आडवाणी, 20 अन्य को नोटिस

सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी और शिव सेना प्रमुख बाल ठाकरे समेत संघ परिवार के 21 नेताओं पर विवादित बाबरी मस्जिद तोड़ने के षडयंत्र में शामिल होने का मुक़दमा चलाने के लिए नोटिस जारी किया है.

जिन अन्य प्रमुख नेताओं को नोटिस जारी किया गया है इनमें अशोक सिंघल, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, विनय कटियार, कल्याण सिंह, गिरिराज किशोर, साध्वी ऋतंभरा, महंत अवैद्यनाथ और विष्णु हरि डालमिया शामिल हैं.

यह नोटिस सीबीआई की एक विशेष अनुमति याचिका पर जारी किया गया है.

सीबीआई ने इस याचिका के ज़रिए लखनऊ हाईकोर्ट के 20 मई 2010 के फ़ैसले को चुनौती दी है.

लखनऊ हाईकोर्ट के जस्टिस आलोक कुमार सिंह ने अयोध्या मामलों की लखनऊ विशेष अदालत की ओर से चार मई 2001 को आडवाणी समेत 21 नेताओं पर अभियोग रद्द करने और मुक़दमा न चलाए जाने के आदेश को वैध ठहराते हुए सीबीआई की पुनरीक्षण याचिका को ख़ारिज कर दिया था.

इससे पहले सितंबर 1997 में लखनऊ में अयोध्या मामलों की विशेष अदालत ने आडवाणी समेत सभी 49 अभियुक्तों पर विवादित मस्जिद तोड़ने के षडयंत्र में शामिल होने और सांप्रदायिक एकता और अखंडता के खिलाफ़ काम करने का मुक़दमा चलाने के लिए अभियोग तय किया था.

दो मुक़दमे

छह दिसंबर 1992 को अयोध्या में विवादित बाबरी मस्जिद तोड़ने के दिन पुलिस ने दो मुक़दमे कायम किए थे.

एक, लाखों अज्ञात कारसेवकों के ख़िलाफ़ बाबरी मस्जिद तोडने के लिए और दूसरा, आडवाणी और सात अन्य नेताओं द्वारा विवादित मस्जिद के सामने रामकथा कुंज के मंच से भड़काऊ भाषण देने के लिए.

पुलिस ने दूसरे मामले में आडवाणी और अन्य नेताओं को गिरफ्तार कर ललितपुर कि अस्थाई जेल में रखा.

बाबरी मस्जिद विवाद इतने क़ानूनी पेंचों में फंसा हुआ है कि फ़ैसला जल्द आने की उम्मीद नहीं दिखती.

फैजाबाद में सुरक्षा समस्या के चलते इस मामले के लिए हाईकोर्ट के परामर्श से रायबरेली में विशेष अदालत गठित की गई.

इस बीच दोनों मामलों की जांच सीबीआई को दे दी गई और सीबीआई ने दोनों की संयुक्त चार्जशीट लखनऊ विशेष अदालत में दायर की, जिसके आधार पर सितंबर 1997 में सभी 49 नेताओं के खिलाफ अभियोग तय किए गए.

लेकिन आडवाणी एवं कुछ अन्य अभियुक्तों ने इस आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील कर दी.

लगभग साढ़े तीन साल बाद हाईकोर्ट ने कहा कि लखनऊ में अयोध्या मामलों की जो विशेष अदालत बनाई गई, उसकी अधिसूचना में भड़काऊ भाषन देने का दूसरा केस शामिल नही था और सरकार चाहे तो यह तकनीकी कमी दूर कर दे.

लेकिन उत्तर प्रदेश की तत्कालीन बीजेपी सरकार ने यह कमी दूर करने की पहल नही की . इस कारण लखनऊ विशेष अदालत ने चार मई 2001 को आडवाणी समेत 21 लोगों को बरी कर दिया.

सीबीआई ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी लेकिन हाईकोर्ट ने पिछले साल सीबीआई की पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी.

अब सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया है.

सीबीआई का कहना है कि अगर भड़काऊ भाषण का मुक़दमा रायबरेली में अलग से चले तो भी आडवाणी और उनके 20 साथी विवादित मस्जिद तोड़ने के षडयंत्र में शामिल थे, इसलिए उन पर लखनऊ में भी मुक़दमा चलना चाहिए.

लेकिन यह मामला जिस तरह के क़ानूनी दांव पेंच में उलझा है, उससे नहीं लगता कि जल्दी कोई फ़ैसला हो पाएगा.

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