क्यों सुरक्षित नहीं भारत का रेल नेटवर्क?

रेल दुर्घटना

पिछले दो हफ़्तों में तीन बड़ी रेल दुर्घटनाओं ने भारतीय रेल सुरक्षा मानकों पर कई प्रश्नचिन्ह लगा दिए हैं.

भारत का रेल नेटवर्क दुनिया के सबसे बड़े नेटवर्क में से एक हैं. भारतीय ट्रेनों में हर दिन सवा करोड़ से ज़्यादा लोग सफ़र करते हैं.

लेकिन देश में आए दिन हो रही रेल दुर्घटनाओं से सवाल ये उठता है कि रेल यात्रियों की जान की क्या कोई क़ीमत नही?

बीबीसी ने इसी संदर्भ में बात की रेलवे बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष आईएमएस राणा से. उनसे बातचीत के कुछ अंश.

पिछले दो हफ़्तों में देश में तीन बड़ी दुर्घटनाएं हो चुकी हैं. इन दुर्घटनाओं के बाद भारत के रेल सुरक्षा मानकों को लेकर क्या संदेश जाता है?

एक रेल दुर्घटना के पीछे कभी-कभी एक से ज़्यादा कारण होते हैं. चूंकि हमारा रेलवे नेटवर्क बहुत बड़ा है, तो रोज़ किसी न किसी सुरक्षा प्रणाली में गड़बड़ी हो जाने के कारण ऐसी दुर्घटनाएं हो जाती हैं.

हालांकि भारतीय रेल नेटवर्क में पिछले कुछ सालों में सुरक्षा मानकों में सुधार आया है, लेकिन 100 प्रतिशत सुरक्षा को कभी हासिल नहीं किया जा सका है. लेकिन फिर भी मैं कहूंगा कि पिछले कुछ सालों में रेल दुर्घटनाओं में कमी आई है.

लेकिन एक अनुमान के मुताबिक़ भारत में हर साल औसतन 300 छोटी-बड़ी रेल दुर्घटनाएं होती हैं. भारत का रेल नेटवर्क दुनिया के सबसे बड़े रेल नेटवर्कों में से एक है, तो ऐसे में यात्री की सुरक्षा सुनिश्चित किया जाना इतना मुश्किल क्यों है? जब भी कोई रेल दुर्घटना होती है, तो मुआवज़े की घोषणा कर दी जाती है और फिर उसे भुला दिया जाता है. ऐसा क्यों?

ऐसी बात नहीं है. लोगों की जान बहुत क़ीमती है. अगर देखा जाए तो भारत में सड़क दुर्घटनाओं में हर दिन 100 से ज़्यादा लोग मारे जाते हैं.

हालांकि रेलवे मंत्रालय का लक्ष्य है कि एक भी रेल दुर्घटना न हो, लेकिन इस लक्ष्य को पूरा करना नामुमकिन है. लेकिन मैं इस बात पर भी ज़ोर देना चाहूंगा कि पिछले कुछ सालों में रेल दुर्घटनाओं में कमी आई है.

ये बात तो सारा देश जानता है कि ममता बनर्जी का ध्यान रेलवे मंत्रालय पर कम और पश्चिम बंगाल पर ज़्यादा रहा है. ऐसी बातें ही प्रणाली में आड़े आती हैं. विभाग में ज़्यादातर पद खाली पड़े हैं और उसके लिए मंत्रालय ही ज़िम्मेदार है. मेरे हिसाब से ये बिलकुल ठीक नहीं है.

आई एम एस राणा, रेलवे बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष

आपने कहा कि रेलवे मंत्रालय का लक्ष्य है कि कोई रेल दुर्घटना न हो, लेकिन ऐसा सुनिश्चित करने के लिए रेल बजट का कितना हिस्सा सुरक्षा मानकों को सुधारने के लिए दिया जाता है?

दरअसल रेलवे बजट को इस तरह विभाजित नहीं किया जाता. जितना भी बजट रेलवे को दिया जाता है, उसका ज़्यादातर भाग परोक्ष रूप से सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ही किया जाता है.

रेलवे सुरक्षा के कई पहलू होते हैं लेकिन प्रबंधन के स्तर से ये सभी पहलू जुड़ जाते हैं. होता ये है कि रेलवे विभाग ट्रेन सेवाएं तो बढ़ा देते हैं, लेकिन उसके कारण सुरक्षा का मुद्दा भी प्रभावित होता है.

राजनीतिज्ञों और प्रबंधकों को ये सुनिश्चित करना चाहिए कि रेलवे सिस्टम को एक तय सीमा के पार न खींचा जाए. रेलवे सेवाएं और सुरक्षा प्रदान करने के बीच एक संतुलन बनाए जाने की ज़रूरत है.

अगर भारतीय रेलवे सुरक्षा मानकों को वैश्विक स्तर पर देखा जाए, तो ब्रिक जैसे समूह का हिस्सा होने के नाते भारत इतना पीछे क्यों है? चीन को ही ले लीजिए. जब भी किसी पड़ोसी देश से तुलना की बात आती है, तो भारत हर स्तर पर चीन से बराबरी करना चाहता है. चीन का रेलवे सिस्टम पूरे विश्व में प्रसिद्ध है. भारत इतना पीछे क्यों?

रेल दुर्घटना

एक अनुमान के मुताबिक़ भारत में हर साल 300 छोटी-बड़ी रेल दुर्घटनाएं होती हैं.

भारत में रेलवे विभाग के पास बहुत ही सीमित संसाधन हैं. हालांकि सुधार की बहुत गुंजाइश है, लेकिन हमारा राजनीतिक और आधिकारिक तंत्र प्रणाली में सुधार लाने की कोशिश में लगे हैं.

रेलवे विभाग को देश के दूसरे विभागों से अलग रख कर नहीं देखा जा सकता क्योंकि सभी विभाग अर्थव्यवस्था के हिसाब के चलते हैं. रेलवे विभाग को जिस तरह का बजट दिया जाता है, वो उसके हिसाब से ही आगे बढ़ती है.

रेलवे मंत्रालय के बारे में धारणा ये बन गई है कि हर सरकार इस विभाग का प्रभार अपनी सहयोगी पार्टी को एक तोहफ़े के रूप में सौंप देती है. तो ऐसे में क्या ये कहा जा सकता है कि रेलवे मंत्रालय को गंभीरता से नहीं लिया जाता?

होता ये है कि रेलवे विभाग ट्रेन सेवाएं तो बढ़ा देते हैं, लेकिन उसके कारण सुरक्षा का मुद्दा भी प्रभावित होता है. राजनीतिज्ञों और प्रबंधकों को ये सुनिश्चित करना चाहिए कि रेलवे सिस्टम को एक तय सीमा के पार न खींचा जाए. रेलवे सेवाएं और सुरक्षा प्रदान करने के बीच एक संतुलन बनाए जाने की ज़रूरत है.

आई एम एस राणा, रेलवे बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष

मैं आपकी बात से सहमत नहीं हूं. हालांकि इस मंत्रालय को हर बार इसी रूप में देखा जाता है कि इसे वोट हासिल करने का एक ज़रिया बना दिया जाता है.

लेकिन किसी न किसी को तो ये प्रभार मिलता ही है, तो फिर सहयोगी पार्टी को क्यों नहीं? गठबंधन सरकार में ये सब मुद्दे आड़े आ जाते हैं, लेकिन आख़िरकार ये तो मंत्री की मर्ज़ी है कि वो अच्छा काम करे या नहीं.

हालांकि रेलवे प्रबंधन बेहतरीन काम करता है, लेकिन अगर मंत्री चाहे तो बहुत सुधार किया जा सकता है. तो मैं ये कहूंगा कि जहां थोड़ी बहुत चीज़ें ग़लत होती हैं, वहीं कुछ अच्छी चीज़ें भी देखने को मिलती हैं.

पूर्व रेल मंत्री ममता बनर्जी की बात की जाए, तो कहा जाता है कि जब उन्होंने रेल मंत्रालय का प्रभार संभाला, तबसे ही उनका ध्यान मंत्रालय पर कम और पश्चिम बंगाल के चुनावों पर ज़्यादा रहा है.

ख़ैर ये बात तो सारा देश जानता है कि ममता बनर्जी का ध्यान रेलवे मंत्रालय पर कम और पश्चिम बंगाल पर ज़्यादा रहा है.

ऐसी बातें ही प्रणाली में आड़े आती हैं. विभाग में ज़्यादातर पद ख़ाली पड़े हैं और उसके लिए मंत्रालय ही ज़िम्मेदार है. मेरे हिसाब से ये बिलकुल ठीक नहीं है.

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