मेरी आवाज़ सुनो !

लोग और मोबाइल

लोग बड़ी संख्या में मोबाइल के ज़रिए अपनी ख़बर दे रहे हैं.

ग्रामीण इलाकों के आदिवासी और पिछड़े जो पढ़ना लिखना नहीं जानते, जिन तक बिजली और टीवी नहीं पहुंचता और जिनकी आवाज़ और जिनके सरोकारों को कोई नहीं सुन रहा, उनकी वो आवाज़ बन रही है एक मोबाइल सेवा.

ये कोशिश है हर नागरिक को पत्रकार बनाने की. हर व्यक्ति की आवाज़ बनने की, उसको आवाज़ देने की.

शुभ्रांशु चौधरी जो सीजी-नेट स्वरा के संस्थापक हैं कहते है कि आदिवासी इलाकों की स्थिति अलग है.

वो कहते हैं, “छत्तीसगढ में कोई आदिवासी पत्रकार नहीं है या कोई पत्रकार नहीं है कि जो आदिवासियों की भाषा को जानता हो. यहाँ बिजली नहीं है और अख़बार भी यहां नहीं पहुंचते. पर मोबाईल की पहुंच बहुत बढ़ रही है तो हमने सोचा कि क्यों न हम मोबाईल का इस्तेमाल लोगों की भाषा में ही लोगों की बात कहने के लिए करें.”

आज छत्तीसगढ़ ही नहीं आस पास के राज्यों से भी लोग इस सेवा से जुड़ रहे है.

इस सेवा का सरवर बैंगलुरु में है तो लोगो को लंबी दूरी का कॉल करना पड़ता है जोकि एक आदिवासी के लिए बहुत पैसा है. “पर लोग जुड़ रहे है क्योकि अखबार है नहीं, रेडियो मनमोहन और ओबामा की ख़बरे सुनाता है पर वो बाते नहीं करता जो ये लोग सुनना चाहते है

शुभ्रांशु चौधरी

महात्मा गांधी ग्रामीण रोज़गार गारंटी क़ानून में धांधली, शराब के बढ़ते ठेकों, स्कूलों से नदारद टीचरों की बात हो या फिर तेंदूपत्ता उद्योग में बच्चों से काम. हर वो मुद्दा जो इन लोगो को सीधे सीधे प्रभावित करता है उस पर वो अपनी भाषा में दिए गए मोबाईल नंबर पर रिकॉर्ड कराते है.

इन ख़बरों की पुष्टि की जाती है ये देखा जाता है कि कोई आपत्तिजनक बात न कहीं जाएँ. जब इस काम में लगे मॉडरेटर ये निश्चित कर लेते हैं तब इसे चलाया जाता है. हर दस में औसतन तीन रिपोर्टें ही प्रसारित होती हैं.

बढ़ता दायरा

लोगों में धीरे धीरे ये लोकप्रिय हो रहा है और कुछ मामलों में तो रिपोर्ट के बाद हुई प्रशासनिक कार्रवाई ने उत्साह बढ़ाया है.

लिंगाराम

अब छत्तीसगढ़ से भी लोग पत्रकारिता की पढ़ाई करने में लगे हैं.

छत्तीसगढ़ में शुरु हुई इस सेवा में अब गुजरात, राजस्थान, झारखण्ड आदि से भी रिपोर्टे आ रही हैं.

हिमांशु कुमार जो दंतेवाड़ा में आदिवासियों के बीच दो दशक से काम कर रहे है. वो कहते है कि स्वयं उन्होंने भी इसका इस्तेमाल किया है.

वे कहते है, “जो प्रताड़ित है उसे बाहर निकलकर किसी पत्रकार के पास जाना नहीं पड़ता, उसकी बात सुनी जाएगी या नहीं उसकी चिंता नहीं होती, फिर पुलिस प्रशासन आप को पकड़कर तंग भी नहीं कर सकती क्योंकि आप फोन से कहीं से भी बात कर सकते हैं.’’

शुभ्रांशु चौधरी बताते हैं कि इस सेवा का सरवर बंगलौर में है तो लोगों को लंबी दूरी का कॉल करना पड़ता है जो कि एक आदिवासी के लिए बहुत पैसा है.

वे कहते हैं, “पर लोग जुड़ रहे है क्योकि अखबार हैं नहीं, रेडियो मनमोहन और ओबामा की ख़बरें सुनाता है पर वो बातें नहीं करता जो ये लोग सुनना चाहते हैं.”

समीर खालको अब दिल्ली में पत्रकारिता सीखने आए हैं और मानते हैं कि इस मुहिम से आदिवासियों का “गला खुला है उन्हें आवाज़ मिली है.”

विरोध भी

पर आवाज़ मिलने के साथ ही आवाज़ बंद करने की कोशिशे भी तेज़ हुई हैं. प्रशासन की सख्ती को इससे जुड़े लोग महसूस कर रहे है.

पहली बात ये कि जिनके लिए ये सेवा है वो मोबाईल पर किसी को खुलकर अपनी बात नहीं कह पाते, दूसरा जिन लोगों की आवाज़ उठाने की बात कर रहे हैं उनके पास फोन की सुविधा है भी या नहीं और अगर है तो ये कौन लोग हैं? मुझे लगता है कि पिछड़े आदिवासियों की बजाय इसका उपयोग वो लोग ज़्यादा कर रहे हैं जो किसी आंदोलन से जुड़े हैं और पहले से ही अपनी बात रखने में सक्षम हैं

ललित सुरजन, मुख्य संपादक, देशबंधु

लिंगाराम कोड़ोपी दंतेवाड़ा के एक आदिवासी हैं और आजकल दिल्ली में पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहे हैं. शायद वो छत्तीसगढ़ के पहले आदिवासी पत्रकार होंगे.

उन्हें छत्तीसगढ़ पुलिस नक्सलियों का “मास्टर माइंड” बताती है. उनका कहना है, “उनके परिजनों को झूठे मामलों में फँसाया जा रहा है और उन्हें भी धमकी दी गई है कि वो छत्तीसगढ़ लौटे तो उन्हें हिरासत में ले लिया जाएगा.”

स्वयं सीजीनेट चलाने वाले कहते हैं कि चाहे उनके पास इसके पुख़्ता सबूत नहीं हैं कि प्रशासन इस सेवा को बंद करने की कोशिश कर रही है पर एसे संकेत ज़रुर उन्हें मिल रहे हैं कि उनके काम को पसंद नहीं किया जा रहा है.

वे कहते हैं कि सीजीनेट स्वरा के कुल कार्यक्रमों का पांच प्रतिशत हिस्सा ही शायद मानवाधिकारों के हनन या नक्सलवाद से जुड़े मुद्दों पर होता है और ज़्यादातर बातें आदिवासियों की रोज़मर्रा की तकलीफों से जुड़ी है.

और एक स्तर पर मुख्यधारा के मीडिया चलाने वालों का इस सेवा के बारे में भी यही आरोप है कि इसमें लोकगीत, कविताएं आदि ज़्यादा हैं और कहीं न कहीं ये अपने लक्ष्य से दूर नज़र आता है.

देशबंधु अखबार के प्रधान संपादक ललित सुरजन कहते हैं, “पहली बात ये कि जिनके लिए ये सेवा है वो मोबाईल पर किसी को खुलकर अपनी बात नहीं कह पाते, दूसरा जिन लोगों की आवाज़ उठाने की बात कर रहे हैं उनके पास फोन की सुविधा है भी या नहीं और अगर है तो ये कौन लोग हैं? मुझे लगता है कि पिछड़े आदिवासियों की बजाय इसका उपयोग वो लोग ज़्यादा कर रहे हैं जो किसी आंदोलन से जुड़े हैं और पहले से ही अपनी बात रखने में सक्षम हैं.”

सीजीनेट स्वरा को शायद इसे ही अपनी सफलता का पैमाना मान लेना चाहिए कि सरकार को इसके असर की इतनी चिंता सताने लगी है और मुख्यधारा का मीडिया भी इस पर एक प्रतिस्पर्धी के रुप में नज़र रख रहा है.

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