जनसंख्या बढ़ाने में जुटे पारसी

बांबे पारसी पंचायत

परियोजना पर आने वाला खर्च बांबे पारसी पंचायत संभालती है.

घटती जनसंख्या से परेशान पारसी समुदाय के लिए एक फ़र्टिलिटी प्रोजेक्ट काफ़ी मददगार साबित हो रहा है.

वर्ष 2001 के आंकड़ों के मुताबिक भारत में पारसियों की संख्या 69 हज़ार के आसपास थी.

इस समस्या से निपटने के लिए वर्ष 2004 में 'बांबे पारसी पंचायत' ने मुंबई के जसलोक अस्पताल की एक स्त्रीरोग विशेषज्ञ डॉक्टर अनाहिता पंडोल की मदद से एक फ़र्टिलिटी क्लीनिक की शुरुआत की.

तीन सौ साल से भी ज़्यादा पुरानी संस्था 'बांबे पारसी पंचायत' की ये पहल उन पारसी दंपत्तियों के लिए थी जिन्हें गर्भधारण में समस्या पेश आ रही थी.

इस पूरे प्रयास को नाम दिया गया है 'पंचायत फ़र्टिलिटी प्रोजेक्ट.'

इस परियोजना में दंपत्तियों को गर्भधारण में हो रही समस्या के लिए सलाह दी जाती है, पुरुषों में शुक्राणुओं या फिर खून की जाँच की जाती है, और आईवीएफ़ तकनीक का भी सहारा लिया जाता है.

दंपत्तियों को यौन समस्याओं के बारे में भी जानकारी और सलाह दी जाती है.

इस प्रोजेक्ट से अभी तक 500 से ज़्यादा दंपत्ति मदद ले चुके हैं.

’70 प्रतिशत से ज़्यादा मामलों में दंपत्ति रोज़ हमारे संपर्क में रहते हैं. 160 मामलों में दंपत्तियों को बच्चा हासिल करने में सफ़लता मिली है. एक दंपत्ति को तीन बच्चे पैदा हुए. कई दंपत्तियों को जुड़वा बच्चे हासिल हुए. कई बार हमारे पास दंपत्ति शादी के छह महीने के बाद आते हैं, कई बार वो सात साल बाद आते हैं. लोगों में जागरुकता फ़ैल रही है.’

डॉक्टर अनाहिता पंडोल

डॉक्टर पंडोल का कहना है, ''70 फ़ीसदी से ज़्यादा मामलों में दंपत्तियों को सलाह की ज़रूरत होती है. अब तक 160 दंपत्तियों को बच्चा हासिल करने में सफ़लता मिली है. एक दंपत्ति को तीन बच्चे पैदा हुए.''

''कई दंपत्तियों को जुड़वा बच्चे हासिल हुए. कई दंपत्ति शादी के छह महीने बाद आते हैं, कई बार वो सात साल बाद आते हैं. धीरे-धीरे लोगों में जागरुकता फ़ैल रही है.''

इस परियोजना पर आने वाले खर्च का ज़िम्मा बांबे पारसी पंचायत संभालती है.

पंचायत के मुखिया मेहिल पी कोल्हा कहते हैं,'' ये योजना पूरे भारत में रहने वाले पारसियों के लिए है. कुछ मामलों में इलाज का खर्चा डेढ़ लाख तक पहुँच जाता है. हम दंपत्तियों से उनकी आर्थिक पृष्ठभूमि के बारे में नहीं पूछते.

''वर्ष 2004 में पारसियों की गिरती जनसंख्या के बारे में विचार हुआ. बहुत सारे दंपत्ति गर्भधारण की समस्या से जूझ रहे थे. फिर हमने सोचा क्यों न ऐसे लोगों की मदद की जाए.''

डॉक्टर पंडोल इस सेवा के लिए कोई पैसा नहीं ले रही हैं, लेकिन वो इसे बहुत तूल नहीं देना चाहतीं.

पी कोल्हा कहते हैं कि ये योजना भारतभर में पारसियों के लिए है.

जनसंख्या में कमी को लेकर पारसी समुदाय के साथ भी वही समस्या है जो दूसरे समुदायों के साथ है. दंपत्ति अपने करियर में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि बच्चों के बारे में सोच पीछे रह जाती है. जब वो परिवार बढ़ाने के बारे में सोचते हैं तब तक थोड़ी देर हो चुकी होती है.

पारसी समुदाय में लड़कों की शादी की उम्र 35 के आसपास और लड़कियों की उम्र 25-30 साल के बीच होती है और उन्हें अपने समुदाय में ही शादी करने के लिए प्रेरित किया जाता है.

पी कोल्हा के मुताबिक अगर कोई पारसी लड़का किसी ग़ैर-पारसी लड़की से शादी करता है तो भी लड़की को गैर-पारसी ही माना जाता है, लेकिन बच्चे पारसी माने जाते हैं. लेकिन अगर कोई पारसी लड़की गैर-पारसी लड़के से शादी करती है तो उसके बच्चे पारसी नहीं माने जाते.

पारसी समुदाय की घटती जनसंख्या के लिए ऐसी मान्यताओं की आलोचना भी होती रही है.

जनसंख्या बढ़ाने के लिए पारसी समुदाय 'स्पीड डेटिंग' का सहारा भी ले रहा है जिसमें लड़के-लड़कियों के आपसी मेल-जोल को बढ़ावा दिया जाता है.

इसके अलावा अगर किसी दंपत्ति को एक से ज़्यादा बच्चा होता है तो पंचायत की ओर से दंपत्ति को हर बच्चे के लिए 18 वर्ष की उम्र तक हर महीने 3,000 रुपए दिए जाते हैं.

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