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सांप्रदायिक हिंसा विधेयक पर विवाद

 शनिवार, 10 सितंबर, 2011 को 20:25 IST तक के समाचार
गुजरात हिंसा (फ़ाईल)

सांप्रदायिक बिल पर गुजरात दंगों से उठे सवालों की छाप साफ़ है

सांप्रदायिक हिंसा की रोकथाम के लिए बनाए गए बिल पर जहाँ विभिन्न दलों में सहमति नहीं बन पा रही है, गृह सचिव आरके सिंह ने कहा है बिल को विभिन्न विभागों और राज्यों से चर्चा के बाद ही इसे संसद में पेश किया जाएगा.

एक तरफ़ जहाँ एनडीए-प्रशासित दलों और दूसरी सरकारों ने बिल के मसौदे पर चिंता ज़ाहिर की है, रिपोर्टों के मुताबिक यूपीए सदस्य तृणमूल ने भी इसे खतरनाक कानून बताया है जिससे देश के संघीय ढाँचे को नुकसान पहुँचेगा.

शनिवार से शुरू हुई राष्ट्रीय एकीकरण परिषद की बैठक में एनडीए-शासित प्रदेशों ने मसौदे के वर्तमान मसौदे पर चिंता ज़ाहिर की. तमिलनाडु मुख्यमंत्री जयललिता ने कहा कि इस बिल से राज्यों के अधिकारों पर असर पड़ेगा.

लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने इसे सांप्रदायिकता बढ़ाने वाला बताया, जबकि तृणमूल कांग्रेस के दिनेश त्रिवेदी ने भी बिल का विरोध किया. उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री की ओर से कहा गया कि उन्हें बिल की कॉपी नहीं भेजी गई है इसलिए वो इस पर कुछ नहीं कहेंगी.

गृह सचिव आरके सिंह के मुताबिक प्रधानमंत्री की ओर से कहा गया कि उन्होंने सभी चिंताओं को नोट कर लिया है और जो भी बिल लाया जाएगा वो संविधान के मुताबिक होगा.

गुजरात दंगों की छाप

दरअसल सोनिया गाँधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के तैयार किए गए सांप्रदायिक बिल पर गुजरात दंगों से उठे सवालों की छाप साफ़ है. इस परिषद में ऐसे लोग हैं जो गुजरात दंगों पर गुजरात राज्य सरकार के किरदार की आलोचक रहे हैं.

सभी आपत्तियों का रखा जाएगा ध्यान

"सभी चिंताओं को नोट कर लिया गया है और जो भी बिल लाया जाएगा वो संविधान के मुताबिक होगा."

मनमोहन सिंह, प्रधानमंत्री

इस मसौदे को सुनियोजित हिंसा या ऐसी हिंसक गतिविधि जिसमें सोचसमझकर लोगों को मारा जाए, उसे रोकने के लिए तैयार किया गया है. इसमें अफ़सरों को लापरवाली के लिए दंड का प्रावधान है. इसमें राज्य और केंद्र के स्तर पर विशेष एजेंसी बनाने का प्रावधान है जो अफ़सरों के कामकाज पर निगाह रख सके.

इस मसौदे में सांप्रदायिक हिंसा को ऐसी हिंसा बताया गया है जो राष्ट्र के धर्मनिर्पेक्ष ढाँचे को नुकसान पहुँचाए. आलोचकों को मुताबिक सांप्रदायिक हिंसा की ऐसी अस्पष्ट परिभाषा निर्धारित करना गलत है.

इस बिल के विरोधियों के अनुसार सबसे ज़्यादा चिंता मसौदे में इस बात के कहे जाने पर कि अगर केंद्र चाहे तो राज्य के कामकाज हस्तक्षेप कर सकती है. उनका मानना है कि कानून व्यवस्था राज्य के अधिकारों के अंतर्गत आते हैं, और ऐसे में केंद्र के हस्तक्षेप की बात पर राज्यों में चिंता है खासकर पूर्व में जिस तरह केंद्र सरकारें राज्यों के कामकाम में अनैतिक हस्तक्षेप करते रहे हैं.

कई लोगों के लिए मसौदे से एक और नाराज़गी इस बात पर है कि मसौदे में ये माना गया है कि सांप्रदायिक हंगामें के लिए कथित तौर पर बहुसंख्यक ज़िम्मेदार हैं. मसौदे में हिंसा झेलने वाले ग्रुप या गुट के मुताबिक धार्मिक या भाषाई तौर पर अल्पसंख्यक लोग.

आलोचकों के मुताबिक ये मान कर चलना कि बहुसंख्यक समुदाय के लोग ही हिंसा करेंगें या फैलाएंगे, ये गलत औऱ आपत्तिजनक सोच है.

इस मसौदे से साफ़ है कि केंद्र सरकार सोच रही है कि बाबरी मस्जिद विध्वंस और गुजरात दंगों जैसे मामलों में कैसे केंद्र और राज्यों की जवाबदेही निश्चित की जाए.

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