नक्सलियों के ख़िलाफ़ सलवा जुड़ुम बंद

सलवा जुड़ूम कैंप

छत्तीसगढ़ में नक्सलियों या माओवादियों के ख़िलाफ़ चल रहे कथित जनांदोलन सलवा जुड़ूम को बंद करने की घोषणा कर दी गई है.

इसके स्थान पर अब वही लोग, जो पहले सलवा जुड़ूम में शामिल थे, एक गांधीवादी अहिंसक आंदोलन चलाने की बात कर रहे हैं.

'शांति का युद्ध' नाम के इस आंदोलन की शुरुआत शनिवार को बीजापुर के कुटरु में सैकड़ों लोगों की उपस्थिति में की गई है. कुटरु वही स्थान है जहाँ से सलवा जुडु़म की शुरुआत की गई थी.

'सलवा जुड़ूम' की ज़्यादतियों को लेकर छत्तीसगढ़ सरकार की व्यापक निंदा हुई है. मानवाधिकार कार्यकर्ताओं इसे बंद करने की मांग कर ही रहे थे, इसके ख़िलाफ़ दायर एक याचिका के बाद सुप्रीम कोर्ट ने भी इसे बंद करने के आदेश दिए थे.

हालांकि सरकार इसे जनांदोलन कहती थी लेकिन इसे चलाने के लिए उसने आदिवासी युवाओं को स्पेशल पुलिस ऑफ़िसर (एसपीओ) के रुप में भर्ती की थी और उन्हें हथियार भी दिए थे.

इसे बंद करने की घोषणा ऐसे समय में हुई है जब सलवा जुड़ूम के 23 कैंपों में से अधिकांश खाली हो चुके हैं और बहुत से एसपीओ या तो इलाक़ा छोड़कर जा चुके हैं या फिर अपने हथियारों के साथ माओवादियों के साथ जा मिले हैं.

सलवा जुड़ूम

सलवा जुड़ुम कार्यकर्ता

सलवा जुड़ुम कार्यकर्ताओं पर भी अत्याचार करने के आरोप लगे

सलवा जुड़ूम का अर्थ यूँ तो स्वत:स्फ़ूर्त आंदोलन या जनांदोलन है लेकिन वर्ष 2005 में बस्तर में इस हथियारबंद अभियान की शुरुआत सरकारी प्रायोजन में हुई थी.

अब छत्तीसगढ़ सरकार अब पूरे देश में यह संदेश भेजना चाह रही है कि सलवा जुड़ूम आंदोलन बंद हो गया है.

दंतेवाड़ा के कलेक्टर आर प्रसन्ना ने कहा,"सलवा जुड़ूम 2005 में शुरू हुआ था. बहुत सारी बातें हैं मगर अब सलवा जुड़ूम बंद हो गया है."

जानकार लोगों का कहना है कि 2005 में बीजापुर से शुरू किए जाने के बाद इस हथियारबंद अभियान कि वजह से बस्तर संभाग के 650 गाँव वीरान हो गए. 60 हज़ार से ज्यादा ग्रामीण पलायन कर दंतेवाड़ा और बीजापुर जिलों के विभिन्न इलाकों में सरकार द्वारा बनाए गए 23 कैम्पों में रहने को मजबूर हो गए.

सरकारी मदद के साथ इस कथित अभियान ने माओवादियों से आमने-सामने की लड़ाई छेड़ दी.

इसका परिणाम यह हुआ कि बस्तर संभाग की ज़मीन रक्त रंजित हो गई.

पांच सालों के बाद यह अभियान आज कहाँ खड़ा है ? इस सवाल पर सलवा जुड़ूम के जन्मदाता माने जाने वाले कांग्रेस के नेता महेंद्र कर्म ने कहा, "अब इस आन्दोलन में ठहराव आ गया तो इसे बंद ही समझ लीजिये. इसके बंद होने के पीछे बहुत से सारे कारण रहे जैसे सरकारी उपेक्षा और योजनाबद्ध तरीक़े से काम करने का अभाव."

कैंप खाली

सलवा जुड़ूमू बहुत उत्साह के साथ शुरू हुआ था लेकिन वह अब ख़त्म हो गया है. जो समर्थन इसे आम लोगों का मिलना चाहिए था वह नहीं मिल पाया. बिना लोगों के समर्थन के कोई आंदोलन लंबे समय तक नहीं चल सकता

सलवा जुड़ूम नेता


वहीं दंतेवाड़ा और बीजापुर के सलवा जुड़ूम कैम्पों में रहने वाले लोगों का कहना है कि अब यहाँ रहने वालों कि संख्या एक तिहाई भी नहीं रह गई है.

इन कैम्पों से बड़े पैमाने पर पलायन शुरू हो गया है.

ऐसे भी उदाहरण मिले हैं कि सलवा जुड़ूम से जुड़े कार्यकर्ता या तो भागकर दूसरे शहरों में चले गए हैं या फिर अपने हथियारों के साथ वापस माओवादियों के दस्ते में जाकर शामिल हो गए हैं.

दंतेवाड़ा के दोरनापाल शिविर में रह रहे इस अभियान के एक बड़े नेता का कहना है, "सलवा जुड़ूमू बहुत उत्साह के साथ शुरू हुआ था लेकिन वह अब ख़त्म हो गया है. जो समर्थन इसे आम लोगों का मिलना चाहिए था वह नहीं मिल पाया. बिना लोगों के समर्थन के कोई आंदोलन लंबे समय तक नहीं चल सकता."

उनका कहना है, "ऐसा लगा था कि नक्सलवाद ख़त्म हो जाएगा. मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ. अब इस कैंप के 85 प्रतिशत लोग या तो वापस चले गए हैं या फिर माओवादियों की गिरफ्त में आ गए हैं."

सितंबर महीने की शुरुआत में केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में न्यायमूर्ति बी सुदर्शन रेड्डी और न्यायमूर्ति एस एस निज्जर के पीठ को बताया था कि सलवा जुड़ूम अब ख़त्म होने के रास्ते पर है.

इससे पहले इस पीठ ने सरकार से पूछा था कि सलवा जुड़ूम क्यों प्रतिबंधित नहीं किया जा रहा है.

पीठ में सरकार के वकील मनीष सिंघवी ने बताया था कि सरकार सलवा जुड़ूम का समर्थन नहीं करती.

गांधीवादी आंदोलन

महेंद्र कर्मा

कांग्रेस नेता महेंद्र कर्मा के आंदोलन को राज्य की भाजपा सरकार चलाती रही

सलवा जुड़ूम के कैंपों में रहने वाले एसपीओ कहते हैं कि पहले सरकार उन्हें मुफ़्त अनाज उपलब्ध करवाया करती थी मगर अब उन्हें सब कुछ ख़रीदना पढ़ता है.

बीजापुर के कुटरू इलाके में जहाँ से सलवा जुड़ूम की शुरूआत की गई थी, हालत अब विपरीत हैं.

यहाँ के रहने वाले कहते हैं "सरकार ने हाथ खींच लिए हैं. ना चिकित्सा सुविधा है, ना अनाज, ना काम. अब किसी तरह मज़दूरी करके गुज़ारा करते हैं."

कुटरू में सलवा जुड़ूम के बड़े नेता मधुकर राव ने बीबीसी को बताया,"कैंपों में रहने वाले लोगों के साथ सबसे बड़ी समस्या है कि वह मज़दूरी करने दूर भी नहीं जा सकते. जो काम कस्बे में मिलता है वही करना पड़ता है. अगर दूर जाते हैं तो मारे जाएंगे."

सलवा जुड़ूम के प्रति सरकार के अचानक बदलते हुए रवैए के बाद अब इस आन्दोलन से जुड़े लोगों ने गांधीवादी तरीक़े को अपनाने की बात कही है.

अब हमारा यह आंदोलन पूरी तरह से अहिंसक रहेगा. गांधी के विचारों से इसे आगे बढ़ाना है. हम सिर्फ माओवादी ही नहीं, सरकार से भी अपील करेंगे कि दोनों के बीच छिड़े ख़ूनख़राबे को बंद किया जाए. हम अपील करते हैं कि हमें सुख शांति से जीने का अधिकार मिले. हम किसी से लड़ने नहीं जा रहे हैं

मधुकर राव

इसके लिए अब एक नए अभियान की बात कही जा रही है. दंडकारण्य शान्ति संघर्ष मोर्चा के बैनर तले चलने वाले इस अभियान की शुरूआत गाँधी जयंती के दिन कुटरू के उसी इलाके से की गयी है जहां से पांच साल पहले सलवा जुड़ूम आन्दोलन शुरू हुआ था.

वे कहते हैं, " अब हमारा यह आंदोलन पूरी तरह से अहिंसक रहेगा. गांधी के विचारों से इसे आगे बढ़ाना है. हम सिर्फ माओवादी ही नहीं, सरकार से भी अपील करेंगे कि दोनों के बीच छिड़े ख़ूनख़राबे को बंद किया जाए. हम अपील करते हैं कि हमें सुख शांति से जीने का अधिकार मिले. हम किसी से लड़ने नहीं जा रहे हैं."

मगर इस अभियान से जुड़े एक और सलवा जुड़ूम के बड़े नेता चिन्ना गोटा कहते हैं, "यह शांति के लिए क्रांति है. इसे पूरे दंडकारण्य के इलाक़े में फैलाना है क्योंकि नक्सली पूरे दंडकारण्य के इलाक़े में फैले हुए हैं."

वे कहते हैं, "यह हमारा युद्ध है, शांति का युद्ध. यह सिर्फ़ यहाँ के नक्सलियों को वापस बुलाने के लिए है. यहाँ के आदिवासियों को अपने साथ मिलाकर ही आंध्र के नक्सली इस इलाक़े पर कब्ज़ा कर रहे हैं."

जब पूछा गया कि क्या इस आंदोलन में हथियार भी होंगे तो चिन्ना गोटा ने कहा, "सिर्फ़ अपनी सुरक्षा के लिए."

इस बारे में जब दंतेवाड़ा के पूर्व विधायक और सीपीआई के नेता मनीष कुंजाम से पूछा गया तो उन्होंने कहा,"यह शांति अभियान सलवा जुड़ूम वाले ही चला रहे हैं. यह वही लोग हैं जो नाटक कर रहे हैं. यह तो वही वाली बात हो गई कि हज़ार चूहे खा कर बिल्ली चली हज को. पूरा समय हिंसा में लिप्त रहने के बाद अब गांधीवाद की बात कर रहे हैं. यह बात हज़म नहीं हो पा रही है."

अभी कहा जा रहा है कि इस नए आंदोलन का सरकार से कोई लेना देना नहीं है.

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