
राष्ट्रपति बुश और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के सैनिक मक़सदों के लिए परमाणु सहयोग के समझौते को ऐतिहासिक माना गया
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भारत-अमरीका परमाणु संधि को लेकर जारी होने वाले वर्ष 2005 के संयुक्त बयान से पहले संशय की स्थिति में थे.
पूर्व अमरीकी विदेश मंत्री कोंडोलीज़ा राइस की नई किताब में इस बात का ज़िक्र किया गया है और उनके मुताबिक प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को संशय इस बात का था कि इस संधि का घरेलू राजनीतिक पर कैसा प्रभाव पडे़गा.
किताब ‘नो हायर हॉनर के मुताबिक उस वक्त के विदेश मंत्री नटवर सिंह इस संधि को लेकर कहीं ज़्यादा उत्साही थे और उन्होंने अमेरिकी अधिकारियों के साथ मिलकर प्रधानमंत्री के रुख़ को परिवर्तित करने के लिए काम किया.
सुबह के नाश्ते के दौरान अमरीकी विदेश मंत्री कोंडोलीज़ा राइस के साथ होने वाली एक महत्वपूर्ण बैठक में नटवर सिंह ने कथित तौर पर मनमोहन सिंह की स्वीकृति ली.
पक्ष में जनमत कैसे बने
इस बारे में जब बीबीसी ने नटवर सिंह से संपर्क किया तो उन्होंने ना इस बात को माना या नकारा. नटवर सिंह ने बस इतना कहा, मेरी आत्मकथा का इंतज़ार कीजिए. ये कह कर उन्होंने फ़ोन रख दिया.
"मेरी आत्मकथा का इंतज़ार कीजिए"
नटवर सिंह, बीबीसी से फ़ोन पर
किताब में राइस कहती हैं कि ऐसा नहीं कि प्रधानमंत्री सिंह संधि के महत्व को जानते नहीं थे, लेकिन उन्हें इस बात का भरोसा नहीं था कि संधि को लेकर देश में जनमत इसके पक्ष में कैसे बनाया जाएगा.
कोंडोलीज़ा राइस की ये किताब कुछ ही दिनों में बाज़ार में आ जाएगी और इससे संधि के पीछे की राजनीति को समझने में मदद मिलेगी.
राइस बताती हैं कि उन्होंने सोचा था कि भारत में इस संधि को लेकर जोश होगा, लेकिन रास्ता इतना आसान नहीं था.
सरकार पर क्या असर होगा
समाचार एजेंसियों के अनुसार किताब में लिखा है कि मनमोहन सिंह को चिंता था कि इस संधि का उनकी सरकार पर क्या असर पड़ेगा जो वामपंथी दलों के समर्थन पर निर्भर थी.
वे लिखती हैं कि जब एक बार जब हस्ताक्षर की प्रक्रिया शुरु हुई, तो मनमोहन सिंह ने अपना सब कुछ दाँव पर लगा दिया - यहाँ तक कि सरकार का भविष्य भी.
संधि पर संशय
"प्रधानमंत्री जी, ये एक महत्वपूर्ण संधि है. आप और राष्ट्रपति बुश भारत-अमरीका रिश्तों को नए स्तर पर ले जाने वाले हैं. मुझे पता है कि ये आपके लिए मुश्किल है, लेकिन ये राष्ट्रपति बुश के लिए भी मुश्किल है. मैं यहाँ मोलभाव के लिए नहीं आई हैं, बल्कि ये कहने आई हूँ कि आप अपने अधिकारियों से कहें कि राष्ट्रपति बुश से मिलने से पहले काम खत्म करें"
पूर्व अमेरिकी विदेश मंत्री कोंडोलीज़ा राईस, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से
जुलाई 2005 को भारत औऱ अमरीका इस संधि पर हस्ताक्षर करने को तैयार थे. कोंडोलीज़ा राइस ने नटवर सिंह को वाशिंगटन में विलार्ड होटल में अपने कमरे में बुलाया ताकि संधि की शर्तों पर बातचीत हो सके. राइस सावधानी बरतना चाहती थीं. उधर अमरीका में हर जगह संधि की चर्चा थी. राइस चाहती थीं कि एक शांत जगह पर संधि पर बातचीत हो.
लेकिन कुछ गड़बड़ था. राइस ने लिखा है, नटवर अडिग थे. वो संधि चाहते थे. लेकिन प्रधानमंत्री आश्वस्त नहीं थे कि वो भारत में संधि पर कैसे जनमत तैयार करेंगे.
दोनो विदेश मंत्रियों ने संधि पर चर्चा की, लेकिन वो बहुत दूर नहीं जा पाए.
आखिरकार नटवर ने कहा कि वो दस्तावेज़ को लेकर प्रधानमंत्री के पास जाएँगे और फिर बताएँगे. लेकिन भारतीय शिविर से ख़बर बहुत अच्छी नहीं थी.
मनमोहन सिंह जहाँ अपनी बात कर कायम थे, राइस भी ज़्यादा सुनने को तैयार नहीं थीं.
जब राइस राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश से मिलने पहुँचीं तो उन्होंने उन्हें पूरी जानकारी दी. बुश ने कहा, बहुत बुरा.
अगले दिन राइस ने एक और कोशिश करने की ठानी लेकिन प्रधानमंत्री ने राइस से मिलने को मना कर दिया. नटवर सिंह ने राइस को बताया कि प्रधानमंत्री उनसे नहीं मिलना चाहते क्योंकि वो उन्हें ना नहीं करना चाहते.
राइस ने नटवर से कहा कि वो एक बार और कोशिश करें. इस बार प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह राइस से मिलने के तैयार हो गए.
बैठक में राइस ने मनमोहन सिंह से कहा, प्रधानमंत्री जी, ये एक महत्वपूर्ण संधि है. आप और राष्ट्रपति बुश भारत-अमरीका रिश्तों को नए स्तर पर ले जाने वाले हैं. मुझे पता है कि ये आपके लिए मुश्किल है, लेकिन ये राष्ट्रपति बुश के लिए भी मुश्किल है. मैं यहाँ मोलभाव के लिए नहीं आई, बल्कि ये कहने आई हूँ कि आप अपने अधिकारियों से कहें कि राष्ट्रपति बुश से मिलने से पहले काम पूरा करें.
प्रधानमंत्री ने हामी भर दी. और संधि पर हस्ताक्षर हो गए.

















