'दुनिया का सबसे छोटा हेड मास्टर'

बाबर अली

शायद बाबर अली दुनिया का सबसे छोटा हेडमास्टर है

दुनिया भर में लाखों बच्चों को उचित शिक्षा नहीं मिल पा रही है क्योंकि उनके परिवार इतने ग़रीब हैं कि वे शिक्षा का भार नहीं संभाल सकते. भारत में एक स्कूली छात्र उसमें बदलाव की कोशिश में लगा हुआ है.

डेमियन ग्रामेटिक्स ने बीबीसी की श्रृंखला 'हंगर फ़ॉर लर्निंग' या शिक्षा की भूख पर अपनी पहली रिपोर्ट में बाबर अली से मुलाक़ात की जिसकी शिक्षा
परियोजना सैकड़ों ग़रीब बच्चों का जीवन बदल रही है.

बाबर अली 16 साल की उम्र में शायद दुनिया का सबसे कम उम्र हेडमास्टर है. वह किशोर है और अपने घर के पीछे वाले बारामदे वह अपने
गांव के ग़रीब बच्चों को पढ़ाता है.

पश्चिम बंगाल में मुर्शिदाबाद के रहने वाले इस नवयुवक की अत्यंत ग़रीबी में भी सीखने की ख़्वाहिश की कहानी बड़ी रोचक है.

बाबर अली का दिन सुबह सवेरे शुरू हो जाता है. वह जागता है, घर का कुछ काम करता है फिर राज गोविंद स्कूल के लिए ऑटो रिक्शा लेता है
जो कि 10 किलोमीटर दूर है. फिर स्कूल तक पहंचने के लिए एक दो किलोमीटर पैदल सफ़र करना पड़ता है.

बंगाल के इस क्षेत्र में यह स्कूल बेहतरीन है. इसमें सैकड़ों बच्चे हैं जिनमें लड़के लड़कियां दोनों शामिल हैं. अगर ख़ाली हो तो कक्षाएं साफ़-सुथरी
नज़र आती हैं. लेकिन वहां तो डेस्क, कुर्सियां, एक ब्लैकबोर्ड और सारे शिक्षक समर्पित और निपुण हैं.

चुमकी का ख़्वाब नर्स बनने का है और बाबर का स्कूल शायद उसके सपनों को साकार कर सकता है. स्थानीय अधिकारियों ने उस स्कूल की सराहना की है कि इससे उस इलाक़े में साक्षरता के दर में वृद्धि हुई है और बाबर अली को उसके काम के लिए पुरस्कृत भी किया जा चुका है.

जैसे ही क्लास में रौल नंबर 12 पुकारा जाता है बाबर अली पहली पंक्ति में बीच में नज़र आता है. वह लंबा, दुबला पतला, मेहनती और अपनी नीली और सफ़ेद यूनिफ़ॉर्म में स्मार्ट नज़र आता है. वह सावधानी के साथ अपने नोट्स लेता है. वह एक आदर्श छात्र है.

बाबर अली अपने परिवार का पहला व्यक्ति है जिसे बाक़ायदा शिक्षा मिल रही है.

वह कहता है, "मेरे लिए स्कूल आना बहुत आसान नहीं है क्योंकि यह बहुत दूर है. लेकिन शिक्षक अच्छे हैं और मुझे पढ़ाई से प्यार है और मेरे
माता-पिता चाहते हैं कि मुझे बेहतर से बेहतर संभव शिक्षा मिलनी चाहिए, इसी लिए मैं यहां हूं."

कड़ी मेहनत

राज गोविंद एक सरकारी स्कूल है, इसलिए यहां शिक्षा मुफ़्त दी जाती है, बाबर अली को सिर्फ़ अपने यूनिफ़ार्म, किताबों और स्कूल तक जाने के
लिए रिक्शे का ख़र्च बर्दाश्त करना पड़ता है. लेकिन उसके लिए भी उसके परिवार वालों को उसे स्कूल भेजने के लिए 1800 रुपए सालाना चाहिए. बंगाल के इस भाग में यह बहुत बड़ी रक़म है. बहुत से ग़रीब परिवारों के पास इतना भी नहीं कि वह अपने बच्चों को मुफ़्त शिक्षा देने वाले स्कूलों में भी डाल सकें.

चुमकी हाजरा एक ऐसी ही लड़की है जो कभी स्कूल नहीं गई है. वह 14 वर्ष की है और अपनी दादी के साथ एक छोटी सी झोंपड़ी में रहती है. यह झोंपड़ी गांव के किनारे नारियल और धान के खेत के पास है. झोंपड़ी में सिर्फ़ एक बिस्तर और कुछ सामान की जगह है.

हर सुबह स्कूल जाने के बजाए वह बर्तन मांझती है और पड़ोसियों के घरों में सफ़ाई करती है. पांच साल की उम्र से वह यही कर रही है. इस काम के लिए उसे हर महीने 200 रुपए मिलते हैं. यह कोई बड़ी रक़म नहीं है लेकिन उनके परिवार को इसकी सख़्त ज़रूरत है. यानी कि उसे नौकर की तरह हर दिने अपने गांव में काम करना पड़ता है.

बाबर के स्कूल के छात्र

बाबर के स्कूल में लगभग 800 ग़रीब बच्चे मुफ़्त पढ़ते हैं

बर्तन मांझते हुए चुमकी ने कहा, "मेरे पिता विकलांग हैं और काम नहीं कर सकते हैं, हमें पैसों की ज़रूरत है, अगर मैं काम नहीं करूंगी तो परिवार का पेट नहीं भर सकेंगे. इसलिए मेरे पास काम करने के अलावा कोई चारा नहीं है."

लेकिन अब चुमकी शिक्षा हासिल कर रही है, बाबर अली की वजह से. 16 वर्षीय किशोर ने चुमकी और उस जैसे अपने गांव के सैंकड़ों ग़रीब बच्चों की मदद करना अपना उद्देश्य बना लिया है. जैसे ही राज गोविंद स्कूल में उसकी पढ़ाई ख़त्म होती है बाबर अली खेलने के लिए नहीं रुकता है वह सीधे अपने घर आता है और उसने जो सीखा है उसे वह अपने गांव के बच्चों के साथ बांटना चाहता है.

स्कूल की शुरूआत

हर दिन चार बजे जब बाबर स्कूल से अपने घर वापस आ जाता है उसके घर में एक घंटी बजती है जो गांव के बच्चों को उसके घर की ओर बुलाती है. वे उसके दरवाज़े से बाढ़ की तरह उमड़े आते हैं ताकि उसके घर की पीछे के बरामदे में जाएं जहां बाबर अली अपने ग़ैर-सरकारी स्कूल में हेडमास्टर का काम करता है.

उसके घर के पीछे बच्चे क़तार लगा कर राष्ट्रीय गीत गाते हैं. एक ऊंची जगह पर खड़े होकर बाबर उन्हें अनुशासन के बारे में लेक्चर देता है, फिर पढ़ाई शुरू होती है.

बाबर उसी प्रकार से पाठ पढ़ाता है जैसे स्कूल में उसके शिक्षक उसे देते हैं. कुछ बच्चों को कच्ची ज़मीन पर बैठना पड़ता है, कुछ बच्चे एक छप्पर के नीचे खुरदुरी बेंचों पर बैठते हैं. घर की मुर्ग़ियां आस-पास चुगती रहती हैं. पीछे का सारे भाग में बच्चों का झुंड मेहनत के साथ पढ़ने में जुटा हुआ है.

बाबर अली सिर्फ़ नौ साल का था जब उसने खेल-खेल में अपने कुछ दोस्तों को पढ़ाना शुरू किया. वे सारे उससे यह जानने के इच्छुक रहते थे कि उसने सुबह स्कूल में क्या सीखा और उसे उनका शिक्षक बनने में मज़ा आता था.

जब बारिश होने लगती है तो बच्चे छुपने के लिए पास की दुकान के उसारे में चले और फिर वह बारिश में भीगते हुए अपने घरों को चले जाते हैं. फिर दूसरे दिन वे वापस आते हैं. 800 ग़रीब बच्चे जो शिक्षा का भार नहीं उठा सकते लेकिन वह बाबर के स्कूल में जो कुछ भी मिल जाए उसे सीखने के लालसी हैं.

अब उसके दोपहर के बाद वाले स्कूल में 800 बच्चे हैं, सारे ग़रीब परिवार से आते हैं और सब को मुफ़्त शिक्षा दी जाती है. ज़्यादातर लड़कियां चुमकी की तरह गांव में घरेलू नौकरानी की तरह काम करने के बाद आती हैं और लड़के खेतों में दिन भर की मेहनत के बाद आते हैं.

बाबर ने कहा, "शुरू में तो मैं अपने दोस्तों के साथ सिर्फ़ पढ़ाई का खेल करता था, लेकिन फिर मैंने महसूस किया कि ये बच्चे तो कभी लिखना पढ़ना नहीं सीख सकेंगे अगर उन्हें बाक़ायदा सबक़ नहीं दिया गया. उन्हें पढ़ाना मेरा फ़र्ज़ है ताकि देश का भविष्य उज्जवल हो सके".

बाबर अली को मिला कर स्कूल में अब कुल 10 शिक्षक हैं, सारे उसी की तरह किसी स्कूल या कॉलेज के छात्र हैं और वे स्वेच्छा से अपना समय देते हैं. बाबर अली किसी चीज़ के लिए पैसे नहीं लेता, यहां तक कि किताबें और खाने भी मुफ़्त में दिए जाते हैं जो दान के ज़रिए आते हैं. जिसका अर्थ ये हुआ कि सबसे निर्धन भी यहां आ सकते हैं.

क्लासरूम की कमी

बाबर ने कहा, "हमारा इलाक़ा आर्थिक रूप से कमज़ोर है, इस स्कूल के बग़ैर बहुत से बच्चे शिक्षा प्राप्त नहीं कर सकेंगे, यहां तक कि वे साक्षर भी नहीं हो सकेंगे".

एक खुरदुरी बेंच पर दूसरी बहुत सी लड़कियों के साथ चुमकी हाजरा बैठी लिख रही है. पढ़ाई के प्रति उसका लगाव देखने योग्य है. हर दिन वह गांव में सुबह छह बजे से दो बजे दोपहर तक घरों में काम करती है, उसके बाद वह बाबर के स्कूल के लिए निकल पड़ती है. हर दिन शाम सात बजे वह फिर सफ़ाई का काम करने के लिए चल पड़ती है.

चुमकी हाजरा

चुमकी हाजरा का ख़्वाब नर्स बनना है

चुमकी का ख़्वाब नर्स बनने का है और बाबर का स्कूल शायद उसके सपनों को साकार कर सकता है. स्थानीय अधिकारियों ने उस स्कूल की सराहना की है कि इससे उस इलाक़े में साक्षरता के दर में वृद्धि हुई है और बाबर अली को उसके काम के लिए पुरस्कृत भी किया जा चुका है.

सबसे छोटे बच्चे चार और पांच साल के होंगे जो एक छोटे से बरामदे में चिपक कर बैठते हैं. वहां मुश्किल से दो तीन बल्ब लटके हुए हैं. अगर बिजली होती है तो वह जलाए जाते हैं क्योंकि पढ़ाई देर शाम तक जारी रही.

और फिर मॉनसून की बारिश शुरू हो जाती है. जब बड़ी बड़ी बूंदें पड़ती हैं तो बच्चे कीचड़ में फिसलते हुए इधर उधर सर छुपाने के लिए भागते हैं. वे एक प्लास्टिक की छत के नीचे जमा हो जाते हैं. बाबर अली उन्हें सावधान करने के लिए चिल्लाता है. पढ़ाई उस दिन के लिए ख़त्म कर दी जाती है, नहीं तो सारे बच्चे भीग जाएंगे. किसी क्लास रूम के नहीं होने का अर्थ हुआ कि प्राकृति की कृपा पर क्लास चलती है.

जब बारिश होने लगती है तो बच्चे छिपने के लिए पास की दुकान के उसारे में चले जाते हैं और फिर बारिश में भीगते हुए अपने घरों को चले जाते हैं. फिर दूसरे दिन वे वापस आते हैं. 800 ग़रीब बच्चे जो शिक्षा का भार नहीं उठा सकते लेकिन वह बाबर के स्कूल में जो कुछ भी मिल जाए उसे सीखने के लालसी हैं.

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