ट्रकों के लिए श्रृंगार की दुकानें

  • ट्रकों के लिए श्रृंगार की दुकानें
    ये दीवाली या दुर्गा पूजा के लिए सजी दुकानें नहीं हैं. बल्कि ये तो सड़कों के राजा ट्रकों के श्रृंगार की सामग्री की दुकानें हैं.
  • ट्रकों के लिए श्रृंगार की दुकानें
    वाराणसी से कोलकाता आते हुए राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक दो पर ऐसी बहुत सी दुकानें दिखती हैं.
  • ट्रकों के लिए श्रृंगार की दुकानें
    ये हैं एमडी मुन्ना. रहने वाले जोधपुर, राजस्थान के हैं लेकिन पिछले 12-15 साल से कोलकाता आकर ये दुकान चलाते हैं.
  • ट्रकों के लिए श्रृंगार की दुकानें
    ट्रकों के सजाने के लिए यहाँ तरह तरह की सामग्री उपलब्ध है. काली चोटी, झालर या गेट, रूमाल, रेडियम, झंडा, स्टीयरिंग कवर आदि.
  • ट्रकों के लिए श्रृंगार की दुकानें
    ये हैं आस नारायण महतो. बिहार के रहने वाले हैं और पिछले पाँच सालों से यही काम कर रहे हैं. उनका परिवार भी उनके साथ रहता है और उनका हाथ बँटाता है.
  • ट्रकों के लिए श्रृंगार की दुकानें
    सजावट की कुछ सामग्री रेडीमेड मिलती हैं और कुछ को यही बनाया जाता है. कच्चा माल के लिए दिल्ली, कोलकाता और बनारस के बाज़ारों का सहारा रहता है.
  • एमडी मुन्ना अपनी पत्नी मीना और बच्चों के साथ सड़क के किनारे ही रहते हैं. मीना भी उनके काम में हाथ बँटाती है.
  • ट्रकों के लिए श्रृंगार की दुकानें
    मुन्ना के बच्चे स्कूल नहीं जाते. दुकान के पास ही खेलते रहते हैं और जब थक जाते हैं तो वहीँ सो जाते हैं.
  • ट्रकों के लिए श्रृंगार की दुकानें
    सड़क के किनारे झोपडी़ में मुन्ना के माँ-बाप, भाई, बहन, दामाद और बच्चों का पंद्रह लोगों का परिवार रहता है. कभी-कभी पुलिस इनको परेशान भी करती है. पिछले दिनों इनकी एक दुकान हटा दी गई.
  • ट्रकों के लिए श्रृंगार की दुकानें
    मुन्ना की बहन सीमा अपने पति अब्दुल के साथ यहीं रहती हैं. अब्दुल पहले जयपुर में घूम-घूमकर यही सामान बेचा करते थे.
  • ट्रकों के लिए श्रृंगार की दुकानें
    रेडियम के ऐसे स्टिकर बहुत बिकते हैं. ज़्यादातर ट्रक वाले ही इनके ग्राहक होते हैं. कभी-कभार छोटी गाड़ियाँ भी रुकती हैं. दुकानदारों को दो-ढाई सौ प्रतिदिन की औसत आमदनी हो जाती है.
  • ट्रकों के लिए श्रृंगार की दुकानें
    इन दुकानदारों के बच्चे कहते हैं कि वे भी बड़े होकर यही काम करना चाहते हैं. हालांकि एक बच्चे ने कहा कि वह ट्रक चलाना चाहता है.

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