'फिर से चिपको आंदोलन की ज़रूरत'

जयराम रमेश

जयराम रमेश को हाल में ही पर्यावरण मंत्रालय से हटाया गया है

केंद्रीय ग्रामीण विकासमंत्री जयराम रमेश ने कहा है कि देश में जिस रफ़्तार से जंगल काटे जा रहे हैं उसे देखते हुए कई राज्यों में एक बार फिर चिपको आंदोलन शुरू करने की ज़रूरत है.

किसी केंद्रीय मंत्री की ओर से पर्यावरण बचाने के लिए जनांदोलन का आह्वान किया जाना अपने आप में महत्वपूर्ण है.

पर्यावरण मंत्रालय से हटाए जाने के बाद जयराम रमेश ने सार्वजनिक मंच से स्वीकार किया है कि अवैध खनन एक बहुत बड़ी समस्या बन चुकी है और इसके लिए दबाव डालने वालों में हर राजनीतिक पार्टी के लोग शामिल हैं.

उन्होंने कहा, "ग़ैरक़ानूनी खनन देश भर में बहुत बड़ी समस्या बन गई है. मैं बता नहीं सकता हूँ कि कहाँ-कहाँ से दबाव आते हैं. इसका (दबाव का) कोई राजनीतिक रंग नहीं है. सब शामिल हैं."

रमेश ने कहा, "आज जिस तरह जंगल काटे जा रहे हैं, उसे देखते हुए उत्तराखंड ही नहीं कई राज्यों में चिपको आंदोलन की ज़रूरत है."

दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में प्रसिद्ध पर्यावरणविद और चिपको आंदोलन के प्रणेता चंडी प्रसाद भट्ट की पुस्तक 'पर्वत पर्वत, बस्ती बस्ती' के लोकार्पण के मौक़े पर जयराम रमेश पर्यावरण के विनाश ओर उसके लिए ज़िम्मेदार लोगों पर खुल कर बोले.

कड़ा रुख़

ग़ैरक़ानूनी खनन देश भर में बहुत बड़ी समस्या बन गई है. मैं बता नहीं सकता हूँ कि कहाँ-कहाँ से दबाव आते हैं. इसका (दबाव का) कोई राजनीतिक रंग नहीं है. सब शामिल हैं

जयराम रमेश

जयराम रमेश को हाल ही में हुए मंत्रिमंडल फेरबदल में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पर्यावरण मंत्री के पद से हटा कर ग्रामीण विकास मंत्रालय का ज़िम्मा सौंप दिया था.

पर्यावरण मंत्री के तौर पर जयराम रमेश के कई फ़ैसलों पर विवाद हुआ था और कॉरपोरेट लॉबी को उनके ये फ़ैसले रास नहीं आए थे.

उन्होंने उड़ीसा की पोस्को परियोजना से लेकर नियमगिरि पर्वत में वेदांता कंपनी को बॉक्साइट खनन की अनुमति देने के मामले में सख़्त रुख़ अपनाया था.

महाराष्ट्र में लवासा परियोजना ओर आदर्श सोसाइटी के मुद्दे पर भी उन्होंने कड़ा रुख़ अपनाया था.

तभी यह मान जाने लगा था कि मनमोहन मंत्रिमंडल में पर्यावरण मंत्री के तौर पर जयराम रमेश के दिन गिने-चुने ही बचे हैं.

पुस्तक लोकार्पण में देर से पहुँचने का कारण बताते हुए जयराम रमेश ने कहा कि देर इसलिए हो गई क्योंकि उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक का फ़ोन आ गया था.

जयराम रमेश ने कहा, "निशंक बोले जाते जाते आप यह क्या बवाल कर गए हैं? आपने गोमुख से उत्तरकाशी तक के इलाके को इको-सेंसिटिव (पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील) घोषित कर दिया है. यह ख़तरनाक है. इससे तो विकास का काम रुक जाएगा. इसलिए कांग्रेस ओर भाजपा ने मिलकर प्रस्ताव किया है कि हम यह होने नहीं देंगे."

उत्तराखंड में गंगा नदी के उदगम गौमुख से उत्तरकाशी तक की स्थिति को देखते हुए जयराम रमेश ने पर्यावरण मंत्री के तौर पर इस क्षेत्र को संवेदनशील घोषित किए जाने की अधिसूचना जारी कर दी थी. इसका अर्थ यह हुआ की इस इलाक़े में अंधाधुंध निर्माण कार्य नहीं हो सकता.

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री को इसीलिए रमेश से नाराज़गी थी.

जयराम रमेश ने चंडी प्रसाद भट्ट, इतिहासकार रामचंद्र गुहा, शेखर पाठक ओर जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर पुष्पेश पंत की मौजूदगी में श्रोताओं से भरे हाल में कहा, "उत्तराखंड में ऐसी कई जल विद्युत परियोजनाएं शुरू की गई हैं, जिन्हें पर्यावरण के लिहाज से अनुमति नहीं दी जानी चाहिए थी."

आंदोलन

रमेश ने कहा कि किसी भी परियोजना में कभी नदी की अविरल धारा को नहीं भूलना चाहिए. उन्होंने कहा, "सिर्फ उत्तराखंड में ही 70 जल विद्युत परियोजनाएं हैं, जिनके बारे में हमें यह नहीं मालूम कि इनका पर्यावरण पर क्या असर होगा."

लवासा

लवासा परियोजना पर भी जयराम रमेश ने कड़ा रुख़ अपनाया था

जयराम रमेश ने कहा, "हम नदियों में पानी देखना चाहते हैं, सुरंगें नहीं. एक समय आएगा जब उत्तराखंड में नदियाँ नहीं सिर्फ़ टनल ही दिखाई देंगी."

सभा में चंडी प्रसाद भट्ट ने चिपको आंदोलन के बारे में वहाँ मौजूद लोगों को बताया कि इस आंदोलन के केंद्र में आदमी था.

उनकी किताब पर्वत पर्वत, बस्ती बस्ती दरअसल उनके यात्रा वृत्तांतों का संकलन है, जिसके ज़रिए उन्होंने कश्मीर से केरल और अरुणाचल से गोदावरी और पश्चिमी घाट तक जल, जंगल ओर ज़मीन की अपनी समझ का दस्तावेज़ प्रस्तुत किया है.

सम्मेलन में इतिहासकार ओर पर्यावरणविद शेखर पाठक ने अपने छात्र जीवन को याद किया, जब उत्तराखंड में चिपको आंदोलन से उनका जुड़ाव बना.

इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने चंडी प्रसाद भट्ट को हिमालय के पर्यावरण का ऐसा जानकार बताया, जो पर्यावरण के अर्थशास्त्रियों को हमेशा ग़लत साबित करते रहे हैं.

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