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बाघिन की पीट-पीट कर हत्या

 रविवार, 25 सितंबर, 2011 को 18:30 IST तक के समाचार

भारत में बाघों की संख्या तेज़ी से घटती जा रही है

छत्तीसगढ़ के राजनंदगांव में ग्रामीणों द्वारा बाघिन को पीट-पीट कर मार डालने की घटना ने राज्य के वन विभाग को कटघरे में ला खड़ा किया है.

वन्यजीवों के संरक्षण के लिए काम कर रहे कार्यकर्ता मानते हैं कि ऐसा विभाग के अमले की लापरवाही की वजह से हुआ है.

फ़िलहाल अधिकारियों का कहना है कि वो मामले की जांच कर रहे हैं ताकि ये पता चल सके कि बाघिन को किन परिस्थितियों में लोगों के हुजूम ने पीट-पीट कर मार डाला.

सरकार के पास इस घटना को लेकर कोई ठोस दलील नहीं है. अधिकारी सिर्फ़ जांच की बात भर कर रहे हैं.

अधिकारी इस मामले से ये कहते हुए पल्ला भी झाड़ रहे हैं कि भीड़ के आगे सब बेबस थे.

मगर दबी ज़ुबान से वो ये भी कह रहे हैं कि जिन लोगों नें इस बाघिन को मार डाला है, उनपर कार्रवाई होगी.

घटना


महाराष्ट्र के जंगलों से छत्तीसीगढ़ में घुस आई एक बाघिन को लेकर राजनंदगांव के छुरिया इलाक़े के लोग भयभीत थे.

इस बाघिन ने पिछले डेढ़ महीने में गांव की एक वृद्ध महिला को मार दिया था और कुछ लोगों पर हमला कर उन्हें ज़ख़्मी भी कर दिया था.

इन हमलों के बाद शोर मचा कि बाघिन आदमखोर है.

वन विभाग को इसकी सूचना दी गई, मगर अमले बाघिन को पकड़ने में क़ामयाब नहीं हो सके.

शनिवार को बाघिन को बखरूटोला के पास देखा गया.

"ये पूरा मामला वन विभाग के अधिकारियों की लापरवाही की वजह से हुआ है. अगर समय रहते विभाग के अधिकारियों ने मामले की गंभीरता को समझा होता तो शायद ये नौबत नहीं आती"

मीतू गुप्ता

इसके बाद लोग जा होने शुरू हो गए और फिर हज़ारों की भीड़ ने बाघिन को एक गांव से दूसरे गांव दौड़ाना शुरू कर दिया.

बाद में वन विभाग के अमले ने उसे पकड़ने के लिए जाल फेंका और बाघिन उसमें जा फंसी.

बर्बरता

इसके बाद उत्तेजित भीड़ ने जाल में फंसी बाघिन को लाठियों और पत्थरों से पीट-पीट कर मार डाला.

लोगों के ग़ुस्से का आलम ये था कि किसी ने बाघिन के दांत तोड़ दिए तो किसी ने उसकी आंखें फोड़ दीं, किसी ने उसकी दुम काट डाली तो किसी ने उसके सिर की हड्डी को चकनाचूर कर दिया.

बाद में मृत बाघिन को लेकर एक जुलूस निकाला गया और वन विभाग के अधिकारी तमाशबीन की तरह देखते रहे.

जंगली जीवों के संरक्षण के लिए काम करनेवाली सामाजिक संस्था 'वाइल्ड लाईफ एसओएस' की मीतू गुप्ता का कहना है, ''ये पूरा मामला वन विभाग के अधिकारियों की लापरवाही की वजह से हुआ है. अगर समय रहते विभाग के अधिकारियों ने मामले की गंभीरता को समझा होता तो शायद ये नौबत नहीं आती.''

आदमखोर नहीं

पहले भी बाघों को रिहायशी इलाक़े में आने पर निशाना बनाया गया है

मीतू इस बात से भी इनकार करती हैं कि बाघिन आदमखोर थी.

उनका कहना है कि बाघिन ने जो कुछ किया उसे महज़ दुर्घटना के रूप में देखा जाना चाहिए.

उन्होंने कहा, "बाघ आदमखोर तब कहलाता है जब उसने किसी इनसान को मारा हो या फिर उसके शरीर के 85 प्रतिशत हिस्से को खा गया हो. राजनंदगांव के मामले में ऐसा नहीं हुआ."

वन्यजीव संरक्षण के लिए काम करनेवाले लोगों में वन विभाग के रवय्ये को लेकर काफी रोष है.

उनका कहना है कि जो वन्यकर्मी राजनंदगांव में बाघिन को काबू करने गए थे, वो विभाग के विशेषज्ञ नहीं बल्कि पशुपालन विभाग के कर्मचारी थे. इस दस्ते में शामिल लोगों को बेहोशी की दवा की सुई लगानी भी नहीं आती थी.

दूसरी लापरवाही

इस प्रकरण का दूसरा पहलू ये है कि बाघिन को सुबह सात बजे देखा गया था और इसकी सूचना वन विभाग के अधिकारियों तक पहुंचा भी दी गयी थी, लेकिन वन्यकर्मी दोपहर तक घटनास्थल पर नहीं पहुंच सके थे.

ये दूसरा मौक़ा है जब लोगों की भीड़ ने छत्तीसगढ़ में किसी बाघ को मार डाला है.

इससे पहले कवर्धा में ग्रामीणों ने एक बाघ को ज़हर देकर सिर्फ़ इसलिए मार डाला था क्योंकि वन विभाग ने उन ग्रामीणों को मुआवज़ा नहीं दिया था जिनके जानवर बाघ खा गया था.

विभाग के अधिकारी इस प्रकरण पर कुछ भी कहने से कतरा रहे हैं.

उनका कहना है कि वो घटना की समीक्षा कर रहे हैं.

वो ये भी कहते हैं कि बाघिन को मारने वाले ग्रामीणों पर मामला दर्ज किया जाएगा. लेकिन विभाग की लापरवाही के बारे में कोई कुछ नहीं कहना चाहता है.

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