
कपिस सिब्बल के बयान ने भारत में एक बहस छेड़ दी है.
भारत में आम लोगों ने दूरसंचार मंत्री कपिल सिब्बल के बयान पर मिली जुली प्रतिक्रिया दी है.
मंगलवार को दिल्ली में एक संवाददाता सम्मेलन में कपिल सिब्बल ने कहा था कि सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर कथित तौर पर आपत्तिजनक तस्वीरों और सामग्रियों को सरकार बर्दाश्त नहीं करेगी.
लेकिन भारत के आम लोग इस बारे में क्या सोचते हैं ये जानने के लिए अलग-अलग प्रदेशों में फैले बीबीसी संवाददाताओं ने अपने-अपने शहरों में लोगों से बातचीत की.
हैदराबाद स्थित बीबीसी संवाददाता उमर फ़ारूक़ ने राहत ख़ान से बातचीत की. राहत ख़ान पेशे से डॉक्टर हैं और रोज़ाना फ़ेसबुक का इस्तेमाल करती हैं.

राहत ख़ान कहती है कि आपत्तिजनक सामग्री नज़र आने पर फ़ौरन शिकायत करनी चाहिए.
इस बारे में राहत ख़ान कहती है, ''मैं मानती हूं कि फ़ेसबुक और ऐसे दूसरी वेबसाइट्स पर काफ़ी आपत्तिजनक सामग्रियां देखने को मिलती हैं और यह एक अच्छी सुविधा का दुरुपयोग है. लेकिन मैं सरकार के इस प्रस्ताव से सहमत नहीं हूं कि वो फ़ेसबुक या ऐसी दूसरी वेबसाइट को नियंत्रित करे. ये आज़ादी को ख़त्म करने वाली बात होगी. यह समस्या का समाधान नहीं है. अगर सरकार के नियंत्रण से कुछ हो सकता था तो फिर वास्तविक दुनिया में इतने सारे हंगामे, दंगे और धार्मिक विवाद ही नहीं होते.''
भारत प्रशासित कश्मीर की राजधानी श्रीनगर स्थित बीबीसी संवाददाता रियाज़ मसरूर ने श्रीनगर में कुछ लोगों से बातचीत की.
ब्लॉग पर काफ़ी सक्रिय रहने और द कश्मीरवाला नाम की ऑनलाइन पत्रिका चलाने वाले फ़हद शाह कहते हैं, ''कपिल सिब्बल ने जो कहा है वो बिल्कुल स्वीकार्य नहीं है. ये तो हिटलर के नाज़ी शासन की तरह है. एक तरफ़ भारत अपने आप को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहता है और फिर इंटरनेट को नियंत्रित करने की बात करता है. मीडिया के बढ़ते बाज़ारीकरण के इस दौर में सोशल नेटवर्किंग साइट्स और वैकल्पिक मीडिया ही सच्चाई को बाहर लाने का एक मात्र सहारा हैं.''

फ़िज़ा कहती हैं कि अगर इसे रोका नहीं गया तो असामाजिक तत्व इसका फ़ायदा उठा सकते हैं.
श्रीनगर की ही एक और फ़ेसबुकर फ़िज़ा सदफ़ कहती हैं, ''कपिल सिब्बल के प्रस्तावों को ना तो पूरी तरह स्वीकार किया जा सकता है और ना ही इसे पूरी तरह नकारा जा सकता है. ये एक संवेदनशील मुद्दा है. अभिव्यक्ति की आज़ादी और इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों की जवाबदेही के बीच में समन्वय बिठाने के लिए सरकार को काफ़ी मेहनत करनी होगी.''
लेकिन दिल्ली के प्रशांत शर्मा की राय कुछ अलग है. वो सरकार के प्रस्ताव से बहुत हद तक सहमत दिखते हैं.
बीबीसी संवाददाता विनीत खरे ने प्रशांत शर्मा से बात की.
प्रशांत शर्मा कहते हैं, ''इंटरनेट पर नियंत्रण करने में कोई बुराई नहीं है, और ऐसा होना ही चाहिए. फ़ेसबुक और ट्विटर पर लोग अपने विचार लिखते हैं लेकिन उसकी निगरानी करने वाला कोई नहीं है. कुछ ऐसी वेबसाइट्स भी हैं, जिन्हें बंद कर देना चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं हो पाता है. जैसे चीन में इंटरनेट का कोई भी दुरुपयोग नहीं कर सकता, लेकिन भारत में ऐसा कुछ भी नहीं है. भारत में कहने वाले 20 प्रतिशत हैं, दुरुपयोग करने वाले 80 प्रतिशत.''
पटना स्थित बीबीसी संवाददाता मणिकांत ठाकुर ने भी पटना में भी कुछ लोगों से इस बातचीत की.
विकास कुमार कहते हैं, ''मुझे लगता है कि केंद्र सरकार सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट्स पर अपने ख़िलाफ़ टिप्पणियां देखकर असहज महसूस करने लगी है. बल्कि ये ख़तरा भी मान रही है कि हमला कहीं और तीखा ना हो जाए. लेकिन मैं ये कहना चाहूँगा कि आपत्तिजनक बातें वेबसाइट्स से ज़रूर हटा देनी चाहिए और अगर ऐसा नहीं होता है तो सरकार सम्बंधित लोगों के ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई अवश्य करे. हालांकि ये भी नहीं होना चाहिए कि अगर मैं किसी सरकारी रवैये के ख़िलाफ़ कुछ लिखूं, तो उसे अपराध समझ कर वेबसाइट पर ही प्रतिबन्ध जैसी धमकी दी जाए.''

विकास कहते हैं कि सरकार डरी हुई लग रही है.
इसी बारे में पटना की ही अमिता ठाकुर कहती हैं, ''मेरे हिसाब से सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट्स बुरे भी हैं और अच्छे भी. अच्छा इसलिए कि इसके ज़रिए संपर्क, मैत्री और जानकारी का अपना दायरा हम बढ़ा पाते हैं. लेकिन बुरा इसलिए है कि इसका दुरूपयोग करने वाले अपमानजनक टिप्पणियां करके या आपत्तिजनक तस्वीरें अपलोड करके माहौल ख़राब करते हैं. और दुर्भाग्य है कि उन्हें ऐसा करने से रोक पाना मुश्किल हो रहा है. तो रास्ता यही है कि इंटरनेट वेबसाइट को बदनाम करने वाले ऐसे तत्वों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने से सरकार को रोका ना जाए. साथ ही विचारों की आज़ाद अभिव्यक्ति पर अंकुश के सरकारी प्रयासों का एकजुट विरोध भी हो.''
भारत के अलग-अलग शहरों में लोगों की यही राय है कि आपत्तिजनक बातें करने वालों के ख़िलाफ़ कार्रवाई ज़रूर हो लेकिन इसके नाम पर सरकार किसी तरह की पाबंदी ना लगाए.

















