घरेलू हिंसा में पिसती हैं बालिकाएँ

बालिकाओं की जान को खतरा

घरेलु हिंसा का सीधा संबंघ बालिकाओं की जान से हैं.

भारत में बालिकाओं की मौत के पीछे घरेलू हिंसा की अहम भूमिका है.

एक शोध ने भारत में 18 लाख बालिकाओं की पिछले दो दशकों में मौत को पहली बार घरेलू हिंसा से जोड़ कर देखा गया है.

हारवर्ड स्कूल ऑफ पब्लिक हैल्थ के शोधकर्ताओं ने 1985 से 2005 के बीच एक लाख अठावन हज़ार जन्मों का आकलन किया.

अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ताओं की टीम को पता चला है कि उन बालिकाओं की जान को ख़तरा बढ जाता है जिनकी माँ घरेलू हिंसा की शिकार होती हैं.

ये ख़तरा बालकों को नहीं होता.

शोधकर्ता कहते है कि पति की हिंसा की शिकार पत्नियों की बालिकाओं को अपने जन्म के पहले साल और जीवन के पहले पाँच सालों में ज़्यादा ख़तरा होता है.

हिंसा

प्रमुख शोधकर्ता जे सिल्वरमैन हारवर्ड स्कूल ऑफ पब्लिक हैल्थ में समाज और मानव विकास विभाग में असोसिएट प्रोफेसर हैं.

उन्होंने बताया, "उस बालिका का अपनी बाल अवस्था में जीवित रहना ज़्यादा मुश्किल है जिसका जन्म भारत में एक ऐसे परिवार हुआ हो जहाँ उसकी माँ घरेलू हिंसा का शिकार हो. चौंकाने वाली बात ये है कि इसी माहौल में आपके जीवन को कोई ख़तरा नहीं हैं अगर आप एक लड़के हैं."

रिपोर्ट तैयार करने वाले शोधकर्ताओं का कहना है कि इसके पीछे एक कारण ये भी है कि बालिकाओं के पोषण, टीकाकरण और सेहत का ख़्याल ठीक से न रखने से बालिकाएं ज़्यादा बड़ी संख्या में मारी जाती हैं.

बालिकाओं में सांस की तकलीफ़ और दस्त लगने जैसे रोग भी अच्छी देखरेख के अभाव में घातक हो जाते हैं.

समाज के उस तबके में जिसमें महिलाओं कि स्थिति सबसे ख़राब है, जहाँ महिलाओं को उनके पति पीटते हैं, वहां बालिकाओं की देखरेख सबसे कम होती हैं.

घरेलू हिंसा पर नज़र

उस बालिका का अपनी बाल अवस्था में जीवित रहना ज़्यादा मुश्किल है जिसका जन्म भारत में एक ऐसे परिवार हुआ हो जहां उसकी मां घरेलू हिंसा का शिकार हो.

जे सिलवरमैन ,हारवर्ड स्कूल ऑफ पब्लिक हैल्थ में समाज और मानव विकास विभाग के असोसिएट प्रोफेसर हैं.

शोधकर्ताओं का कहना है कि बालिकाओं के स्वास्थ्य संबंधी किसी भी कार्यक्रम और नीति में घरेलू हिंसा पर ध्यान ज़रूर दिया जाना चाहिए.

भारत में इस समय 21 लाख बच्चें हर साल मर जाते हैं.

सहस्राब्दी विकास मानकों के तहत बाल मृत्यु दर को 1990 के स्तर से 2015 तक दो तिहाई कम करने का भारत ने लक्ष्य रखा था, जिससे वो बहुत दूर नज़र आता हैं.

जे सिल्वरमैन कहते हैं, "घरों में महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा को चुनौती दी जानी चाहिए. क्योंकि इसे थोड़ा भी कम किया जा सके तो हज़ारों बालिकाओं और लड़कियो की जान बचाई जा सकती है."

भारत में राष्ट्रीय स्वास्थ्य सर्वे के मुताबिक़ आधे से ज़्यादा लोग हिंसा को सही ठहराते हैं. ऐसे में ये बदलाव लाना इतना आसान काम नहीं होगा.

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