छांव की तलाश में बचपन

मुंबई

घर से भागकर आए कई बच्चों की कहानी रेलवे स्टेशनों के आस-पास ही घूमती है

हर साल कई सौ बच्चे मुंबई का रुख़ करते हैं. कोई गरीबी की वजह से मुंबई आता है, तो कुछ घर में मारपीट की वजह से, तो फिर कुछ को शहर का आकर्षण यहाँ खींच लाता है.

मुंबई में बालप्रफ़ुल्लता नाम की ग़ैर-सरकारी संस्था के मुताबिक हर साल करीब साढ़े तीन हज़ार बच्चे मुंबई पहुँचते हैं. संस्था के अध्ययन से पता चलता है कि मुंबई में आने वाले बच्चों में उत्तरी राज्यों- बिहार, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल से आने वाले बच्चों की संख्या सबसे ज़्यादा है

लेकिन मुंबई में आने वाले बच्चे किस हाल में हैं? उनका गुज़ारा कैसे होता है? बीबीसी हिंदी ने इन बच्चों का हाल जानने का प्रयास किया है.

आसमा (बदला हुआ नाम), जो 17 साल की है, उनका किस्सा ही ले लीजिए. वो मुंबई के पास ही के एक इलाक़े की रहने वाली हैं. छोटी सी उम्र में ही उसने जैसे दुनिया के सभी रंग देख लिए हों. जब वो छोटी थी तो मारपीट की वजह से उसकी मां ने घर छोड़ दिया. मां ने दूसरी शादी की तो उसे अच्छा नहीं लगा. उसकी बुआ के सगे बेटे के साथ उसकी शादी तय हुई थी. उसके होने वाले पति को उसके सौतेले पिता स्वीकार्य नहीं थे.

जो बच्चे हमारे जैसे लोगों के हाथ नहीं लगते, वो किसी गिरोह के हाथ लग जाते हैं. उन्हें भीख मांगने के काम पर लगाया जाता है. कुछ बच्चे प्लेटफॉर्म पर रहकर ही काम करना शुरू कर देते हैं. कुछ बच्चों को नशे की भी आदत लग जाती है.

संतोष शिंदे, सामाजिक कार्यकर्ता

शादी पर उठे विवादों पर गुस्से में उसने घर छोड़ा. अपने चाचा के घर गई तो वहाँ उसके साथ बलात्कार की कोशिश की गई. आसमा ने कई दिन भूखे-पेट सड़क पर गुज़ारे. किसी ने धोखे से मसाज सेंटर में नौकरी दिलवाई, लेकिन सच पता चलने पर वहाँ से भी भाग गई. आसमा ने दो बार आत्महत्या की कोशिश की. पहली बार उसे अस्पताल में भर्ती करवा दिया गया, दूसरी बार पुलिस ने पकड़ लिया.

इतनी परेशानियों के बाद क्या वो घर वापस नहीं जाना चाहतीं? वो कहती हैं, "मेरी माँ के मुताबिक लड़का सोने का सिक्का होता है जबकि बेटी जली हुई लकड़ी. एक बार जल गई तो किसी काम की नहीं रहती है." आसमा अब अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती हैं.

बदतर हालात

बच्चों से जुड़ी एक परियोजना बालप्रफ़ुल्लता ने मुंबई के दो रेलवे स्टेशनों पर एक सर्वे किया. दरअसल कई भागे हुए बच्चों की कहानी रेलवे स्टेशनों के आस-पास ही घूमती है. कुछ वहीं पर रहते हैं, या फिर वहीं आस-पास काम ढूँढ लेते हैं.

सर्वेक्षण में पाया गया कि उत्तरी राज्यों-जैसे बिहार, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल से आने वाले बच्चों की संख्या सबसे ज़्यादा है.

कई बच्चे महाराष्ट्र के शोलापुर, जालना, चंद्रपुर और गोंडिया जैसे इलाकों से भी भाग कर मुंबई पहुंचते हैं. इन बच्चों में ज़्यादातर की उम्र 11 और 15 के बीच है और लड़कों की संख्या ज़्यादा है.

मुंबई

कुछ बच्चों को नशे की भी आदत लग जाती है

कुछ बच्चों ने मारपीट की वजह से घर छोड़ा, कुछ मां-बाप के बीच लड़ाई से नाराज़ थे. कुछ को उनके रिश्तेदारों ने ही छोड़ दिया, कुछ मुंबई की चमक-दमक के बारे में सुनकर मुंबई पहुँचे. लेकिन ज़्यादातर के घर छोड़ने की वजह गरीबी है. उनके माँ-बाप के बीच पैसे को लेकर झगड़े होते थे.

बालप्रफ़ुल्लता के संतोष शिंदे के मुताबिक हर साल करीब साढ़े तीन हज़ार बच्चे मुंबई पहुँचते हैं.

नशे की लत

वो कहते हैं, "जो बच्चे हमारे जैसे लोगों के हाथ नहीं लगते, वो किसी गैंग के हाथ लग जाते हैं. गैंग के हाथ लगने के बाद वो काम करना शुरू करते हैं, उन्हें भीख मांगने के काम पर लगाया जाता है. कुछ बच्चे प्लेटफॉर्म पर रहकर ही काम करना शुरू कर देते हैं. कुछ बच्चों को नशे की भी आदत लग जाती है. अगर आप छत्रपति शिवाजी या फिर लोकमान्य तिलक टर्मिनस पर ध्यान दें, तो आपको वहाँ ढेर सारे दलाल नज़र आ जाएंगे."

मुंबई पहुँचने वाले इन बच्चों को खाना-पानी मुश्किल से नसीब होता है. कई प्लेटफ़ार्म पर या आसपास गंदी परिस्थितियों में रहते हैं, पास की दुकानों में कम पैसों में छोटे-मोटे काम करते हैं और शौच के लिए खुले मैदानों का इस्तेमाल करते हैं. लड़कियों के लिए मुश्किलें और बढ़ जाती हैं और उन्हें घर वापस भेजना भी मुश्किल हो जाता है.

परिवार वालों का कहना है कि गाँव वाले सोचेंगे कि वो किसी लड़के के साथ घर से भागकर गई होगी और उसने कुछ ग़लत काम किया होगा. उनकी सोच एकदम घटिया है. मैं एक बार अपने मौसी के घर गई थी तो मुझे उनका मुँह देखकर ही समझ में आ गया था कि मेरा आना उन्हें पसंद नहीं है.

दीप्ति, घर छोड़कर मुंबई आई बच्ची

शंकर ने बताया कि वो एक ढाबे में काम करता था. उसके दिन की शुरुआत तड़के सुबह छह बजे हो जाती थी और रात बारह बजे तक उसका काम चलता था. बीच में सिर्फ़ दो घंटे के लिए छुट्टी मिलती थी.

तीन साल पहले 14 साल की दीप्ति अपने भाई की मारपीट से तंग आकर उस्मानाबाद ज़िले से भागकर मुंबई पहुँची. उसके मां-बाप की मौत हो चुकी है. दीप्ति कहती हैं कि उनका परिवार उन्हें वापस लेने को तैयार नहीं है.

वो कहती हैं, "परिवार वालों का कहना है कि गाँव वाले सोचेंगे कि वो किसी लड़के के साथ घर से भागकर गई होगी और उसने कुछ गलत काम किया होगा. उनकी सोच एकदम घटिया है. मैं एक बार अपने मौसी के घर गई थी तो मुझे उनका मुँह देखकर ही समझ में आ गया था कि मेरा आना उन्हें पसंद नहीं है."

दीप्ति जैसे बच्चों की किस्मत अच्छी रहती है तो वो किसी संस्था या किस अच्छे व्यक्ति के संपर्क में आकर सुरक्षित जगह पहुँच जाते हैं.

सरकारी योजनाएँ नाकाफी

महाराष्ट्र स्टेट प्रोटेक्शन ऑफ़ चाइल्ड राइट्स की मीनाक्षी जायसवाल बच्चों की सुरक्षा और देखभाल के लिए अपनाए जा रहे कदम तो गिनाती हैं लेकिन सरकारी धन के दुरुपयोग की बात को भी स्वीकारती हैं.

सरकार इतनी सारी योजनाएँ बनाती है, उनकी तरफ़ से इतना सारा पैसा आता है लेकिन उसका सही इस्तेमाल नहीं होता. हम इस बारे में कुछ करना चाहें तो फिर हमारे पास भी लोगों की कमी है. हमें सरकार की तरफ़ से जैसी मदद होनी चाहिए, वो नहीं मिल पाती.

मीनाक्षी जायसवाल, महाराष्ट्र स्टेट प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स

वो कहती हैं, "सरकार इतनी सारी योजनाएँ बनाती है, उनकी तरफ़ से इतना सारा पैसा आता है लेकिन उसका सही इस्तेमाल नहीं होता. हम इस बारे में कुछ करना चाहें तो फिर हमारे पास भी लोगों की कमी है. हमें सरकार की तरफ़ से जैसी मदद होनी चाहिए, वो नहीं मिल पाती. मैने कई बार चिल्ड्रंस होम में देखा है कि वहाँ कई पद खाली रहते हैं, वहाँ व्यवस्था ठीक नहीं होती. बच्चों को ठीक से खाना नहीं मिलता, उनकी परवरिश ठीक से नहीं होती."

संतोष शिंदे प्रशासन की निंदा करते हैं और बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए कानून (चाइल्ड प्रोटेक्शन ऐक्ट) बनाने की मांग करते हैं.

वो कहते हैं कि अगर बच्चों पर खर्च होने वाले धन को देखें तो वो बेहद नाकाफ़ी है.

वो कहते हैं, "अगर भारत सरकार के पास 1000 रुपए हैं तो मात्र एक रुपए और बयालिस पैसे बच्चों के हित पर खर्च होते हैं. महाराष्ट्र सरकार की बात करें तो अगर उनके पास 1000 रुपए हैं तो मात्र 80 पैसे बच्चों के हितों पर खर्च होते हैं."

हालांकि हर ज़िले में बच्चों की देखभाल के लिए कमेटियाँ तो हैं लेकिन जानकारों का कहना है कि इनकी पहुँच बहुत सीमित है.

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