लोगों को भड़काया जाता है : जस्टिस श्रीकृष्ण

जस्टिस श्रीकृष्ण

बाबरी मस्जिद ढहाने के बाद मुंबई में भड़के दंगो की जाँच के लिए बनी श्रीकृष्ण आयोग की रिपोर्ट को ऐसा दस्तावेज़ माना जाता है कि जिसने आम लोगों का दर्द दर्ज है और अफ़सरों और नेताओं की कारगुज़ारियों का कच्चा चिट्ठा बयान किया गया है.

लेकिन वर्षो गुज़र गए अभी तक रिपोर्ट में जिन अफ़सरों और नेताओं की आलोचना हुई, उनमें से किसी को भी सज़ा नहीं हुई.

ऐसे वक्त जब बाबरी मस्जिद पर 24 सितंबर को अदालत का फ़ैसला आने की उम्मीद है, एक बार फिर इस रिपोर्ट को लागू करने की मांग ज़ोर पकड़ रही है.

रिपोर्ट के मुताबिक दंगों में करीब 900 लोग मारे गए जिनमें 575 मुस्लिम और 275 हिंदू शामिल थे. घायल होने वालों की संख्या 2036 बताई गई थी.

इस रिपोर्ट को बनाने वाले जस्टिस श्रीकृष्ण से हमने उनके मुंबई स्थित आवास पर बात की.

आपने जो रिपोर्ट तैयार की, इसे तैयार करने में आपको करीब पाँच साल लगे 1993-98, लेकिन अभी तक इसका कार्यान्वयन नहीं हो पाया है?

इन्क्वायरी कमीशन एक्ट के अंतर्गत इन्क्वायरी कमीशन को इतना ही अधिकार है कि छानबीन कर सत्य परिस्थिति को सामने लेकर आए और रिपोर्ट को सरकार को पेश करे.

उसके बाद सरकार उस पर क्या कार्रवाई करेगी, ये कमीशन के तहत नहीं है.

शायद पाँच वर्ष की मेहनत के बाद जो कुछ हुआ, इससे भगवतगीता पर मेरा विश्वास बढ़ गया है. गीता में कहा गया है कि काम करो और प्रतिफल की अपेक्षा मत करो. मैने कोई अपेक्षा नहीं रखी.

उन दिनों का माहौल और लोगों की सोच याद कर बताइए.

आम जनता दंगा-फ़साद में नहीं पड़ती. उनको भड़काने वाले लोग होते हैं जो उन्हें उद्वेलित करते हैं.

जस्टिस श्रीकृष्ण

कहानियाँ बहुत थीं और कहने लगे तो हृदय विदारक थीं. लोगों के घर जलाए गए. बेरहमी से लोगों को कत्ल किया गया. मकान लूटे गए.

मेरी मनोस्थिति बहुत बिगड़ गई थी. फिर भी जज होने के नाते लोगों की कठिनाइयाँ सुनने की आदत है मुझे, उस वक्त भी थी. उसी तरह हमने काम किया.

कमीशन में काम के दौरान कोई ऐसा वाकया जिसने आपके दिमाग पर छाप छोड़ी हो?

किसी ने बताया कि गर्भवती महिला को तलवार से मारकर उसके पेट के अंदर से बच्चे को निकाल कर आग में डाला गया था. बहुत ही मानसिक तापदायक था. वो मुझे अब भी याद है.

क्या कभी राजनीतिक दबाव पड़ा आप पर?

बिल्कुल नहीं. दो कारण हैं इसके. पता नहीं क्यों, पर लोग मुझसे डरते हैं. दूसरी, जज होने के नाते मैं कभी किसी भी राजकीय लोगों से संपर्क नहीं रखता. न कोई मुझसे मिलने की जुर्रत करता है.

किन मुश्किलों का सामना करना पड़ा आपको रिपोर्ट तैयार करते वक्त?

शुरुआत में महाराष्ट्र सरकार ने मेरे काम में बहुत सारी कठिनाइयाँ पेश करने की कोशिश की. जिन काग़ज़ात को हम पेश करने के लिए कहते थे, उसमें उन्होंने एक न एक पाबंदी लगाई.

फिर भी हम आगे बढ़ते रहे, तो फिर सरकार को मालूम हो गया कि ये काम में हिचकिचाता नहीं.

फिर सब ठीक हो गया लेकिन जब भाजपा-शिवसेना की सरकार यहाँ बनी तो उन्होंने सोचा कि जिस तरह से आगे काम चल रहा है इसका शकुन अच्छा नहीं दिखता तो उन्होंने इस कमीशन को ख़ारिज कर दिया.

कमीशन के ख़ारिज होते ही लोगों में खलबली मच गई, तब वाजपेयी साहब ने अपने 15 दिनों के प्रधानमंत्री कार्यकाल में जाते-जाते महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री को चिट्ठी लिख दी कि ये एक ऐसा मामला है जिसमें लोग चाहते हैं कि कमीशन का मामला आगे बढ़े.

ये 1996 का मामला है. फिर उसके बाद कमीशन को दोबारा बैठाने का प्रयत्न किया गया. उस वक्त मैं सोच रहा था कि काम करने से मना कर दूं, फिर मैने सोचा कि आधा काम तो हो गया है, पूरा करके छोड़ देंगे. तो फिर डेढ़ बरस लगातार काम चल रहा था. 1998 में रिपोर्ट तैयार हो गई और रिपोर्ट पेश किया गया.

इस पर आप क्या कहेंगे कि एक भी व्यक्ति को 1992-93 के मुंबई के दंगों के लिए सज़ा नहीं मिली. आपने शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे का भी नाम अपनी रिपोर्ट में लिया है.

शुरुआत में महाराष्ट्र सरकार ने मेरे काम में बहुत सारी कठिनाइयाँ पेश करने की कोशिश की. फिर भी हम आगे बढ़ते रहे, तो फिर सरकार को मालूम हो गया कि ये काम में हिचकिचाता नहीं.

जस्टिस श्रीकृष्ण

अगर सरकार ये चाहती है कि वो रिपोर्ट पर अमल नहीं करे, तो हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट ही उसे रास्ता बता सकते हैं.

हिंदुस्तान में ऐसे कई कमीशन बिठाए गए, कई की रिपोर्टें आ चुकी हैं. रिपोर्टें आती हैं लेकिन उन पर अमल नहीं होता है.

थोड़े समय के बाद लोग उसे भूल जाते हैं. ये अचंभे की बात है कि इस कमीशन के बारे में लोग जागृत हैं, वो अभी भी सवाल उठाते हैं.

इससे ज़ाहिर होता है कि लोगों में जागृति बढ़ गई है. लोग चाहते हैं कि ऐसी रिपोर्टों पर सरकार की प्रतिक्रिया ज़ाहिर हो.

लेकिन जब कमीशन की रिपोर्टों पर अमल नहीं होता है तो ऐसे कमीशन का क्या फ़ायदा?

इस पर कई बार मैने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की है. मेरा सोचना ये है कि ऐसे कमीशन को कार्यरूप करने के लिए अधिकार दिए जाने चाहिए. जैसे दक्षिण अफ़्रीका में एक ट्रुथ और रिकंसिलिएशन कमीशन है.

उसको ये अधिकार है कि वो सत्य को बाहर निकाले और उस पर तुरंत कार्रवाई करे. जब तक ये नहीं होता है तब तक ऐसे कमीशन टूथलेस टाइगर हैं.

यानि ऐसे कमीशन का कोई अर्थ नहीं है?

मैने ऐसा नहीं कहा. ऐसे कमीशन अपनी दबी भावनाओं को निकालने का ज़रिया है. एक समुदाय को जिसकी भावनाओं को ठेस लगी थी, उन्हें व्यक्त करने का एक ही माध्यम था.

उन्हें ऐसा लगा कि ऐसा अधिकारी है जो हमारी सुनवाई करेगा. हम अपनी कठिनाईयाँ उसके सामने पेश कर सकते हैं. इसी की वजह से भावनाएँ इतनी भड़की नहीं हैं.

आपने अपनी रिपोर्ट में कई नेताओं की भूमिका पर चर्चा की है, लेकिन आपने बाल ठाकरे का नाम तो लिया लेकिन उनकी सीधी भूमिका की कोई चर्चा नहीं की. क्या किसी राजनीतिक दबाव के तहत आपने ऐसा किया?

बिल्कुल नहीं. किसी व्यक्ति की क्या भूमिका थी ये बताने के लिए साक्षी की ज़रूरत है.

बाल ठाकरे के विरुद्ध सिर्फ़ एक ही व्यक्ति का ही हलफ़नामा था. उसके अलावा हर व्यक्ति जानता था कि शिवसेना का हाथ है. और शिवसेना के हाथ के पीछे बाल ठाकरे हैं. लेकिन कभी ऐसा नहीं हुआ कि बाल ठाकरे ने रास्ते पर आकर कोई कार्रवाई की, या फिर किसी को आग लगाया या किसी के साथ मारपीट की.

तो जब तक डायरेक्ट एविडेंस नहीं मिलता है, किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है.

कमीशन ने ऐसे कई केसों के बारे में कहा, कि ये सच हैं लेकिन लोगो के विरुद्ध सबूत नहीं हैं?

पुलिस ने कई मामलों में कहा कि वो सच तो हैं लेकिन वो एक्शनेबल नहीं हैं.

मैने बताया है कि ऐसे केसों की छानबीन करना मेरे अधिकार क्षेत्र में नहीं था. पुलिस और न्यायालय ये काम कर सकते थे. लेकिन उस पर भी काम हुआ है.

सुप्रीम कोर्ट ने कुछ मामलों में दोबारा जाँच के आदेश दिए हैं. पुलिस कहती हैं कि जाँच हुई लेकिन कोई साक्ष्य नहीं है. हम क्या कर सकते हैं.

1992-93 दंगों की जाँच से बने आयोग से ये कहना कि वो 1993 बम धमाकों की भी जांच करे, ये माना जाता है कि ये आयोग को अपने फ़ोकस से हटाने की कोशिश थी?

शायद ऐसा कोई उद्देश्य होगा. मैं पक्के तौर पर नहीं कह सकता हूँ. जैसे ही पुलिस की जाँच खत्म हुई, स्पेशल कोर्ट में चार्जशीट दाखिल किया गया था, तो कमीशन के हाथ में उसे देने का कोई मतलब ही नहीं रहा क्योंकि आयोग को ये अधिकार नहीं है कि जो मामला अदालत में है उसके बारे में कुछ कहे या कुछ कार्रवाई करे.

इस वक्त सोचते हुए मुझे ऐसा लगता है कि हो सकता है शायद वही उद्देश्य हो लेकिन मैं पक्के दौर पर नहीं कह सकता हूँ.

बाबरी मस्जिद पर हाईकोर्ट का फ़ैसला 24 सितंबर को आने की उम्मीद है. आपको क्या लगता है कि 1992 के दौरान मुसलमान जो आहत हुए थे, उनकी सोच में फ़र्क आया है.

परिस्थितियाँ सुधरी हैं. बताना कठिन है कि इसके बाद बाबरी मस्जिद के भविष्य पर फ़ैसला आने के बाद क्या लोग सोचेंगे. आम जनता दंगा-फ़साद में नहीं पड़ती. उनको भड़काने वाले लोग होते हैं जो उन्हें उद्वेलित करते हैं.

उस वक्त माहौल बहुत खराब था. पढ़े-लिखे लोग जिन्हें हम समझदार मानते हैं, उन्हें भी लगता था कि दूसरे कौम को सबक सिखाया जाए. इस तरह की मनोस्थिति में फ़साद तो होंगे ही.

जस्टिस श्रीकृष्ण

जब व्यक्ति भड़क जाता है तो भटक भी जाता है. शायद ऐसा न हो. पता नहीं.

मुंबई पर घटना का प्रभाव किस तरह पड़ा?

उस घटना का गहरा प्रभाव पड़ा था. अभी परिस्थिति सुधर गई है. अब लोग हम और वो, ऐसी बातें नहीं करते हैं.

कांग्रेस-एनसीपी ने अपने घोषणापत्र में कहा था कि वो आपकी रिपोर्ट को लागू करेंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. आपकी प्रतिक्रिया...

दुनिया के हर मुल्क में राजकारिणी अपनी सत्ता को स्थिर रखने के लिए बहुत सी बातें कहते हैं, लेकिन करते हैं बहुत कम. इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है.

राज्य का अंदरूनी मामला ये है कि वो किसी सिद्धांत पर नहीं चलते.

मुंबई जैसे शहर में जहाँ हर समुदाय के लोग रहते हैं, आपके मुताबिक क्या कारण थे जिनकी वजह से यहाँ दंगे भड़के?

उस वक्त जनता में असंतोष बढ़ गया था. उसके चाहे धार्मिक कारण होंगे, राजनीतिक या कुछ और. इस असंतोष को बढ़ावा देने का काम राजकीय पक्षों ने किया. इसी वजह से दंगे हुए.

रिपोर्ट में भी आपने देखा होगा, एक बात मुझे याद है. किसी ने बताया था मेरे सामने. मैने उनसे कहा था कि मैं हिंदू इसलिए हूँ क्योंकि अपने मोक्ष का मार्ग मुझे हिंदू धर्म से मिलता हूँ, इसलिए मैं हिंदू हूँ.

लेकिन आप हिंदू धर्म के मार्ग पर इसलिए चलते हैं क्योंकि आपको सत्ता चाहिए. उन्होंने मान लिया कि ये सच बात है. जब तक ये तथ्य है, तब तक ये फ़साद चलते रहेंगे.

और फ़साद के दौरान समाज में, पढ़े-लिखे लोगों में आपने किस तरह के बदलाव देखे?

उस वक्त माहौल बहुत खराब था. पढ़े-लिखे लोग जिन्हें हम समझदार मानते हैं, उन्हें भी लगता था कि दूसरे कौम को सबक सिखाया जाए. इस तरह की मनोस्थिति में फ़साद तो होंगे ही.

कमीशन की बैठकों के दौरान जब लोग अपनी कहानियाँ बयान करते थे तो एक इंसान के नाते आप पर क्या असर पड़ा..

इस कमीशन के काम करने से पहले बहुत शांत व्यक्ति था. मुझे कभी गुस्सा नहीं आता था. कमीशन में लोगों की कहानियाँ सुनते सुनते मुझे बहुत गुस्सा आने लगा, मैं तेज़ मिज़ाज का हो गया. ये मेरे परिवार का कहना है.

अगर आप सुनते रहें कि इसे जला दिया गया, उसे मार दिया गया, इससे मानसिक व्यथा होती है और अंतरंग परिणाम होते हैं.

आपकी उस रिपोर्ट की क्या अहमियत थी?

जब रिपोर्ट विधानसभा में पेश किया गया, तो सरकार ने रिपोर्ट को दबाने का प्रयत्न किया. उस रिपोर्ट की सिर्फ़ उतनी ही कॉपी बनी जितने एमएलए थे. एक भी ज़्यादा कॉपी नहीं बनाई गई. फिर उसे हिंदूद्वेषी रिपोर्ट का नाम दिया गया.

क्या कहेंगे ऐसे नाम पर?

मुझे तो हँसी आती है. मुझे अगर लोग हिंदूद्वेषी कहें, तो हिंदू प्रेमी कौन हो सकता है (हंसते हुए).

मैं खुद को कट्टर हिंदू समझता हूँ. सुबह पूजा किए मैं कहीं बाहर भी नहीं निकलता. अगर छह बजे का प्लेन पकड़ना है, तो मैं चार बजे उठकर पूजा करता हूँ.

ये सरासर गलत बात है. मैं किसी क़ौम के ख़िलाफ़ नहीं हूँ. मैं अपने ही धर्म से इतना प्यार करता हूँ, उसी नज़रिए से मैं सभी मज़हबों को देखता हूँ.

क्या आपको लगता है कि आपकी रिपोर्ट लागू की जाएगी?

पता नहीं. देखेंगे. उस वक्त तक मैं ज़िंदा रहूँगा तो मैं भी देख लूंगा.

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