किसी का घरौंदा संकट में, किसी की ज़मीन जा रही है

रोटी कपड़ा और मकान....तीन बुनियादी ज़रूरतें. बड़े शहरों के मध्यम वर्गीय परिवारों में अब शायद रोटी-कपड़े को जुगाड़ करना मुद्दा नहीं रह गया. किराए का मकान भी मिल ही जाता है. लेकिन मकान अपना हो...ये आज भी कई मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए सपना ही है. अपने आशियाने के इन्हीं सपनों के बेचते हैं बड़े-बड़े बिल्डर.

अपने बसेरे के इसी ख्वाब को पूरा करने के लिए नोएडा की एक कंपनी में काम करने वाले विकास चौहान ने नोएडा के ही पास एक फ़्लैट बुक कराया. लेकिन इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक आदेश ने विकास और उनके जैसे कई लोगों को भारी चिंता में डाल दिया है.

मैने एक साल पहले एक जगह फ्लैट बुक कराया था. अब तक निर्माण नहीं शुरु हुआ है. कुछ दिन पहले मुझे एसएमएस आया कंपनी की ओर से कि हाई कोर्ट के आदेश के बाद प्रोजेक्ट दूसरी जगह शिफ़्ट कर दिया गया है. यानी अब मुझे कई किलोमीटर दूर घर मिलेगा. मुझे बेवजह ज़्यादा वहाँ से आने-जाने पर ज़्यादा पैसा खर्च करना होगा. अगर इसी दूरी वाले इलाक़े में मुझे फ़्लैट लेना होता तो मैं किसी और बिल्डर से ले लेता जो कम राशि में दे रहे थे. लगता है पैसा फँस गया है.

विकास, फ्लैट बुक कराने वाले

दरअसल कोर्ट ने नोएडा में अधिगृहीत 156 हेक्टेयर ज़मीन की अधिसूचना को रद्द कर दिया है जबकि कई जाने-माने बिल्डर इस क्षेत्र में अपनी रिहायशी इमारतों को खड़ी करने की योजनाओं की घोषणा कर चुके हैं.

लोगों ने तो महीने की किश्त भरनी भी शुरु कर दी है. लेकिन ज़मीन अधिग्रहण रद्द होने के बाद अपना आशियाना ख़रीदने का लोगों का सपना उन्हें भंवर में फँसता नज़र आ रहा है. विकास हमारे साथ उस जगह पर गए जहाँ उनका मकान बनना था.

वे बताते हैं, "मैने एक साल पहले आम्रपाली ग्रुप के साथ एक जगह फ्लैट बुक कराया था और तीन साल में इसे तैयार हो जाना था. लेकिन अब तक ज़मीन पर निर्माण नहीं शुरु हुआ है, यहाँ खेती हो रही है. कुछ दिन पहले मुझे एक एसएमएस आया कंपनी की ओर से कि हाई कोर्ट के आदेश के बाद प्रोजेक्ट दूसरी जगह शिफ़्ट कर दिया गया है. यानी अब मुझे कई किलोमीटर दूर घर मिलेगा."

विकास का कहना है, "ये इलाक़ा मेरे दफ़तर से दूर पड़ेगा. मुझे बेवजह ज़्यादा वहाँ से आने-जाने पर ज़्यादा पैसा खर्च करना होगा. अगर इसी दूरी वाले इलाक़े में मुझे फ़्लैट लेना होता तो मैं किसी और बिल्डर से ले लेता जो कम राशि में दे रहे थे. मुझे तो लगता है कि हमारा पैसा फँस गया है. मुझे नहीं लगता कि तीन साल से पहले यहाँ कुछ होगा."

कौन कसेगा लगाम?

जो बिल्डर कोर्ट के आदेश से प्रभावित हुए हैं, वे आधिकारिक रूप से बात नहीं कर रहे. लेकिन अपनी-अपनी आधिकारिक बेवसाइटों पर नोटिस डाल स्पष्टीकरण ज़रूर दिया है.

सुप्रीम कोर्ट में वकील अनिल कर्णवाल कहते हैं कि प्रभावित लोगों के पास सबसे बेहतर तरीका उपभोक्ता अदालत में जाने का है. वे बताते हैं, “अगर बिल्डरों के प्लान को मंज़ूरी नहीं मिली हुई थी तो ग्राहक बिल्डरों के ख़िलाफ़ धोखाधड़ी का मामला भी दर्ज करा सकता है. अगर बिल्डर ग्राहक को अब किसी अन्य जगह फ़्लैक बुक करने की पेशकश कर रहा है तो उसे मानने या न मानने का हक़ उपभोक्ता का है. अगर कोई मना कर देता है तो बिल्डर इस बात के लिए बाध्य है कि वे लोगों का पैसा लौटाया, वो भी ब्याज के साथ.”

कोई ऐसी नियामक संस्था होनी चाहिए जो इस बात की जाँच करें कि जब भी कोई बिल्डर विज्ञापन जारी करे, तो वो नियामक इस बात की पड़ताल करे कि क्या बिल्डर के पास वाकई ज़मीन है या नहीं, कहीं वो लोगों को कोई धोखा तो नहीं दे रहे.

अनिल कर्णवाल, वकील

अनिल कर्णवाल बताते हैं कि उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका डाल रखी है कि कोई ऐसी नियामक संस्था होनी चाहिए जो इस बात की जाँच करें कि जब भी कोई बिल्डर विज्ञापन जारी करे, तो वो नियामक इस बात की पड़ताल करे कि क्या बिल्डर के पास वाकई ज़मीन है या नहीं, कहीं वो लोगों को कोई धोखा तो नहीं दे रहे.

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने फ़ैसले में स्पष्ट किया है कि ग्रेटर नोएडा औद्योगिक विकास प्राधिकरण की मंशा शाहबेरी गाँव के किसानों की ज़मीन लेकर बिल्डरों के ज़रिए केवल बहुमंज़िला रिहायशी कॉंपलेक्स बनाने की थी. न कि उस ज़मीन पर योजनाबद्ध तरीके से समग्र विकास करने की.

ज़मीन देकर क्या मैं दूसरे के यहाँ मज़दूरी करूँ....

किसान की कहानी

मेरे पास 34 बीघा ज़मीन है. हमें प्रति बिघा सात लाख 11 हज़ार रुपए दिए जा रहे थे जबकि बिल्डरों को कई गुना ज़्यादा पैसे दिए गए. वैसे भी अगर ज़मीन चली जाएगी तो मैं तो अपने ही गाँव में उजड़ जाउँगा. यहाँ क्या करुँगा. अभी मैं ख़ुद की खेती करता हूँ, फिर क्या दूसरे के यहाँ मज़दूरी करूँगा? कुछ लोग कहते हैं कि यहाँ इमारते बनेंगी तो हमें ड्राइवरी वगैरह का काम मिल जाएगा. फावड़ी चलाने वाला किसान ड्राइवरी कैसे करेगा.

कोर्ट में ये याचिका शाहबेरी गाँव के लोगों ने दायर की थी. उसमें गाँव में रहने वाले 23 बरस के मोहम्मद मोमिन अपने परिवार के साथ खेती-बाड़ी करते हैं. अभी उनकी ज़मीन पर भिंडी लगी है.

मोमिन बताते हैं, “मेरे पास 34 बीघा ज़मीन है. हमें प्रति बिघा सात लाख 11 हज़ार रुपए दिए जा रहे थे जबकि बिल्डरों को कई गुना ज़्यादा पैसे दिए गए. हम ये सहन नहीं करेंगे. वैसे भी अगर ज़मीन चली जाएगी तो मैं तो अपने ही गाँव में उजड़ जाउँगा. यहाँ क्या करुँगा. अभी मैं ख़ुद की खेती करता हूँ, फिर क्या दूसरे के यहाँ मज़दूरी करूँगा? अगर बिल्डर हमें अच्छे पैसा देता है तो हम सोचेंगे. कुछ लोग कहते हैं कि यहाँ इमारते बनेंगी तो हमें भी ड्राइवरी वगैरह का काम धंधा मिल जाएगा. आप बताइए, फावड़ी चलाने वाला किसान ड्राइवरी कैसे करेगा. मैं अपनी ज़मीन नहीं दूँगा. ज़रूरत पड़ी तो फिर कोर्ट जाऊँगा.”

फ़्लैट की बुकिंग कराने वाले जो ग्राहक सीधे कोर्ट के आदेश से प्रभावित नहीं है, उनमें भी चिंता और घबराहट है. शायद इसीलिए कई बिल्डर ग्राहकों को ईमेल भेजकर उन्हें निश्चिंत करने की कोशिश कर रहे हैं कि उनकी ज़मीन विवादित नहीं है.

नोएडा के पास ज़मीन के किनारे-किनारे बिल्डर अपने बड़े-बड़े टेंट लगाकर बैठे हैं ताकि ग्राहकों को लुभा सकें. ऐसे ही एक कंपनी के कर्मचारी हमें बताते हैं कि कोर्ट के आदेश के बाद से लोगों में थोड़ा डर है. उन्होंने बताया, "पहले मेरे पास अगर पाँच लोग आते थे तो अब तीन आते हैं. मीडिया ने भी लोगों को डरा दिया है. लेकिन मुझे यकीन है कि किसी का नुकसान नहीं होगा. सब कुछ सुलझ जाएगा."

लेकिन लोग तो चिंतित हैं है...उनकी चिंता स्वभाविक है, आख़िर बात उनकी ज़िंदगी की गाढ़ी कमाई की है, अपने घर के उस सपने की है जो हर इंसान देखता है.

शाहबेरी गाँव जाकर हमें एक विरोधाभास का भी एहसास हुआ. बिल्डर के पास घर की बुकिंग करने वाले विकास और अपनी ज़मीन के लिए लड़ने वाले किसान मोहम्मद मोमिन दोनों ही एक तरह से अपने-अपने हक़ के लिए लड़ रहे हैं---एक अपने भविष्य के घरौंदे के लिए और दूसरा अपने वर्तमान घरौंदे के लिए जहाँ उसके पुरखों की ज़मीन है.

एक बिल्डर की ओर से स्पष्टीकरण की उनकी ज़मीन विवादित नहीं है

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