"मेरा तो भविष्य ग़ुलाम हो गया"

आम्रपाली

पत्नी और दो बच्चों के साथ मैं दिल्ली के विकासपुरी इलाके में किराए के मकान में रहता हूँ.

रांची से मनोविज्ञान में एमए की डिग्री लेने के बाद 1993 में मैं दिल्ली आया.

पिछले 15 साल से लगातार किराए के मकान में रहते रहते मैने और मेरी पत्नी ने सोचा कि क्यों न एक अपना फ्लैट ले लिया जाए.

इसी बीच नोएडा एक्सटेंशन के बारे में बहुत सारे विज्ञापन देखने को मिले , 2010 के अक्टूबर में मैं पत्नी के साथ नोएडा एक्सटेंशन में जगह देखने गए. हमें एक बिल्डर का मॉडल पसंद आया.

सुनहरी चमक

मैने और मेरी पत्नी ने जब इसे देखा तो आँखों में अपने मकान की सुनहरी चमक पैदा हो गई. मैं बहुत खुश था. सिर्फ़ ये सोचकर कि तीन साल बाद आखि़रकार मकान हमारा अपना होगा. मैने चार बेडरूम का फ़्लैट बुक किया, कि अगर कोई मेहमान आ जाए तो एक कमरा उसे भी दिया जा सकता है और दो कमरे बच्चों के लिए.

आनन-फ़ानन में मैने रक़म की व्यवस्था की और दस फ़ीसदी रक़म का भुगतान कर दिया.

बिल्डर के मैनेजिंग डॉयरेक्टर से जब मेरी बात हुई तो उन्होने मुझे कुछ कंसेशन भी दे दिया. अब चिंता बाकी की रक़म चुकाने की थी. मैने फ्लैक्सी प्लान लिया था. इसका मतलब ये हुआ कि तीन महीने के भीतर 40 फ़ीसदी रक़म चुकानी थी.

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आम्रपाली

फ्लैट के लिए 15 लाख का भुगतान किया गया

उस समय तक कोई भी बैंक लोन जारी नहीं कर रहा था, पर चूंकि मैं खुद बैंकिंग सेक्टर में काम करता हूँ इसलिए मेरे अपने प्रयासों से कॉर्पोरेशन बैंक ने मुझे लोन जारी किया. ये रकम तक़रीबन 11 लाख की थी.

मैं और मेरी पत्नी निश्चिंत थे और बड़ी आशा भरी नज़रों से कभी-कभी उस जगह भी जाया करते थे जहाँ पर खुदाई का काम चल रहा था.

खुदाई होते देखकर इतना अच्छा लगता था कि बता नहीं सकता.

अपने ही आँखों के सामने अपना मकान बनते देखना, इससे बड़ा सच मेरे लिए कुछ नहीं था.

चिंता का दौर

लेकिन जब शाहबेरी गाँव का फ़ैसला आया तो मैं चिंतित हो उठा. बिल्डर से मैने इस बारे में बात की तो उसने कहा कि चिंता की कोई बात नहीं, पटवारी गाँव में कोई भी विवाद नही हैं.

यहाँ तक कि बिल्डर ने मुझे एक चिट्ठी भी दी जो कि विकास प्राधिकरण ने जारी की थी. इसके मुताबिक पटवारी गाँव में कोई भी याचिका दायर नहीं थी

पर आखिरकार 19 जुलाई को एक ऐसा फ़ैसला आया कि उसने मेरे पूरे परिवार की नींद उड़ाकर रख दी.

जब फ़ैसला आया तो मैं और मेरी पत्नी दोनो फफक कर रो पड़े. मैं अपनी पूरी ज़िंदगी की कमाई को इसमें लगा चुका हूँ. बैक लोन समेत अब तक 15 लाख दे चुका हूँ.

आप तो जानते ही हैं कि दिल्ली में बचत करना कितना मुश्किल है. पाई-पाई जोड़कर मैने ये पैसे बिल्डर को दिए थे.

घरवाले भी तबसे लगातार फ़ोन कर रहे हैं कि क्या हो रहा है. मैने बिल्डर से कई बार बात करने की कोशिश की लेकिन अब तक का नतीजा सिफ़र ही निकला.

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दोहरी मार

राम लाल केशरी

राम लाल केशरी

एक तरफ़ तो मेरी सारी जमा पूँजी निकल गई, दूसरी तरफ़ मई से लोन की क़िस्त कटने लगी है. औऱ ये कोई कम नहीं. 36 हज़ार 531 रुपए महीने की ईएमआई बड़ी मुश्किल से निकलती है. मैने बिल्डर से कहा कि अब जब फ़ैसला आ गया है तो कम से कम बैंक के लोन की रक़म तो वापस लौटा दो. अगर मैं ईएमआई नहीं चुकाता हूँ तो मैं डिफ़ॉल्टर लिस्ट में आ जाऊँगा. बहुत कुछ कहना चाहता हूँ पर शब्द .... शब्द आँसू की शक्ल में हैं.

मेरे ऊपर तो ऐसी दोहरी मार पड़ी है कि क्या बताऊं.

एक तरफ़ तो मेरी सारी जमा पूँजी निकल गई, दूसरी तरफ़ मई से लोन की क़िस्त कटने लगी है. औऱ ये कोई कम नहीं. 36 हज़ार 531 रुपए महीने की ईएमआई बड़ी मुश्किल से निकलती है.

मैने बिल्डर से कहा कि अब जब फ़ैसला आ गया है तो कम से कम बैंक के लोन की रक़म तो वापस लौटा दो. बिल्डर ने अभी तक इस बारे में कोई जवाब नहीं दिया.

मैं चूँकि खुद बैंकिंग सेक्टर में काम कर चुका हूँ इसलिए अच्छी तरह से जानता हूँ कि बैंक वाले मुझे छोडेंगे नहीं. वो पाई-पाई सूद समेत लेंगे.

अगर मैं ईएमआई नहीं चुकाता हूँ तो मैं डिफ़ॉल्टर लिस्ट में आ जाऊँगा.

इसका मतलब ये हुआ कि मेरी लोन क्रेडिबिलिटी ही ख़त्म हो जाएगी और भविष्य में मुझे कोई भी बैंक पाँच पैसे का कर्ज़ मुहैया नहीं करवाएगा.

अब लगता है कि सपने सारे टूट गए हैं.

मैं माननीय अदालत से ये निवेदन करता हूँ कि किसानों का आप हित ज़रूर सोंचे मगर हम जैसे लोगों के बारे में भी ज़रूर सोंचे जिन्होंने अपनी ज़िंदगी की सारी गाढ़ी कमाई इसमें लगा दी एक अदद मकान की तलाश में.

जब लगा कि हम इसे हासिल कर सकते हैं तो वो एक ही झटके में बिखर गया.

बहुत कुछ कहना चाहता हूँ पर शब्द .. शब्द आँसू की शक्ल में हैं.

(राम लाल केशरी की आपबीती बीबीसी संवाददाता मोहन लाल शर्मा से की गई बातचीत पर आधारित है.)

अब क्या करूँ ? आख़िरी कड़ी में आप पूजा मल्होत्रा की आप बीती पढ़ पाएंगे कि किस तरह आज वो बिल्डर के चक्कर काट रही हैं....


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