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माइक्रोफ़ाइनेंस उद्योग गंभीर संकट में

 शुक्रवार, 2 दिसंबर, 2011 को 03:15 IST तक के समाचार

आंध्र प्रदेश में नए क़ानून से माइक्रो फ़ाइनैंस कंपनियों का काम ठप पड़ गया है

भारत में माइक्रोफ़ाइनेंस के सबसे बड़े केंद्र आंध्र प्रदेश में इस उद्योग की हालत इतनी खराब हो गई है कि कई कंपनियां बंद होने के कगार पर आ गई हैं.

ये कंपनियां अपना ऋण वसूल नहीं कर पा रही हैं जिससे उन्हें बैंक से भी ताज़ा कर्ज़ लेने में मुश्किलों आ रही है.

इसी बिगड़ती कड़ी में हाल ही में देश में माइक्रोफ़ाइनेंस की सबसे बड़ी कंपनी 'स्वयं कृषि संगम' यानी एसकेएस के संस्थापक और अध्यक्ष विक्रम अकुला को इस्तीफ़ा देना पड़ा.

दूसरी तरफ कर्ज़ न मिलने से ज़रूरतमंद लोग भी परेशान हैं और वो इस सवाल पर बंटे हुए हैं कि माइक्रोफ़ाइनेंस कंपनियों का बंद होना उनके लिए अच्छी बात है या बुरी.

पिछले साल आंध्र प्रदेश में चालीस से ज़्यादा लोगों ने आत्महत्या कर ली थी. उनके परिवार इसकी वजह कर्ज़ देने वाली कंपनियों की ओर से वसूली के लिए पड़े दबाव को मानते हैं.

इन आत्महत्याओं पर हंगामा मचने के बाद राज्य सरकार ने एक नया क़ानून भी बनाया जिससे माइक्रोफ़ाइनेंस की कंपनियों का काम लगभग ठप होकर रह गया है.

उंची ब्याज़ दर

"मैं तो पढ़ी लिखी नहीं हूं इसलिए मुझे पता नहीं कि कितने दर से ब्याज़ देना पड़ रहा था. लेकिन हमारे मुखिया ने हिसाब किताब करके बताया कि ये बहुत ज़्यादा दर है इसलिए उन से लेन-देन न किया जाए"

माधवी, महबूब नगर ज़िले के एक गांव की महिला

महबूबनगर ज़िले के बिजनेपल्ली मंडल के वेलिगोंदा गाँव में किराना दुकान चलाने वाली सुलोचना ने बीबीसी से कहा कि वो माइक्रोफ़ाइनेंस व्यवस्था से खुश थी क्योंकि इससे व्यापारियों को आसानी से कर्ज़ मिल जाता था.

उन्होंने बीबीसी को बताया, "मुझे इससे काफ़ी फ़ायदा हुआ. मैनें कई बार ऋण लिया और लौटा भी दिया. अभी भी यहां कई लोग ऋण लौटाना चाहते हैं लेकिन कंपनी के लोग यहां आ ही नहीं रहे हैं."

लेकिन सवाल ये उठता है कि आंध्र प्रदेश जैसे राज्य में जहां ज़्यादातर लोग पाबंदी के साथ कर्ज़ अदा करते थे वहां हालत इतनी ख़राब कैसे हो गई कि आज माइक्रोफ़ाइनेंस कंपनियों के प्रतिनिधि गांव में कदम ही नहीं रख सकते?

इसी गांव की एक और महिला माधवी का कहना है कि गांव के मुखिया ने ही उनके आने पर प्रतिबंध लगा दिया है क्योंकि ये कंपनियां बहुत उंचे ब्याज़ दर पर कर्ज़ दे रही थी.

माधवी ने कहा, "मैं तो पढ़ी-लिखी नहीं हूं इसलिए मुझे पता नहीं कि कितनी दर पर ब्याज़ देना पड़ रहा था. लेकिन हमारे मुखिया ने हिसाब किताब करके बताया कि ये बहुत ज़्यादा दर है इसलिए उनसे लेन-देन न किया जाए."

लेकिन कई महिलाओं का ये भी कहना था कि माइक्रोफ़ाइनेंस कंपनियों का ऋण बंद हो जाने से उन्हें काफ़ी नुकसान हुआ है.

गंभीर संकट

आंध्र प्रदेश में माइक्रोफ़ाइनेंस कंपनियों के लिए गंभीर संकट उस वक्त शुरु हुआ जब पिछले साल राज्य में कोई 42 लोगों ने एक के बाद एक आत्महत्या कर ली.

मृतकों के परिवारवालों और स्थानीय लोगों का कहना था कि माइक्रोफ़ाइनेंस कंपंनियों की ओर से कर्ज़ की वसूली के लिए उन्हें काफ़ी परेशान किया जा रहा था जिससे तंग आकर उन्होंने ये कदम उठाया.

इसी तरह के ख्याल राज्य के कुछ नेताओं के भी थे. महबूबनगर ज़िले से विपक्षी दल तेलुगू देसम के आर. चंद्रशेखर रेड्डी का आरोप था कि माइक्रोफ़ाइनेंस कंपंनियां गाँव के लोगों का बहुत ज़्यादा शोषण कर रही थी.

उनका आरोप है कि कुछ कंपनियां सात प्रतिशत दर पर ब्याज़ दे रही थी जबकि कुछ तो एक हज़ार रूपये के ऋण पर साल में एक हज़ार रूपये का ब्याज वसूल कर रही थीं.

उनका ये भी कहना था कि माइक्रोफ़ाइनेंस कंपंनियां खुद तो काफ़ी संपन्न हो गईं और उन्होंने पैसा भी खूब कमाया, लेकिन उन्होंने गाँव के लोगों को काफ़ी नुकसान पहुँचाया है.

नया क़ानून

इन आत्महत्याओं पर हंगामा मचने के बाद ही राज्य सरकार ने एक ऐसा क़ानून बनाया कि माइक्रोफ़ाइनेंस कंपंनियों का काम ही ठप होकर रह गया.

माइक्रोफ़ाइनेंस कंपंनियों को नियमित करने के लिए बनाए गए का़नून में इन कंपनियों पर कई प्रतिबंध लगा दिए गए हैं. जैसे कर्ज़ वसूलने के लिए प्रतिनिधि किसी के घर नहीं जा सकते हैं, बल्कि केवल ग्राम सभा में ही उनसे बात कर सकते है.

कोई कंपनी किसी को भी 25 हज़ार रूपये से ज़्यादा कर्ज़ नहीं दे सकती है और ताज़ा ऋण देने से पहले उन्हें सरकार से अनुमति लेनी पड़ती है.

कंपनियों का खंडन

माइक्रोफ़ाइनेंस क्षेत्र की एक बड़ी कंपंनी 'बेसिक्स' के प्रमुख अधिकारी मन्मथ दलाई इस आरोप का खंडन करते हैं कि माइक्रोफ़ाइनेंस कंपंनियां बहुत उंचे ब्याज़ दर पर कर्ज़ देती हैं.

बेसिक्स का उदाहरण देते हुए वो कहते हैं कि कंपनी 24 प्रतिशत ब्याज़ दर पर कर्ज़ देती है, खुद बेसिक्स को बैंकों से लगभग 14 प्रतिशत के दर पर कर्ज़ मिलता है. कंपनी के कामकाज पर लगभग आठ प्रतिशत का खर्च आता है और इस तरह कंपनी केवल दो प्रतिशत के फ़ायदे पर लोगों को पैसा देती है.

उनका कहना है कि माइक्रोफ़ाइनेंस कंपंनियों के बजाए अगर कहीं और से ऋण लिया जाए तो ब्याज़ दर बहुत ज़्यादा होगी. जैसे सब्जी-तरकारी बेचने वाला कोई व्यक्ति अगर सुबह में 100 रूपये का ऋण लेता है तो उसी दिन शाम में उसे एक सौ पांच या एक सौ दस रूपये लौटाना पड़ता है.

आर्थिक संकट

माइक्रोफ़ाइनेंस क्षेत्र का संकट इतना गहरा गया है कि कि देश में इसकी सबसे बड़ी कंपनी एसकेएस को इस साल की दूसरी तिहाई में 385 करोड़ रूपये का नुकसान उठाना पड़ा है, जबकि पिछले साल इसी अवधि में उसे 80 करोड़ रूपये का फ़ायदा हुआ था.

स्टॉक एक्सचेंज में कंपनी के शेयर का भाव पिछले सितंबर में 1500 रूपये था जो आज गिरकर सौ रूपये से भी कम हो गया है.

इसी वजह से कंपनी के संस्थापक विक्रम अकुला को त्यागपत्र देना पड़ा है.

छोटे व्यापारियों को काफ़ी उंचे दर पर कर्ज़ मिलता है

वहीं बेसिक्स के मन्मथ दलाई अपनी कंपनी का हाल बताते हुए कहते हैं कि गत वर्ष अक्तूबर में कंपनी का दिया हुआ कुल ऋण 1800 करोड़ रूपये था जो इस समय घटकर 800 करोड़ रूपये हो गया है. इसमें से चार सौ करोड़ आंध्र प्रदेश में है.

इसी तरह पिछले साल सितंबर में कंपनी से कर्ज़ लेने वालों की संख्या 18 लाख थी जो घटकर 10 लाख हो गई है. साथ ही बेसिक्स के कर्मचारियों की संख्या 10 हज़ार से घटकर छह हज़ार रह गई है.

दलाई के मुताबिक ऋण की वापसी में भी बड़ी कमी आई है.

उनका कहना है कि लोग माइक्रोफ़ाइनेंस कंपनियों का ऋण उसी समय वापस लौटाते हैं जब उन्हें नया ऋण मिलने की उम्मीद रहती है.

लेकिन क्योंकि माइक्रोफ़ाइनेंस कंपनियां अब नया ऋण देने का वादा नहीं कर पा रही हैं इसलिए लोग भी पुराना कर्ज़ नहीं चुका रहे हैं.

इसी वजह से बैंक भी इन कंपनियों को ताज़ा ऋण देने से कतराने लगी है और जो संकट आंध्र प्रदेश में शुरु हुआ वो दूसरे राज्यों में फैलता जा रहा है.

बेसिक्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी मन्मथ दलाई ये भी कहते हैं कि कुछ छोटी कंपनियों ने लेन-देन में गड़बड़ी की होगी, लेकिन इसके लिए पूरे क्षेत्र को जिम्मेदार ठहराकर उसे बंद कर देना उचित नहीं है.

वो इस बात को भी गलत मानते हैं कि सारी अत्महत्याएं माइक्रोफ़ाइनेंस कंपनियों के कारण हुई है.

चुनौती

फ़िलहाल माइक्रोफ़ाइनेंस कंपनियों ने राज्य में नियमन के नए कानून को उच्च न्यायालय में चुनौती दी है. इसपर जनवरी तक फ़ैसला आने की उम्मीद है.

कंपनियों का कहना है कि ये सारा संकट आंध्र प्रदेश के क़ानून के कारण पैदा हुआ है इसलिए इसका समाधान भी सरकार को ही निकालना पड़ेगा.

केंद्र सरकार ने भी माइक्रोफ़ाइनेंस क्षेत्र के इस संकट को ध्यान में रखा है और वो पूरे देश के लिए एक नया माइक्रोफ़ाइनेंस का क़ानून बनाने जा रही है.

कंपनियों का कहना है कि इसके पारित होने का बाद स्थिति स्पष्ट हो पाएगी और शायद बैंक उन्हें दोबारा कर्ज़ देंगे और वो फिर से सामान्य ढंग से काम कर सकेंगे.

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