9/11 के हैदराबादी 'संदिग्ध'

 मंगलवार, 13 सितंबर, 2011 को 00:15 IST तक के समाचार
अज़मत हैदराबाद

अज़मत और तस्लीम के लिए दस साल पहले का वो ख़ौफ़ आज भी बरक़रार है.

नौ सितंबर को अमरीका पर हुए हमलों में जहां हजारों जानें गईं और लाखों लोगों का जीवन अस्त-व्यस्त हो गया वहीं हैदराबाद के दो ऐसे व्यक्ति भी उसकी चपेट में आ गए जिनका उस घटना से कोई लेना-देना नहीं था.

पुलिस ने मोहम्मद अज़मत जावेद और गुल मोहम्मद को घटना में शामिल होने के संदेह में गिरफ़्तार कर लिया. दोनों को महीनों तक जेल भुगतनी पड़ी.

अमरीका की जांच एजेंसी एफ़बीआई ने दोनों को न्यू जर्सी से टेक्सस जा रही एक ट्रेन से गिरफ़्तार किया था. दोनों की श्कलें अरबों जैसी थीं.

सालों से अमरीका में काम कर रहे अज़मत और गुल मोहम्मद नई नौकरी ज्वाइन करने के लिए टेक्सस जा रहे थे.

टीवी चैनलों पर

अमरीकी अधिकारियों ने दावा किया कि दोनों का संबंध हमलों से हैं और उनकी तस्वीरें थोड़ी देर में ही विश्व भर के टीवी चैनलों पर दिखाए जाने लगे.

दोनों युवकों को ख़ुद को निर्दोष सिद्ध कर वतन वापस पहुंचने में डेढ़ साल का लम्बा समय लगा, जिस दौरान उन्हें न सिर्फ़ जेल में रहना पड़ा, बल्कि यातनाएं बर्दाश्त करनी पड़ीं और उन्हें अपराध भी स्वीकार करने के लिए मजबूर किया गया.

बाद में छानबीन के लिए हैदराबाद आए एफ़बीआई दल को किसी आपत्तिजनक बात का पता नहीं चला और अज़मत जावेद और गुल मोहम्मद को अमरीकी अदालत ने रिहा कर दिया.

इस वाक़ए को 10 साल गुज़र चुके हैं लेकिन फिर भी दोनों का जीवन सामान्य नहीं हो सका है और उन दिनों के काले साए आज भी उनका पीछा कर रही हैं.

गुल मोहम्मद आजकल रेडीमेड कपड़ों का व्यापार करते हैं जबकि अज़मत ने एक के बाद कई तरह के धंधे शूरू किए लेकिन सब चौपट हो गए.

अज़मत उन दिनों को याद नहीं करना चाहते जब उनकी ज़िंदगी में एक भूचाल आ गया था.

बूरा सपना

डर क़ायम है

"जब भी सितंबर 11 आता है मुझे डर लगता है कि वो वक़्त फिर से न वापस आ जाए जिसने हमारे जीवन को उलट पलट कर रख दिया. हमारे घाव आज तक भर नहीं सके हैं. बहुत तकलीफ़ होती है. हम आज भी सही तौर पर संभल नहीं सके हैं. आज भी वह भय और तनाव बाक़ी है."

तस्लीम

अज़मत कहते हैं, "मेरे साथ जो कुछ हुआ वो सब मुझे याद है लेकिन वो एक भयानक सपने की तरह है जिसे मैं ज़ेहन में वापस लाने से भी डरता हूँ. मुझे घटना के दुसरे दिन ही गिरफ़्तार कर लिया गया था और फिर 18 महीने तक बिना किसी कारण यातना भरे माहौल में रखा गया. ज़िंदगी अच्छी गुज़र रही थी जिसे महज़ शक़ के आधार पर बर्बाद कर दिया गया. मेरे परिवार को भी काफ़ी तक्लीफ़ उठानी पड़ी. इस हादसे ने मेरा सब कुछ ख़त्म कर दिया. अब बिना मदद के फिर से ज़िंदगी को सुलझा पाना बहुत मुश्किल है. मैं सालों से कोशिश कर रहा हूँ कि ख़ुद को नॉर्मल करूं लेकिन कर नहीं पाया."

पुराने हैदराबाद के रहनेवाले अज़मत जब जेल में थे उस वक़्त उनके बेटे बिलाल की उम्र केवल सात माह थी, उनकी पत्नी, तस्लीम जो मूलत: पाकिस्तान की हैं, का वीज़ा ख़त्म हो गया जिसके बाद उन्हें भारत छोड़ने का हुक्म दिया गया. स्थानीय पुलिस ने उन्हें गिरफ़्तार कर लिया था लेकिन हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के कारण उन्हें शौहर के घर में रहने की इजाज़त मिल पाई.

उन दिनों को याद करते हुए तस्लीम कहती हैं, "जब भी सितंबर 11 आता है मुझे डर लगता है कि वो वक़्त फिर से न वापस आ जाए जिसने हमारे जीवन को उलट पलट कर रख दिया. हमारे घाव आज तक भर नहीं सके हैं. बहुत तकलीफ़ होती है. हम आज भी सही तौर पर संभल नहीं सके हैं. आज भी वो भय और तनाव बाक़ी है."

तस्लीम कहती हैं कि अमरीका से वापसी के बाद अज़मत की मानसिक हालत अच्छी नहीं थी और वो बहुत जल्द गुस्से में आ जाते थे. लेकिन कुछ साल पहले बेटी साफि़या के पैदा होने के बाद वो काफी बदल गए हैं.

अज़मत का कहना है कि उनपर जो बीती उसका ज़िक्र वो बच्चों के सामने नहीं करते, "जब वो बड़े हो जाएंगे तो खुद ही जान लेंगे."

गिरफ़्तारी के बाद गुल मोहम्मद की बीवी उन्हें छोड़कर मायके चली गई थीं हालांकि वो बाद में लौट आईं. अब वो अपने तीन बच्चों के साथ सामान्य जीवन बिता रहे हैं.

'अमरीका नहीं'

अब अमरीका नहीं

"अमरीका एक अच्छा देश है, लोग अच्छे हैं लेकिन उस वक़्त वहां की सरकार और व्यवस्था ने जो किया वो बहुत ग़लत था"

मोहम्मद अज़मत जावेद

अज़मत और गुल मोहम्मद ने मुआवज़े के लिए अमरीका की एक अदालत में याचिका डाल रखी है.

अज़मत को यक़ीन है कि कि उन्हें मुआवज़ा मिलेगा. लेकिन दोनों अमेरिका वापस नहीं जाना चाहते हैं.

अज़मत कहते हैं, "अमरीका एक अच्छा देश है, लोग अच्छे हैं लेकिन उस वक़्त वहां की सरकार और व्यवस्था ने जो किया वो बहुत ग़लत था."

"उन्होंने केवल राजनैतिक लाभ के लिए न केवल मेरी बल्कि बहुतों की ज़िंदगी बर्बाद कर दी. अगर आप इतिहास उलटकर देखें तो उन्होंने हमेशा ऐसा ही किया है. दुसरे विश्व युद्ध के समय उन्होंने हज़ारों जापानियों को गिरफ्तार किया था. सैंकड़ों लोगों की मौत जेल में ही हो गई थी और जो रिहा हुए वो बहुत बूढ़े हो चुके थे. शीत युद्ध के दौरान उन्होंने पूर्वी यूरोप के लोगों के साथ भी यही किया. अब वो मुसलमानों के साथ वही सब दुहरा रहे हैं."

लेकिन अज़मत को इस बात की भी पीड़ा है कि निर्दोष होने के बावजूद उन्हें जिस तरह विदेश यानि अमरीका में ग़लत आरोपों के कारण कष्ट झेलने पड़े उससे अलग हालात देश में भी नहीं, जहां ख़ुद हैदराबाद में निर्दोष युवाओं को पुलिस के संदेह में वैसे ही हालात से गुज़रना पड़ा.

वो ऐसे युवाओं की बेहतरी के लिए कुछ करने के ख़्वाहिशमंद हैं.

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