बुरे अनुभव भी....

जस्टिस प्रसाद

जस्टिस प्रसाद बिहार में हालातों से दुखी नज़र आते हैं.

अन्ना हज़ारे के जन लोकपालन बिल मसौदे में राज्यों के लोकायुक्त का मुद्दा ख़ासा चर्चित रहा है.

देश के जिन 18 राज्यों में लोकायुक्त नाम की संस्था काम कर रही है, उनमें बिहार भी शामिल है.

लेकिन इस राज्य के लोकायुक्त पद से हाल ही में 24 अगस्त को रिटायर होने वाले जस्टिस रामनंदन प्रसाद के अनुभव अच्छे नहीं रहे हैं.

उन्होंने ख़ुद ये माना है कि बिहार में लोकायुक्त को अशक्त और निष्प्रभावी क़ानूनी प्रावधानों से कमज़ोर बनाकर रखा गया है.

बीबीसी से हुई एक विशेष बातचीत में जस्टिस प्रसाद ने इस बात को स्वीकार किया कि बिहार में अधिकारी लोकायुक्त कार्यालय को ज़्यादा तरजीह नहीं देते हैं.

उन्होंने कहा, " किसी अधिकारी को भले ही दस-दस चिट्ठियां गई हों पर एक का भी जवाब नहीं आता. मैंने जब ऐसे अधिकारीयों को सदेह उपस्थित होने के सख्त आदेश भेजने शुरू किये तो उनमें से एक सीनियर आइएएस अफ़सर आपत्ति ज़ाहिर करने मेरे दफ्तर पहुँच गये."

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पटना हाईकोर्ट में लंबे समय तक न्यायाधीश रह चुके रामनंदन प्रसाद का कहना है कि मौजूदा क़ानून में संशोधन किये बिना या कर्णाटक और मध्यप्रदेश जैसी साधन-सुविधाएं उपलब्ध कराए बिना यहाँ लोकपाल संस्था को कारगर नहीं बनाया जा सकता.

उन्होंने माना कि इस संस्था के बारे में लोगों को जागरूक और अधिकारीयों को सक्रिय बनाने के तमाम व्यक्तिगत प्रयासों के बावजूद वो हालात में अपेक्षित सुधार नहीं ला सके.

जस्टिस प्रसाद के अनुसार अभी भी बिहार के लोकायुक्त कार्यालय में दस हज़ार से अधिक मामले निबटाये जाने के इंतज़ार में पड़े हुए हैं क्योंकि उन पर मांगे गए जवाब अधकारियों ने नहीं भेजे.

भ्रष्टाचार मिटाने या कम करने के लिए बनी संस्थाओं के प्रति सरकार की ऐसी बेरुखी पर कोई टिप्पणी करने से बचते हुए उन्होंने सिर्फ इतना कहा कि ‘अब सशक्त और प्रभावी लोकपाल या लोकायुक्त की बात किस डर से की जा रही है, लोग समझ रहे है’.

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