बिहार में दिमाग़ी बुख़ार का प्रकोप

 गुरुवार, 15 सितंबर, 2011 को 03:39 IST तक के समाचार
मरीज़

एन्सेफ्लाइटिस से ग्रस्त 100 से भी अधिक बच्चे गया और पटना के अस्पतालों में भर्ती हैं.

बिहार में ग़रीब तबक़े के बच्चों पर मस्तिष्क ज्वर (एन्सेफ़लाइटिस) का बढ़ता हुआ प्रकोप महामारी की शक्ल में उभरता दिख रहा है.

राज्य के विभिन्न ज़िलों में इस रोग से बीते चार महीनों के दौरान आधिकारिक सूचनानुसार कम से कम 82 बच्चों की मौत हो चुकी है.

डॉक्टर इसे 'जापानी एन्सेफ्लाइटिस' नाम की बीमारी बता रहे हैं और इस समय इसका सबसे अधिक प्रकोप बिहार के गया ज़िले में है.

गया के मगध मेडिकल कॉलेज अस्पताल में गत 23 अगस्त से 14 सितम्बर के बीच, यानी तीन हफ़्तों में 27 बच्चे मौत का शिकार हो चुके हैं.

राज्य के मुज़फ्फ़रपुर स्थित अस्पतालों में भी इसी साल मई और जून के महीनों में इस रोग से 55 बच्चों की जानें जा चुकी हैं.

तेज़ बुखार, शरीर में ऐंठन और कम्पन के साथ बेहोशी के दौरे जैसे लक्षणों वाली इस बीमारी का फैलाव राज्य के कई अन्य ज़िलों में भी हो गया है.

"हालत गंभीर हो जाने के बाद ही इस रोग से ग्रस्त बच्चों को अस्पताल लाया जाता है, इसलिए मृतकों की तादाद इतनी बढ़ रही है. ज़रूरी दवाओं की भी कमी नहीं है और समय पर अस्पताल पहुंचे कई बच्चों को बचा लिया गया है. फिर भी इस रोग के छह-सात मरीज़ प्रायः हर रोज़ अस्पताल में भर्ती हो रहे हैं."

डॉ सीताराम, अधीक्षक, गया मेडिकल कॉलेज

इसकी चपेट में आए हुए 100 से भी अधिक बच्चे गया और पटना के अस्पतालों में भर्ती हैं.

जब मुज़फ्फ़रपुर में इस रोग से दो-तीन महीने पहले हाहाकार मचा था, तो उस समय चिकित्सा विशेषज्ञों के बीच बहस चल पड़ी थी कि यह ' एन्सेफलाइटिस' है या नहीं.

अब हालांकि अधिकांश चिकित्सक इसे 'जापानी एन्सेफलाइटिस' बता रहे हैं लेकिन सम्बंधित प्रयोगशालाओं में इस बाबत चल रही जांच का अंतिम निष्कर्ष अभी भी नहीं मिल पाया है.

वैसे, वायरल यानी विषाणु जनित रोग मानकर इसके इलाज़ की ख़ास दवाओं से सम्बंधित 'किट्स' राज्य के सभी बड़े मेडिकल कॉलेज अस्पतालों में उपलब्ध करा देने का दावा राज्य सरकार कर रही है.

लेकिन मरीज़ों के परिजन यहाँ अस्पतालों में बेड की कमी और समय पर ऐसे रोगियों की देखभाल ठीक से नहीं होने की शिकायतों के साथ ख़ासे नाराज़ भी हैं.

गया मेडिकल कॉलेज अस्पताल के अधीक्षक डॉ सीताराम ने बुधवार शाम बीबीसी को टेलीफोन पर बताया,'' हालत गंभीर हो जाने के बाद ही इस रोग से ग्रस्त बच्चों को अस्पताल लाया जाता है, इसलिए मृतकों की तादाद इतनी बढ़ रही है. ज़रूरी दवाओं की भी कमी नहीं है और समय पर अस्पताल पहुंचे कई बच्चों को बचा लिया गया है. फिर भी इस रोग के छह-सात मरीज़ प्रायः हर रोज़ अस्पताल में भर्ती हो रहे हैं.''

पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल में भी इस बीमारी का इलाज़ करा रहे बच्चों की संख्या बढ़कर 40 तक जा पहुँची है.

कुछ डॉक्टरों का कहना है कि एक ख़ास तरह के मच्छरों के काटने से यह रोग फ़ैल रहा है और सूअर, गाय-भैंस जैसे पालतू मवेशियों के इर्द-गिर्द जमा गंदगी में ऐसे मच्छर पलते-बढ़ते हैं.

संभवतः इसलिए मस्तिष्क ज्वर से पीड़ित होने वालों में उन मलिन बस्तियों के ग़रीब दलित परिवार से जुड़े बच्चे ज़्यादा हैं, जहाँ ऐसी गंदगी अधिक है.

इससे जुड़ी और सामग्रियाँ

BBC © 2014 बाहरी वेबसाइटों की विषय सामग्री के लिए बीबीसी ज़िम्मेदार नहीं है.

यदि आप अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करते हुए इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरूप कर लें तो आप इस पेज को ठीक तरह से देख सकेंगे. अपने मौजूदा ब्राउज़र की मदद से यदि आप इस पेज की सामग्री देख भी पा रहे हैं तो भी इस पेज को पूरा नहीं देख सकेंगे. कृपया अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करने या फिर संभव हो तो इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरुप बनाने पर विचार करें.