सड़कों और लंबी यात्राओं के दीवाने

मद्रास बुल्स के कुछ सदस्य

मद्रास बुल्स के सदस्य अपनी छुट्टियाँ सड़क यात्राओं के लिए बचाकर रखते हैं

बाइक चलाने वालों या बाइकर्स की एक छवि हॉलीवुड की फ़िल्मों से बनी हुई है. उजड्ड, अक्खड़ और अपराधियों जैसी. लेकिन अपनी बुलेट मोटर साइकिलों के इन दीवानों से मिल लें तो हॉलीवुड की वह छवि कुछ भद्दी सी मालूम होती है.

सड़कों और लंबी यात्राओं के ये दीवाने ‘मद्रास बु्ल्स’ के सदस्य हैं और अपने आपको ‘मैड बुल्स’ बुलाते हैं.

हर सदस्य का एक ही फ़ितूर है. अपनी बुलेट पर लंबी यात्राएँ करने का.

जब मौक़ा मिलता है, निकल पड़ते हैं.

कभी चेन्नई से कोयम्बटूर, कभी मुंबई तो कभी कोलकाता. समय कम हो तो चेन्नई से पुद्दुचेरी भी चलेगा.

घर-दफ़्तर और यात्राएँ

शांतनु राठौर राजस्थान के उदयपुर के रहने वाले हैं लेकिन वे पिछले 15 सालों से चेन्नई में ही रह रहे हैं. वे ‘मैड बुल्स’ के 117 सदस्यों में से एक हैं.

ख़ुदा ने चाहा तो इस साल मैं अपनी सबसे लंबी राइड पर जाउँगा. चेन्नई से लेह और खारदुंगला तक. खारदुंगला वाहन के साथ मापी जा सकने वाली सबसे ऊँची जगह है

अबीज़र लहरी

वे अपनी मोटर साइकिल पर 21 दिनों में सात हज़ार किलोमीटर की यात्रा कर चुके हैं.

वे बताते हैं कि चेन्नई से बंगलौर होते हुए वे मुंबई गए वहाँ से अहमदाबाद, राजस्थान और फिर दिल्ली से नागपुर, हैदराबाद होते हुए चेन्नई.

लेकिन अबीज़र लहरी की आँखों में अभी सबसे लंबी यात्रा का सपना अभी पल रहा है.

वे कहते हैं, “ख़ुदा ने चाहा तो इस साल मैं अपनी सबसे लंबी राइड पर जाउँगा. चेन्नई से लेह और खारदुंगला तक. खारदुंगला वाहन के साथ मापी जा सकने वाली सबसे ऊँची जगह है.”

‘मद्रास बुल्स’ की टी शर्ट पर अपना ड्राइविंग गियर पहने जब युवकों की यह टोली सड़कों पर निकलती है तो मानो समाँ सा बंध जाता है.

उन्हें अपनी बुलेट की आवाज़ तक से प्यार है. अबीज़र लहरी कहते हैं कि जैसे हर किसी के फ़िंगर प्रिंट अलग होते हैं उसी तरह हर बुलेट की अपनी एक आवाज़ होती है.

हालांकि वे बुलेट के अकेले दीवाने नहीं हैं. देश भर में ऐसे 70 क्लब हैं.

ये सभी क्लब साल में एक बार किसी एक शहर में समागम करते हैं. इसे वे ‘राइडर्स मैनिया’ कहते हैं और इसमें हिस्सा लेने के लिए देश भर से लोग अपनी बुलेट लेकर पहुँचते हैं.

क्लब के ज़्यादातर सदस्य युवा हैं और अपनी-अपनी नौकरियाँ करते हैं.

शांतनु राठौर कॉल सेंटर के लिए काम करते हैं तो रंगा यानी टीएस रंगराजन सैटेलाइट कम्युनिकेशन की एक कंपनी के जनरल मैनेजर हैं. अबीज़र आईटी के लिए काम करते हैं तो गणेश अभी काम करते हुए अपनी पढ़ाई पूरी कर रहे हैं.

पहले हम गाँवों में चाय पीने रुकते थे तो गाँव वाले पूछते थे कि भारत यात्रा के लिए निकले हो क्या. लेकिन अब कोई पूछता ही नहीं

टीएस रंगनाथन (रंगा)

तो कैसा होता है काम, परिवार और अपने जुनून के बीच तालमेल बिठाना?

शांतनु कहते हैं कि ऑफ़िस में शुरु में दिक़्कत हुई लेकिन बाद में सब समझ गए कि उन्हें और किसी काम के लिए छुट्टी की ज़रुरत नहीं होती सिर्फ़ लंबी राइड के लिए चाहिए होती है, इसलिए अब कोई रोकता टोकता नहीं.

वे कहते हैं, “हमें भी काम देखकर छुट्टी लेनी होती है. अभी हमें कोयम्बटूर के लिए निकलना था लेकिन एक ज़रुरी काम आ गया तो मैंने जाना रद्द कर दिया.”

अबीज़र कहते हैं, “बहुत मुश्किल है. पहले दफ़्तर के बॉस को पटाओ फिर घर के बॉस को पटाओ.”

वे बताते हैं कि पाँच साल की शादी के बाद अब उनकी पत्नी उनके जुनून को समझ गई हैं लेकिन अभी भी वे मोटर साइकिल को अपनी सौत कहती हैं.

शांतनु बताते हैं कि पहली बार जब वे चेन्नई से बंगलौर तक गए थे तो उनकी माँ पूरे रास्ते फ़ोन करती रही थीं और जब वे 21 दिनों की राइड पर निकले तो माँ ने 21 दिनों तक लगातार भगवान के सामने दिया जलाकर रखा था.

लेकिन वे कहते हैं कि धीरे-धीरे घर-परिवार वालों को भरोसा होने लगा है कि क्लब के सदस्य ज़िम्मेदारी के साथ राइडिंग करते हैं तो उनके मन में भी डर कम होने लगा है.

क्लब के दूसरे सदस्य बताते हैं कि वे दूसरे लोगों को भी समझाने का प्रयास करते हैं कि सुरक्षित गाड़ी चलाना कितना ज़रुरी है.

नई सड़कें

मद्रास बुल्स के सदस्य

मद्रास बुल्स के सदस्य कहते हैं कि अब समाज में उनकी छवि बदल रही है

सड़कों के इन दीवानों से पूछा कि स्वर्णिम चतुर्भुज या गोल्डन क्वाड्रिलेट्रल का उनका अनुभव कैसा है तो जवाब थोड़ा अनपेक्षित सा था.

रंगा कहते हैं, “सड़कें चौड़ी हों गईं, चिकनी हो गईं लेकिन इसने सड़कों को गाँवों और बस्तियों से काट दिया.”

वे कहते हैं कि कम समय में ज़्यादा दूरी तय करने के लिए तो अच्छा हो गया लेकिन इससे लोगों से जुड़ने का मज़ा ख़त्म हो गया.

वे कहते हैं, “पहले हम गाँवों में चाय पीने रुकते थे तो गाँव वाले पूछते थे कि भारत यात्रा के लिए निकले हो क्या. लेकिन अब कोई पूछता ही नहीं.”

शांतनु कहते हैं कि एक तो गाँव रास्ते से हट गए दूसरे सड़कों के किनारों के पेड़ ग़ायब हो गए जो पहले सड़कों पर चलने के लिए बड़ी राहत की तरह थे.

वे कहते हैं कि एक जैसी अच्छी साफ़ सुथरी सड़क पर चलने से राइडिंग की चुनौती ख़त्म हो गई है.

उनका कहना है, “राइडिंग का मज़ा लेने के लिए कभी-कभी हम उन सड़कों से हटकर भी चलते हैं. शहरों और गाँवों के दूसरे रास्तों पर.”

दोपहिए से सड़कों को नापने का यह जुनून भारत में नया है लेकिन तेज़ी से पनप रहा है.

साफ़ दिखता है कि यदि सड़कें सुरक्षित होंगीं तो उनकी दीवानगी अभी और बढ़ेगी.

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