भाग एक

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भारत में माओवादी आंदोलन एक बड़ी समस्या बन चुका है. भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इसे देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा ख़तरा बता चुके हैं. कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (माओवादी) के परचम तले वामपंथी अतिवादियों ने मध्य और पूर्वी भारत में एक मज़बूत नेटवर्क स्थापित कर लिया है. छत्तीसगढ़ को माओवादियों का गढ़ माना जाता है.
दक्षिण छत्तीसगढ़ के दंडकारण्य को माओवादियों ने अपना ठिकाना बनाया हुआ है.
मैंने इन्हीं लोगों के साथ माओवादियों के साथ 34 दिन बिताए.
‘जहां लाल सलाम नारा है’ नाम की ये श्रृंखला उन 34 दिनों के अनुभव पर आधारित है.
इस पहले भाग में मैंने दंडकारण्य के घने जंगलों में माओवादियों के रहन-सहन के बारे में जानना चाहा.
ये श्रृंखला आप तक सात भागों में पहुंचाई जा रही है.
भाग दो

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माओवादियों का दल 'कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (माओवादी)' दक्षिण छत्तीसगढ़ के दंडकारण्य में अपना राजनीतिक और सैनिक ठिकाना बनाने में कामयाब रहा है. माओवादी नेतृत्व का दावा है कि दंडकारण्य में लोगों के समर्थन की वजह से ही उनका प्रभाव बढ़ रहा है.
अगर माओवादियों ने ज़मीनी स्तर पर अपनी जड़े जमाईं हैं तो इसकी क्या वजह है?
वो कौन सी नीतियां और विचार हैं जिनकी वजह से माओवादी बस्तर के जंगलों लोकप्रिय हो गए हैं?
मैंने 34 दिन माओवादियों के बिताए. ये विशेष रिपोर्ट की 'जहां लाल सलाम नारा है' की ये दूसरी कड़ी है.
भाग तीन

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'जहां लाल सलाम नारा है' के तीसरे भाग में मैंने ये जानने की कोशिश की कि कैसे दंडकारण्य माओवादियों का गढ़ बना. क्या इसकी वजह उनका संगठन है? या उनकी पार्टी का कार्यक्रम.
इसके अलावा ये जानना भी अहम है कि माओवादी अपने इस विस्तृत संगठन के लिए धन कहां से जुटाते हैं?
भाग चार

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माओवादियों की ताक़त का प्रमुख स्रोत, विशेषकर छत्तीसगढ़ में, उनका सैनिक दल है. इसे 'पीपल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी' या पीएलजीए कहा जाता है.
लेकिन ये कोई बड़ी सेना नहीं है. इस सेना की सही संख्या बताना तो मुश्किल है लेकिन शायद ये कुछ हज़ार से ज़्यादा नहीं है.
इसकी तुलना में मध्य भारत में मौजूद भारतीय सुरक्षाबलों की संख्या कहीं अधिक है.
सवाल ये उठता है कि गोंड लड़के और लड़कियों की ये छोटी सेना भारतीय सुरक्षाबलों पर कैसे हमले कर पाती है?
अपनी इस विशेष पेशकश के चौथे अंक में हम माओवादियों की ताक़त का अंदाज़ा लगाने की कोशिश करेंगे.
भाग पांच

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मध्य भारत में माओवादियों से लड़ने के लिए छत्तीसगढ़ के कांकेर ज़िले में एक 'जंगल वॉरफ़ेयर कॉलेज' चलाया जा रहा है.
छोटी-छोटी पहाड़ियों और घने जंगलों से घिरे इस बड़े-से प्रशिक्षण केंद्र में भारतीय पुलिस और अर्धसैनिक बल माओवादियों से लड़ने के लिए 45 दिन का कोर्स करते हैं.
इस प्रशिक्षण केंद्र के ईर्द-गिर्द और सारे दक्षिण छत्तीसगढ़ में माओवादी अपनी 'पीपल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी' को ट्रेनिंग देते हैं.
विशेष रिपोर्ट के इस भाग में छत्तीसगढ़ में बिताए 34 दिनों के दौरान मैंने भारतीय सुरक्षाबलों और माओवादियों के प्रशिक्षण केंद्रों का जायज़ा लिया.
भाग छह

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भारतीय गृह मंत्रालय के एक बयान के अनुसार पिछले पांच सालों में मध्य भारत में माओवादी विद्रोह के कारण 10 हज़ार लोग मारे गए हैं.
इनमें से अधिकतर मौतें छत्तीसगढ़ में हुई हैं.
माओवादियों और भारतीय सुरक्षाबलों ने एक दूसरे के कई लड़ाकों को मारा है.
मानवाधिकार संगठन इस सुनियोजित हिंसा की आलोचना करते रहे हैं.
'जहां लाल सलाम नारा है' कि इस कड़ी में बात करेंगे इस क्षेत्र में मानवाधिकारों के हनन की प्रकृति की.
भाग सात

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भारत में हथियारबंद वामपंथी आंदोलन के आरंभ से ही महिलाओं की हिस्सेदारी रही है.
छत्तीसगढ़ के दंडकारण्य में चल रहे वर्तमान संघर्ष में महिलाएं भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रही हैं. लगभग हर कैंप में 50 प्रतिशत या उससे अधिक महिलाएं हैं.
विशेष रिपोर्ट 'जहां लाल सलाम नारा है' के इस भाग में मैंने ये जानने की कोशिश की कि महिलाएं इतनी बड़ी संख्या में माओवादियों के साथ क्यों जुड़ रही हैं?
ये इस विशेष रिपोर्ट का सातवां और आख़िरी भाग है.















