कार्टून बनाएँगे कामकाज का माहौल

कार्टून

उम्मीद की जा रही है कि इन चित्रों से कामकाज का माहौल बदलने में मदद मिलेगी

भारत में सरकारी दफ़्तरों में अब भी कामकाज के प्रति एक उदासीन माहौल दिखाई देता है.

मगर अब राजस्थान में कोटा के ज़िला प्रशासन ने इस माहौल को बदलने के लिए कार्टून चित्रों का सहारा लिया है.

कोटा के ज़िला कलेक्टर कार्यालय में बड़ी संख्या में कार्टून चित्र लगाए गए हैं.

इन चित्रों के माध्यम से कर्मचारियों और अधिकारियों को कार्य कुशलता और साफ़ सफाई की सीख देने की कोशिश की गई है.

हालाँकि आम लोगों का मानना है कि इन कार्टून चित्रों से कोई मदद नहीं मिलने वाली. मगर प्रशासन अपने इस कदम को लेकर बहुत आशावान है.

किसी सधे हाथों से बने ये कार्टून चित्र कोटा के सरकारी दफ्तरों में लगाए गए हैं.

ये चित्र दफ्तर में काम करने वालों और आते जाते लोगों को काम में मुस्तैदी दिखाते और दफ्तर को साफ रखने का पाठ पढ़ाते हैं.

माहौल बदलने की कोशिश

इस प्रयोग को शुरू करने वाले ज़िला कलेक्टर टी रविकांत कहते हैं, “इन चित्रों से माहौल बदलेगा. असल में यह लोगों में एक नागरिक बोध पैदा करने का प्रयास है. हम इसे और भी विस्तार देंगे.”

सरकारी दफ्तर एक ऐसी निष्ठुर इमारत की तस्वीर पेश करते हैं, जहां अंदर बैठे लोग हाकिम और हुज़ूर हैं तो फ़रियाद लेकर आते आम लोग लाचार और मजबूर.

इन चित्रों से माहौल बदलेगा. असल में यह लोगों में एक नागरिक बोध पैदा करने का प्रयास है. हम इसे और भी विस्तार देंगे.

टी. रविकांत, जिला कलेक्टर, कोटा

अब प्रशासन ने इस माहौल को बदलने का बीड़ा उठाया है.

ये चित्र हर आगंतुक को उन रेखा चित्रों से रूबरू कराते हैं जो हर इंसान को उसका फर्ज याद दिलाते हैं.

दफ्तरों के कर्मचारियों का कहना है कि इन चित्रों से काफी फ़र्क पड़ा है. उनमें एक कर्तव्य परायणता का भाव पैदा हुआ है.

निराशाजनक कार्य संस्कृति

राजस्थान में कोई सात लाख से ज़्यादा सरकारी कर्मचारी हैं जो एक संगठित आवाज़ में बोलते हैं.

हाल के वर्षो में उनके वेतन भत्ते बढ़े हैं और सात दिन का हफ्ता अब पांच दिन का हो गया है. मगर सरकारी दफ्तरों का माहौल अब भी निराशाजनक है.

एक स्थानीय नागरिक मनोज कहते हैं, “दफ्तरों में आम लोगों से बहुत ही बुरा सलूक होता है.सरकार सुविधाएं तो बढ़ा रही है मगर ज़िम्मेदारी कोई तय नहीं करता. मुझे नहीं लगता कि इन कार्टूनों से कोई फ़र्क पड़ेगा. सरकारी दफ्तर के फेरे लगाते आम आदमी की हालत किसी कार्टून से कम नहीं.”

जयपुर में प्रचार माध्यमों से जुड़े राजेश को भरोसा है कि कार्टूनों के ज़रिए दिए गए सशक्त संदेश इंसान को अच्छे काम के लिए प्रेरित कर सकते हैं.

राजेश कहते हैं, ''कई बार आप अपनी बात शब्दों में उतनी मज़बूती से नहीं कह सकते जितनी चित्रों की रेखाओं के ज़रिए कही जा सकती है.”

आज के दौर में जहां निजी क्षेत्र अपने कामकाज में पेशेवर गतिविधियों को और मज़बूती दे रहे हैं, वहीं कुछ सरकारी दफ्तरों में कामकाज की रफ़्तार धीमी है.

ऐसे में कार्टून चित्र माहौल तो बदल देंगे पर क्या बेजान चित्र मन भी बदल पाएंगे?

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