'नोएडा में 156 हेक्टेयर भू-अधिग्रहण अवैध'

भट्टा परसौल

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार का ग्रेटर नोएडा में ज़मीन अधिग्रहण का फ़ैसला रद्द कर दिया है.

साथ ही सरकार की स्वीकृति के बिना ही बिल्डरों के साथ डील करने के लिए ग्रेटर नोएडा ऑथॉरिटी पर 10 लाख रुपए का जु्र्माना भी लगाया गया है.

सुप्रीम कोर्ट ने मायावती सरकार को फटकार लगाते हुए कहा कि भूमि आवंटन में क़ानून की अनदेखी हुई.

उत्तर प्रदेश के किसानों ने इस फ़ैसले का स्वागत किया है.

किसानों के हित के लिए क़ानूनी लड़ाई लड़ रही ‘भूमि अधिग्रहण प्रतिरोध आंदोलन’ नाम की सस्था के अध्यक्ष रूपेन कुमार ने कहा, “ये एक एतिहासिक निर्णय है क्योंकि आज से पहले कोर्ट में भूमि अधिग्रहण के जुड़े जो भी फ़ैसले आए हैं, वे किसानों के ख़िलाफ़ ही रहे हैं. इस फ़ैसले के बाद किसानों में एक खुशी की लहर दौड़ गई है. अब नोएड़ा एक्सेटेंशन में हर वो किसान जिसकी ज़मीन जबरन ली गई है, वो अदालत जाने की तैयारी कर रहे हैं.”

सोमवार को इस मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा था कि सरका ज़मीन छीनने में लगी है जिससे किसानों की कई पीढियों का जीवन प्रभावित हो रहा है.

ये एक एतिहासिक निर्णय है क्योंकि आज से पहले कोर्ट में भूमि अधिग्रहण के जुड़े जो भी फ़ैसले आए हैं, वे किसानों के ख़िलाफ़ ही रहे हैं. इस फ़ैसले के बाद किसानों में एक खुशी की लहर दौड़ गई है. अब नोएड़ा एक्सेटेंशन में हर वो किसान जिसकी ज़मीन जबरन ली गई है, वो अदालत जाने की तैयारी कर रहे हैं.

रूपेन कुमार, भूमि अधिग्रहण प्रतिरोध आंदोलन

न्यायमूर्ति जीएस सिंघवी और न्यायमूर्ति एके गांगुली की खंडपीठ ने कहा कि जनहित और औद्योगिक विकास के नाम पर किसानों की ज़मीन ली जा रही है, लेकिन ये ज़मीनें बिल्डरों को दी जा रही जिनका आम आदमी की ज़रुरतों से कोई लेना देना नहीं है.

इससे पहले गत मई में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने ग्रेटर नोएडा के पास एक गांव में 156 हेक्टेयर के भूमि अधिग्रहण को अवैध ठहराया था.

सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के इस फ़ैसले पर अपनी मुहर लगाते हुए कहा है कि शाहबेरी गांव में अधिग्रहित की गई 156 हेक्टेयर भूमि को अब किसानों को वापस लौटाया जाएगा.

सवाल खड़े हुए

जैसा कि इलाहबाद हाई कोर्ट ने कहा था कि जिन किसानों की ज़मीनें अधिगृहित की गई हैं, उसे वापस किया जाए. अब यूपी सरकार को किसानों की ज़मीन उन्हें लौटानी होगी. लेकिन दूसरा रास्ता ये भी हो सकता है कि ऑथॉरिटी या बिल्डर उन किसानों के साथ एक समझौता कर सकती है, जिनकी ज़मीनें ली गईं हैं.

सुप्रीम कोर्ट के एक वकील

आम्रपाली, यूनिटेक और अजनारा जैसे कई बड़े बिल्डर इस क्षेत्र में अपनी रिहायशी इमारतों को खड़ी करने की योजनाओं की घोषणा कर चुके हैं.

साथ ही कई लोगों ने इन इमारतों में बनाए जाने वाले घरों में निवेश भी कर चुके हैं.

सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले ने बिल्डरों और निवेशकों के भविष्य को अस्थिरता की स्थिति में डाल दिया है.

सुप्रीम कोर्ट के एक वकील ने सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले की घोषणा करते हुए कहा, “जैसा कि इलाहबाद हाई कोर्ट ने कहा था कि जिन किसानों की ज़मीनें अधिगृहित की गई हैं, उसे वापस किया जाए. अब यूपी सरकार को किसानों की ज़मीन उन्हें लौटानी होगी. लेकिन दूसरा रास्ता ये भी हो सकता है कि ऑथॉरिटी या बिल्डर उन किसानों के साथ एक समझौता कर सकती है, जिनकी ज़मीनें ली गईं हैं.”

इलाहाबाद हाई कोर्ट की पीठ ने 21 प्रभावित लोगों की याजिका पर सुनवाई के बाद कहा था कि भूमि अधिग्रहण क़ानून के भाग पाँच के तहत शाहबेरी गांव के किसानों को अपनी आपत्ति दर्ज करने का मौक़ा दिया जाना चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

कोर्ट का कहना था कि सरकार ने अधिग्रहण के फै़सले के बाद प्रभावित लोगों की बातें नहीं सुनी हैं और इसी आधार पर अधिग्रहण पर रोक लगाई गई है.

कोर्ट के इस फ़ैसले को मायावती सरकार के लिए एक बड़े झटके के रुप में देखा जा रहा है.

सरकार का कहना था कि अधिग्रहण जल्दी करना ज़रुरी था लेकिन कोर्ट ने इस दलील को ख़ारिज़ कर दिया और कहा कि ज़मीन के मालिकों को अपनी बात रखने का मौका दिया जाना चाहिए था.

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