सड़कों ने बदली संगीत की दुनिया

संतोष सिन्हा

संतोष मिश्रा सांरगी बजाते हैं और अपने परिवार में सातवीं पीढ़ी के कलाकार हैं.

कहने-सुनने में अजीब लगता है लेकिन यह सच है कि बेजान काली-काली सड़कें जिन चीज़ों को बदल सकती है, उनमें संगीत की जीवंत और आध्यात्मिक सी दुनिया भी है.

बिस्मिल्लाह ख़ान और छन्नू लाल मिश्र के शहर बनारस या वाराणसी में कला संगीत की समृद्ध परंपरा को नई सड़कों ने एक नया जीवन दिया है.

ख़ुद वाराणसी के कलाकारों के लिए यह एक सुखद परिवर्तन है.

वे मानते हैं कि इससे न केवल कलाकारों की पहुँच बढ़ी है बल्कि इससे संगीत का प्रचार प्रसार भी ख़ूब हो रहा है.

बीबीसी हिंदी की ‘हाइवे हिंदुस्तान’ टीम सड़कों के रास्ते भारत में हो रहे परिवर्तनों का आकलन कर रही है.

संगीतमय सफ़र

नई सड़कों ने यात्रा को सुरीला और संगीतमय बना दिया है. अब हम किसी कार्यक्रम के लिए जाते हैं तो आसपास के शहरों के कई कार्यक्रम भी स्वीकार कर लेते हैं. पहले यह सोचना पड़ता था कि वहाँ की यात्रा कैसे होगी.

देवाशीष डे अंतरराष्ट्रीय ख़्यातिप्राप्त शास्त्रीय गायक

देवाशीष डे अंतरराष्ट्रीय ख़्यातिप्राप्त शास्त्रीय गायक हैं.

पहले तो वे इस सवाल पर ही चौंकते हैं कि सड़कें किस तरह से कला और कलाकारों की दुनिया को बदल रही हैं. लेकिन जल्दी ही मान जाते हैं कि सड़कों ने कलाकारों को सुकून दिया है.

वे कहते हैं, “हम कलाकार अब दो किलोमीटर की यात्रा के लिए चार घंटे पहले निकलते हैं और वहाँ पहुँचकर दस मिनट में चाय-वाय पीकर कार्यक्रम के लिए तैयार हो जाते हैं.”

देवाशीष कहते हैं, “नई सड़कों ने यात्रा को सुरीला और संगीतमय बना दिया है. अब हमें रास्ते के गड्ढों और हिचकोलों का डर नहीं है और न ही पहुँचने के बाद सात-आठ घंटों के आराम की.”

उनका कहना है कि अब उनकी पहुँच भी बढ़ रही है. वे कहते हैं, “अब हम किसी कार्यक्रम के लिए जाते हैं तो आसपास के शहरों के कई कार्यक्रम भी स्वीकार कर लेते हैं. पहले यह सोचना पड़ता था कि वहाँ की यात्रा कैसे होगी.”

वे बताते हैं कि अब वे कुल्लू और मांडू जैसे शहरों तक जाना स्वीकार करने लगें हैं.

वे ऐसा मानने वाले अकेले कलाकार नहीं हैं.

संतोष मिश्रा सांरगी बजाते हैं. वे अपने परिवार में सातवीं पीढ़ी के कलाकार हैं जो सारंगी में पारंगत हैं.

वे भी मानते हैं कि सड़कों ने जीवन को बदला तो ज़रूर है, “अभी तो हम दो-चार सौ किलोमीटर सफ़र करते हैं और उसी दिन वापस आ जाते हैं और ऐसा सड़कों के अच्छी होने से ही संभव हुआ है.”

बढ़ता दायरा

देवाशीष डे अंतरराष्ट्रीय ख़्यातिप्राप्त शास्त्रीय गायक

शास्त्रीय गायक देवाशीष डे का कहना है कि सड़कों ने जीवन को बदला है.

वाराणसी में संगीत-कला की संस्था कला प्रकाश के संयोजक अशोक कपूर बताते हैं कि सड़कों ने ललित कलाओं को प्रात्साहित करने में उल्लेखनीय भूमिका निभाई है.

वे सांस्कृतिक संस्था स्पिक मैके का उदाहरण देते हैं, “अब स्पिक मैके के संयोजक एक वरिष्ठ कलाकार को बुलाते हैं और सात दिनों में 10-12 कार्यक्रम कर लेते हैं.”

अशोक कपूर बताते हैं, “यह कलाकारों के लिए भी सुविधाजनक है. अगर किसी के पास एक हफ़्ते का समय होता है तो वह स्पिक मैके को समय दे देता है और एक हफ़्ते में उतने कार्यक्रम दे देता है जितने आम तौर पर वह नहीं करता.”

वे बताते हैं कि वाराणसी आने वाला कलाकार अब तीन दिन में लखनऊ, इलाहाबाद, कानपुर और अयोध्या सभी जगह कार्यक्रम कर लेता है.

उनका आकलन है, “ये नई सड़कें स्पिक मैके जैसी संस्थाओं और कलाकारों के लिए वरदान साबित हुई हैं.”

कत्थक गुरु बिरजू महाराज की शिष्या संगीता सिन्हा, वाराणसी में एक संगीत अकादमी चलाती हैं.

वे ख़ुद भी कई जगह कार्यक्रम देने जाती हैं और उनके शागिर्द भी कई जगह कार्यक्रम देने जाते हैं.

संगीता सिन्हा कहती हैं कि ख़राब सड़कें कलाकारों को हतोत्साहित तो करती ही हैं, और इसके लिए वे बिहार की ख़राब सड़कों का उदाहरण देती हैं.

अशोक कपुर

संगीत-कला के संयोजक के अनुसार सड़कों ने ललित कलाओं को प्रात्साहित किया है

जो कलाकार, पहले सिर्फ़ हवाई और रेल यात्रा के भरोसे थे अब इसकी सीमाएँ बताते हैं. वे कहते हैं कि हवाई यात्रा में खर्च ज़्यादा है और वह हर जगह नहीं ले जा सकती हैं.

वे कहते हैं कि ट्रेन में रिज़र्वेशन से लेकर समय की इतनी सीमाएँ हैं कि सड़कें अगर अच्छी हों तो कोई ट्रेन से यात्रा नहीं करना चाहता.

देबाशीष डे बताते हैं कि पहले वे सड़क यात्राओं से बहुत घबराते थे.

लेकिन अब वे एक संगीत कार्यक्रम के लिए अपनी पूरी मंडली के साथ एक बड़ी गाड़ी लेकर वाराणसी से कोलकाता जाने की तैयारी कर रहे हैं.

वे कहते हैं, “हम रास्ते में गाते बजाते, रुकते-रुकाते, खाते-पीते अपनी सुविधा से जाएँगे. जब मैं थक जाउँगा तो रुक कर सो जाऊँगा और जब थकान मिट जाएगी तो ड्राइवर से कहूँगा कि मैं अगली यात्रा के लिए तैयार हूँ, चलो.”

सभी कलाकार मानते हैं कि सड़कों ने संगीत कार्यक्रमों में श्रोताओं की संख्या भी बढ़ी है.

अशोक कपूर कहते हैं, “अब लोग सुबह अपना कामधाम निपटाकर शाम के कार्यक्रम के लिए पास पड़ोस के शहर से आते हैं और लौट भी जाते हैं. इससे हर कार्यक्रम में संगीत प्रेमियों की संख्या बढ़ती दिख रही है.”

वे कहते हैं कि संगीतप्रेमियों के लिए सड़कें समय बचाने का अच्छा साधन साबित हुई हैं.

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