बीटी बैंगन के विकास में 'चोरी'

बीटी बैंगन

भारत ने बीटी बैंगन के व्यावसायिक उत्पादन की अनुमति नहीं दी है

राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण या एनबीए बिना इजाज़त बैंगन की स्थानीय प्रजातियों के इस्तेमाल के लिए बीटी बैंगन विकसित करनेवाली कंपनियों के ख़िलाफ़ क़ानूनी कारवाई कर सकता है.

आरोप है कि बीटी बैंगन का विकास करने वाली कंपनियों ने इसके आनुवंशिक संवर्धन में स्थानीय प्रजातियों का इस्तेमाल किया जिसके लिए उन्होंने अनुमति हासिल नहीं की थी.

जैव विवधिता क़ानून के अनुसार स्थानीय जैव संपत्ति के उपयोग के लिए पहले से इजाज़त लेनी ज़रूरी है.

बीटी बैंगन का विकास सरकारी और निजी क्षेत्र की कंपनियों ओर संस्थाओं ने मिलकर किया है.

इसके विकास में अमरीकन कंपनी मॉनसेंटो, माहिको, कृषि विज्ञान विश्वविद्यालय, धारवाड़, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ वेजिटेबल रिसर्च और सतगुरू मैनेजमेंट कंसल्टेंट शामिल थीं.

बैठक

माहिको/मॉनसेंटो और उनके सहयोगियों ने बीटी बैंगन के विकास में तथाकथित तौर पर बैंगन की स्थानीय जातियों के इस्तेमाल पर पृष्ठभूमि और क़ानूनी नज़िरयों पर विचार विमर्श किया गया और ये फैसला किया गया है कि एनबीए माहिको/मॉनसेटो और दूसरे संबंधित लोगों के ख़िलाफ़ क़ानूनी कारवाई कर सकता है ताकि इस मामले को उसके निष्कर्ष तक पहुंचाया जा सके

राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण

संवर्धित बैंगन का विकास करनेवाली कंपनियों के ख़िलाफ़ क़ानूनी कारवाई करने का फ़ैसला प्राधिकरण ने दो महीने पहले दिल्ली में हुई अपनी एक बैठक के दौरान लिया था.

बैठक के ब्यौरे में कहा गया है, "माहिको/मॉनसेंटो और उनके सहयोगियों ने बीटी बैंगन के विकास में तथाकथित तौर पर बैंगन की स्थानीय जातियों के इस्तेमाल पर पृष्ठभूमि और क़ानूनी नज़िरयों पर विचार विमर्श किया गया और ये फैसला किया गया है कि एनबीए माहिको/मॉनसेटो और दूसरे संबंधित लोगों के ख़िलाफ़ क़ानूनी कारवाई कर सकता है ताकि इस मामले को उसके निष्कर्ष तक पहुंचाया जा सके."

प्राधिकरण के इस निर्णय के बाद से बीटी बैंगन के मामले में एक और विवाद पैदा हो गया है.

पिछले साल फ़रवरी में वैज्ञानिकों, पर्यावरणविदों और आम लोगों के एक तबक़े के विरोध की वजह से पूर्व पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने बीटी बैंगन के व्यावसायिक उत्पादन पर रोक लगा दी थी.

बीटी बैंगन को लेकर भारत के कई हिस्सों में व्यापक प्रदर्शन हुए थे.

नुक़सान

विरोधियों का कहना है कि आनुवंशिक रूप से संवर्धित ये सब्ज़ी स्वास्थ और पर्यावरण दोनों के लिए हानिकारक है और भविष्य में इससे किसानों को भी बहुत नुक़सान होगा.

प्राधिकरण की क़ानूनी कारवाई का फ़ैसला बंगलौर स्थित एक स्वंयसेवी संस्था की शिकायत के बाद आया है.

संस्था ने कर्नाटक जैव बोर्ड से शिकायत की थी कि बीटी बैंगन का विकास कर रही कंपनियों ने संवर्धन में बिना अनुमति के भारतीय प्रजातियों का प्रयोग किया है.

राज्य बोर्ड ने अपनी जांच के बाद प्राधिकरण को इसकी रिपोर्ट देते हुए कहा कि बीटी बैंगन के विकास में बैंगन की छह स्थानीय क़िस्मों का प्रयोग किया गया है.

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