पेड़ों को बचाने लामबंद हुए लोग....

सिटीज़न रिपोर्टर यामिनी अपने दूसरे साथियों के साथ (पंक्ति में बांय से चौथी)

बढ़ता शहरीकरण, चौड़ी होती सड़कें, बड़ी-बड़ी निर्माण परियोजनाएं और विकास की ओर दौड़ लगाते गांव, कस्बे और शहर. भारत की ये तस्वीर अब आम है लेकिन सवाल ये है कि इस दौड़ का हिस्सा बनने की कीमत कहीं प्रकृति का नाश तो नहीं.

देहरादून के आम नागरिकों ने एकजुट होकर इसी सवाल का जवाब ढूंढा. पेश है सिटीज़न रिपोर्टर यामिनी नेगी की रिपोर्ट.

मेरा नाम यामिनी नेगी है और मैं एक स्टूडेंट हूं.

हाल ही में हमें पता चला कि देहरादून के परेड-ग्राउंड में 250 से ज़्यादा पेड़ों को काया जा रहा है. हम लोग जब तक वहां पहुंचे 11 पेड़ कट चुके थे. हमने तुरंत कॉंट्रेक्टर को रोका और उससे समझाया-बुझाया. काफ़ी कोशिशों के बाद हम उसे रोक पाए. बाद में वन अधिकारी के दख़ल से पेड़ों की कटाई पर रोक लग गई.

रुचि, ‘सिटीज़न्स फॉर ग्रीन दून’ की सदस्य

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून की लहलहाती हरियाली को देखकर कभी आसपास के इलाकों के लोग रश्क किया करते थे. लेकिन पिछले कुछ सालों से सड़कें चौड़ी करने और विकास के नाम पर हो रहे निर्माण के लिए देहरादून में पेड़ों की बेतहाशा कटाई हो रही है.

अपने आसपास हर तरफ कट रहे इन पेड़ों को बचाने के लिए साल 2009 में देहरादून के लोगों ने मिलकर ‘सिटीज़न्स फॉर ग्रीन दून’ नामक संगठन की शुरुआत की.

कटाई पर रोक लगाई

संगठन से जुड़े लोग हर उस जगह पहुंचने की कोशिश करते हैं जहां विकास के नाम पर पेड़ों को काटा जा रहा हो.

हमने एक ट्री हेल्पलाइन की शुरुआत भी की है. पोस्टरों के ज़रिए शहरभर में जगह-जगह हमने एक नंबर चिपकाया है. हमारी अपील है कि जहां भी कोई पेड़ कटता देखे हमें सूचित करे और हमारे संगठन से जुड़े ज़्यादा से ज़्यादा लोग वहां पहुंचने की कोशिश करेंगे.

नितिन पांडेय

‘सिटीज़न्स फॉर ग्रीन दून’ की सदस्य रुचि कहती हैं, ''हाल ही में हमें पता चला कि देहरादून के परेड-ग्राउंड में 250 से ज़्यादा पेड़ों को काटा जा रहा है. हम लोग जब तक वहां पहुंचे 11 पेड़ कट चुके थे. हमने तुरंत कॉंट्रेक्टर को रोका और उससे समझाया-बुझाया. काफ़ी कोशिशों के बाद हम उसे रोक पाए. बाद में वन अधिकारी के दख़ल से पेड़ों की कटाई पर रोक लग गई.''

‘सिटीज़न्स फॉर ग्रीन दून’ से जुड़े लोगों की संख्या आज ढाई हज़ार से ज़्यादा है और अपनी कोशिशों के ज़रिए हम अब तक 20,000 से ज़्यादा पेड़ों को कटने से बचा चुके हैं.

एक नई तकनीक के तहत अब हमने कटे हुए पेड़ों को दोबारा उगाने और जीवित रखने की पहल की है.

कटे हुए पेड़ों को जीवित किया

हमने कई इलाकों में देखा कि सालों पुराने पेड़ काट दिए गए और नए पेड़ लगाने पर वो सूख जाते हैं. इस नई तकनीक से लगाए गए कटे पेड़ न सिर्फ जीवित हैं बल्कि तेज़ी से बढ़ रहे हैं.

सरकार अगर इस तकनीक को अपनाए तो पुराने पेड़ लहलहा उठेंगे और नए पेड़ों को लगाने पर खर्च बचेगा.

निर्माण कार्यों के लिए देहरादून में पेड़ों की बेतहाशा कटाई हो रही है.

संगठन से जुड़े नितिन पांडेय कहते हैं, ''हमने एक ट्री हेल्पलाइन की शुरुआत भी की है. पोस्टरों के ज़रिए शहरभर में जगह-जगह हमने एक नंबर चिपकाया है. हमारी अपील है कि जहां भी कोई पेड़ कटता देखे हमें सूचित करे और हमारे संगठन से जुड़े ज़्यादा से ज़्यादा लोग वहां पहुंचने की कोशिश करेंगे.''

अनोखा ‘ट्री फेस्टिवल’

अपनी इस मुहिम के तहत अब हम देहरादून और उसके आसपास के इलाकों में हो रहे उत्सवों और मेलों में भाग लेते हैं और स्टॉल भी लगाते हैं. हम लोगों को बताते हैं कि अपने अपने इलकों में वो किस तरह पेड़ों को कटने से बचा सकते हैं.

यही नहीं होली, दिवाली और क्रिसमस की तरह अब देहरादून में हर साल हम ‘ट्री फेस्टिवल’ भी मनाते हैं.

हमारा मकसद है कि ज़्यादा से ज़्यादा लोग ये समझें कि पेड़ उनकी ज़िंदगी का हिस्सा हैं और अपने परिवार के इन सदस्यों को बचाने के लिए उन्हें खुद अपने घरों से बाहर निकलना ही होगा.

हमारी ये पेशकश आपको कैसी लगी हमें ज़रूर बताएं. साथ ही अगर आप समाज में बदलाव के लिए संघर्ष कर रहे हैं तो हमसे जुड़िए और बनिए बीबीसी के सिटीज़न रिपोर्टर. आप संपर्क कर सकते हैं parul.agrawal@bbc.co.uk पर.

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