दिल्ली में सैंकड़ों झुग्गी-झोंपड़ी बस्तियों और अवैध बस्तियों का क़ब्ज़ा हो चुका है.
  • आंखों में कई सपने लिए लाखों लोग दिल्ली शहर को गले लगाते हैं, लेकिन दिल्ली सभी वर्गों को गले नहीं लगा पाई. ख़ासतौर पर ग़रीब वर्ग के कामगार लोगों को.
  • 1982 में एशियाई खेलों के दौरान और 2010 में हुए राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान दिल्ली को ‘वर्ल्ड क्लास सिटी’ बनाने की मुहिम के तहत झुग्गी-झोंपड़ियों को कभी छिपाने की कोशिश की गई, तो कभी उन्हें उखाड़ फेंका गया.
  • उदारीकरण के दौर की शुरुआत के बाद दिल्ली शहर ने पड़ोसी राज्यों में पांव पसारने शुरू किए और बसाए गए गुड़गांव, नोएडा और ग़ाज़ियाबाद जैसे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र.
  • तेज़ी से बढ़ते शहरीकरण के बीच मूलभूत सुविधाएं कहीं पीछे रह गईं. कितने ही फ़्लाईओवर और सड़कों का निर्माण हुआ, लेकिन ट्रैफ़िक की समस्या परस्पर बनी हुई है.
  • ख़राब योजना की वजह से हर साल बारिश के मौसम में दिल्ली की रफ़्तार थम जाती है.
  • दिल्ली शहर एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है, जहां एक तरफ़ तो वैश्विक मंच पर उसे दर्ज करवाने की होड़ लगी है, लेकिन दूसरी ओर सभी वर्गों के लिए पानी, बिजली, सड़क जैसी मूलभूत सुविधाएं मुहैया करवाना उसके लिए चुनौती साबित हो रहा है.
  • ऐसे में तेज़ी से बढ़ते इस शहर का भविष्य आशंकाओं और अकांक्षाओं से भरा दिखाई देता है. अकांक्षा एक आदर्श शहर कहलाने की...और आशंका बाज़ारीकरण के बीच अपने व्यक्तित्व को खो देने की

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